भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५८८ भावप्रकाशनिघण्टुः देखने में आते हैं। शाखाएँ कई गज तक फैल जाती है। पत्ते-सनाल, चौड़े, लट्वाकार, प्रत्येक पर्वसन्धि पर छोटे बड़े जोड़े में। बड़े २.५-३.७ से० मी० लम्बे एवं छोटे १२-१७ मि० मि० लम्बे तथा अधर तल पर श्वेताभ चिकने होते हैं। पुष्प-छोटे, गुलाबी या श्वेत लगभग अवृन्त, ४-१० की संख्या में एक लम्बे दण्ड पर आते हैं। पुंकेशर २-३ होते हैं। फल-६ मि० मि० लम्बा, ५ धारीदार, चिपचिपा तथा एक बीज से युक्त होता है। जड़-बड़ी तथा मूलकाकार होती है। भेद-इसके दो भेद और पाये जाते हैं। एक में मूल कन्दसदृश तथा पत्रादि छोटे होते हैं। यह शुष्क भूमि में अधिक होती है। दूसरी लता जाति की होती है। इसे B. repanda, Willd (बो. रिपॅण्डा, वाइल्ड) कहते हैं। यह आरोहणशील या प्रसरणशील होती है। इसमें आमने-सामने के दोनों पत्ते प्रायः कद में समान होते हैं। इसकी जड़ कन्द सदृश मोटी किन्तु भंगुर होती है। चिकित्सा में इसके पत्र एवं मूल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में पुनर्नवीन (Punarnavine) नामक कार्यकारी क्षाराभ की मात्रा शुष्क द्रव्य में ०.०१% तक होती है। मूल में संपूर्ण क्षाराभ की मात्रा ०.०४% होती है। इसके अतिरिक्त इसमें पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate), सल्फेट (Sulphates), क्लोराइड ६.५% एवं स्थिर तैल होता है। बिल्ली में क्षाराभ के शिरान्तर्गत सूचिकाभरण से रक्त का दबाव बढ़ता है तथा मूत्रत्याग अधिक होता है। गुण और प्रयोग-पुनर्नवा मधुर, तिक्त, उष्ण, रूक्ष, स्वेदोपग, वयःस्थापन, विरेचन, दीपन, मूत्रविरेचन एवं नेत्रविकारों में किया जाता है। इसका प्रयोग शोथ, सर्वांगशोथ, उदर, कामला, मूत्राल्पता, पाण्डु, हृद्रोग, श्वास, उरःक्षत, सोजाक, विषविकार एवं नेत्रविकारों में किया जाता है। (१) पुनर्नवा के मूत्रल गुण के कारण अनेक शोथयुक्त विकारों में इसका प्रयोग किया जाता है। नूतन यकृत विकार तथा जीर्ण उदरावरणशोथ के कारण उत्पन्न जलोदर में अन्य मूत्रल औषधियों की अपेक्षा इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। जब वृक्क का कार्य ठीक होता रहता है उस अवस्था में यह अच्छा कार्य करती है। इसमें उपस्थित पोटैशियम् के लवण इसमें के कार्यकारी क्षाराभ के कार्य को बढ़ाते हैं। उन रोगियों में जिनके मूत्र में अल्ब्यूमिन अधिक रहता है उतना अच्छा मूत्रल प्रभाव नहीं पड़ता। यकृत, वृक्क, उदरावरण आदि अवयवों में जब बहुत अधिक अवयवीव विकार हो जाता है तब इससे केवल अस्थायी लाभ होता है। शोथ में इसको पीस कर गरम कर लेप भी करते हैं। (२) हृद्रोग में कास, श्वास, जलोदर एवं पैर की सूजन कम करने के लिये कुटकी, चिरायता एवं सोंठ के साथ इसका प्रयोग करते हैं। हृदय पर इसकी क्रिया कुछ डिजिटैलिस सदृश होती है। (३) कामला में पित्त के निर्हरण के लिये इसका प्रयोग करते हैं। (४) कफयुक्त श्वास में तथा श्वसनिकाशोथ में सोंठ तथा वच के साथ इसको देने से कफ निकलता है। अधिक मात्रा से वमन होकर भी कफ निकल जाता है। (५) इसके शाक का उपयोग शोथ में तथा कुपचन में करते हैं। (६) अभिष्यन्द आदि नेत्र रोगों में इसकी ताजी जड़ मधु में पीस कर आँख में लगाते हैं तथा आंतरिक प्रयोग भी करते हैं। (७) वृश्चिकदंश, सर्पदंश, मूषिकविष आदि में इसका बाह्य एवं आंतरिक प्रयोग लाभदायक माना जाता है। (८) रसायन के लिये इसके मूल के उपयोग का विधान है। मात्रा-मूल-स्वरस ६ मा०-१ तो०; पत्रस्वरस १-२ तो०। वामक-मूल चूर्ण, ५-१० माशा।