भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ५८९ अथ गन्धप्रसारणी (पसरन) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह प्रसारणी राजबला भद्रपर्णी प्रताननी । सरणी सारणी भद्रा बला चापि कटम्भरा ।। २३४ ।। प्रसारणी गुरुर्वृष्या बलसन्धानकृत्सरा । वीर्योष्णा वातहृत्तिक्ता वातरक्तकफापहा ।। २३५ ।। प्रसारणी के नाम तथा गुण-प्रसारणी, राजबला, भद्रपर्णी, प्रताननी, सरणी, सारणी, भद्रा, बला और कटम्भरा इतने नाम 'पसरन' के हैं। प्रसारणी-तिक्तरसयुक्त, गुरु, वृष्य, बलकारी, सन्धानकारक, सारक, उष्णवीर्य एवं वात, वातरक्त और कफ को दूर करने वाली होती है। [२३४-२३५] नोट-गंधप्रसारणी नाम से उत्तर भारत में पंडेरिया फिटोडा (Paederia foetida) का व्यवहार किया जा रहा है। दक्षिण में केरल में प्रसारणी नाम से मेरेमिया ट्राइडेन्टेटा (Mervemia tridentata Hall) का व्यवहार किया जाता है ऐसा 'आयुर्वेदिक फ्लोरामेडिका, कोट्टयम्' नामक पुस्तक में दिया हुआ है। कहीं-कहीं कन्वॉल्व्यूलस् आर्वेन्सिस् (Con volvulus arvensis Linn.) का प्रसारणी नाम से व्यवहार किया जाता है। राजस्थान में (हि०) खींप, (ले०) लेप्टाडेनिया स्पारशियम् वा० (Leptadenia spartium Wt.–Asclepiadaceae) का व्यवहार किया जाता है। इस दृष्टि से शास्त्रीय प्रसारणी का निर्णय अभी नहीं हो सका है। १२१ गन्धप्रसारिणी हिं०-प्रसारणी, प्रसरनी, पसरन, गन्धाली। बं०-गन्ध भादुलिया। म०-प्रसारण, हिरनवेल। गु०-प्रसारणि। ते०-सविरेला। आसाम०-वेडोली सुट्टा। ले०-Paederia foetida Linn. (पैडेरिया फिटीडा लिन.)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। मध्य और पूर्व हिमालय में ५००० फीट तक तथा कलकत्ता की तरफ एवं मलाया में उत्पन्न होती है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में फैलने वाली होती है। इसकी डंडियाँ-पतली चिकनी, लम्बी एवं मजबूत होती हैं। नवीन शाखाएँ-कोमल होती हैं। पुरानी लताओं की जड़-१-१।। इञ्च मोटी होती है। पत्ते-अभिमुख (आमने-सामने), आकार में छोटे-बड़े २ से ६ इञ्च तक लम्बे, १-२।। इञ्च चौड़े, अंडाकार-लट्वाकार, आयताकार- लट्वाकार या लम्बे लट्वाकार, नोकीले एवं लम्बे पत्रदण्ड से युक्त होते हैं। दोनों पत्तों के बीच में प्रतिग्रन्थि पर दो- दो संयुक्त पुंखपत्र होते हैं। पुष्प-जामुनी गुलाबी रंग के, नलिकाकार पुष्प-मंजरियों में आते हैं। फल-चिपटा, चिकना, पाँच रेखाओं से युक्त तथा १ बीजयुक्त होता है। बीज-चिकना, चिपटा एवं पतले आवरण से युक्त होता है। इसकी लताओं में एक प्रकार की बुरी गन्ध होती है। जहाँ यह फैली हुई होती है वहाँ इसके निकट जाने पर इसकी बुरी गन्ध जान पड़ती है किन्तु जब इसको मसलते हैं तब बड़ी बुरी गन्ध पैदा होती है। पत्तों को उबाल कर क्वाथ बनाने पर दुर्गन्ध नष्ट हो जाती है। इसकी जड़ एवं पत्रादि का उपयोग किया जाता है। इसको मूल के साथ शरदकाल में उखाड़ कर संग्रह करना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल एवं एक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, तिक्त, सर, गुरु, वृष्य, बल्य एवं वातकफशामक है। मूल की अधिक मात्रा से वमन होता है। (१) आमवात, वातरक्त तथा संधिविकार में इसका बाह्य एवं आभ्यन्तर प्रयोग बहुत लाभदायक माना जाता है। इसको खिलाते हैं तथा लेप करते हैं। इसके साथ चित्रकमूल एवं त्रिकटु का भी उपयोग लाभदायक है। साथ में पत्तों का शाक भी खिलाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA