भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५९० भावप्रकाशनिघण्टुः (२) वातविकारों में इसके तैल का अभ्यङ्ग एवं आन्तरिक प्रयोग बहुत लाभदायक है। (३) उदरशूल, आनाह एवं विबन्ध में पत्तों का कल्क उष्ण करके खिलाते हैं। मात्रा-स्वरस १-२ तोला; चूर्ण २-४ माशा। अथ कृष्णशारिवा (करिआबांसा) । तस्या नामान्याह कृष्णा तु शारिवा श्यामा गोपी गोपवधूश्च सा ।।२३६।। कृष्णशारिवा (काली अनन्तमूल) के नाम-शारिवा, श्यामा, गोपी और गोपवधू ये नाम कृष्णशारिवा के हैं।[२३६] इयं जम्बूवत्पत्रा सुगन्धा 'कलघण्टिके'ति प्रसिद्धा। गोपी-गोपस्य स्त्री, पुंयोगान् ङीष् ।।२३६।। इसके पत्ते जामुन के पत्तों के समान होते हैं और इसमें सुगन्धि होती है। एवं यह 'कल घण्टिका' के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पर 'गोपी' इस पद में 'गोप की स्त्री' इस अर्थ में 'पुंयोगादाख्यायाम्' (४-१-४८) इस सूत्र से पुंयोग होने से 'गोप' शब्द से 'ङीप्' प्रत्यय हुआ है, ऐसा समझना चाहिये।[२३६] अथ श्वेतशारिवा। तस्या नामान्याह धवला शारिवा गोपा गोपकन्या कृशोदरी। स्फोटा श्यामा गोपवल्ली लताऽऽस्फोटा च चन्दना।।२३७।। श्वेतशारिवा के नाम-धवलशारिवा, शारिवा, गोपा, गोपकन्या, कृशोदरी, स्फोटा, श्यामा, गोपवल्ली, लता, आस्फोटा और चन्दना ये नाम श्वेत शारिवा के हैं। [२३७] ❖ इयमपि जम्बूवत्पत्रा दुग्धगर्भा व्रतति । गोपा-गां पातीति गोपा, गोपकन्या। श्यामापदेन कृष्णा श्वेताऽपि शारिवा कथ्यते, शाश्वतेन शारिवामात्रे शारिवापदस्य प्रयुक्तत्वात्। तद्यथा- 'शारिवायां निशि श्यामाश्यामौ च हरितासितौ' इति ।।२३७।। यह भी जामुन के समान पत्तोंवाली तथा दुग्धगर्भा (भीतर जिसके दूध हो ऐसी) लता होती है। यहाँ पर 'गोपा' का 'गायों को पालन करने वाली' अर्थ है। 'आतोऽनुपसर्गे कः (३-२-३) इस सूत्र से कप्रत्यय हुआ बाद को टाप् प्रत्यय होने से 'गोपा' पद सिद्ध हुआ ऐसा समझना चाहिये। और 'श्यामा' पद से काली तथा श्वेत दोनों शारिवा को समझना चाहिये। क्योंकि 'शाश्वत' कोशकार ने 'शारिवा' पद को शारिवा मात्र में (दोनों शारिवा में) प्रयोग किया है 'शारिवायाम्०' इत्यादि से। [२३७] अथ सारिवाद्वयस्य गुणानाह सारिवायुगलं स्वादु स्निग्धं शुक्रकरं गुरु। अग्निमान्द्यारुचिश्वासकासामविषनाशनम् । दोषत्रयातस्रप्रदरज्वरातिसारनाशनम् ।।२३८।। दोनों शारिवा (अनन्तमूल) के गुण-दोनों शारिवा-स्वादिष्ट, स्निग्ध, शुक्र को उत्पन्न करने वाली, गुरु एवं अग्निमान्द्यता, अरुचि, श्वास (दमा), खाँसी, आम, विष, त्रिदोष, रक्तप्रदर, ज्वर और अतिसार को नष्ट करती है। [२३८] नोट-सारिवा के दो भेद श्वेत एवं कृष्ण ये हैं। इसमें से श्वेत सारिवा, अनन्तमूल (कपूरी) है। कृष्णसारिवा के स्थान पर करण्टा एवं दुधलत दो चीजों का व्यवहार किया जाता है। अनन्तमूल (श्वेत सारिवा) कम मिलने के कारण उत्तर प्रदेश के बाजारों में अधिकतर सारिवा के नाम से करण्टा के काण्ड बिकते हैं। जब केवल सारिवा लेने को लिखा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA