भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५७३ १०६. नील हिं०-नीली, नीली वृक्ष, लील । म०-गुली, नील । बं०-नील । मा०-लील । गु०-गली । क०-गेली । ता०-अवरि । ते०-निली चेट्टु, अविरि । फा०-नील, नीलज, हिमामजजुन । अ०-नीलज, वस्मा । अं०- Indigo (इण्डिगो) । ले०-Indigofera tinctoria Linn. (इण्डिगोफेरा टिङ्क्टोरिआ, लिन.) । Fam. Legu- minosae (लेग्युमिनोसी) । पहले इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में नील रंग के लिये नीलहे साहेब लोग इसकी खेती करते थे । किन्तु इस समय कृत्रिम नील रंग के आने से इसकी खेती प्रायः नष्ट ही हो गयी है । इसका क्षुप-४ से ६ फीट तक ऊँचा होता है । शाखाएँ-पतली, दुर्बल, कोणदार, अल्परोमयुक्त एवं फैली हुई होती हैं । पत्ते-असम पक्षवत् संयुक्त पत्र होते हैं । पत्रक-३-६ जोड़े, शरपुंखा के समान, अंडाकार या अंडाकार लट्वाकार, ०.५-०.९ इञ्च लम्बे, पतले तथा कालापन लिये हुए हरे रंग के होते हैं । तोड़ने से इसके पत्ते सीधे टूटते हैं । पुष्प-पतली पत्रकोणज मंजरियों में हलके नीलाभ गुलाबी रंग के आते हैं । फलियाँ-पतली एक इञ्च तक लम्बी होती हैं, जिनमें ८ से १२ तक बीज होते हैं । इसकी कई अन्य जातियाँ होती हैं । इसकी जड़, पत्र, बीज तथा नील रंग का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन-इसके पौधों को सड़ा करके एक इण्डिकन् (Indican) नामक ग्लूकोसाईड् प्राप्त किया जाता है । इसके पौधे से ५०% तक नील प्राप्त किया जाता है । गुण और प्रयोग-नील रंग का बाह्यलेप दाहशामक, व्रणरोपण, त्वग्दोषहर, केशवर्धक एवं केशरंजक है । यह विषघ्न, यकृदुत्तेजक, शामक, विरेचन, अल्प मूत्रजनन, कासहर एवं कृमिघ्न है । अधिक मात्रा से पतले दस्त होते हैं । किन्तु अल्प मात्रा से इससे शौच साफ होता है । अन्य गुण गौण हैं । इसकी जड़ में भी यही गुण कम मात्रा में पाये जाते हैं । पक्षों में जड़ की अपेक्षा और कम गुण होता है । (१) यकृत् एवं प्लीहा वृद्धि तथा जलोदर में मूल का घन देते हैं । अर्श में इसके साथ-साथ नील तथा पत्तों का लेप भी करते हैं । इसका उपयोग कुकास तथा न्युमोनिया में भी होता है । (२) अपस्मार तथा लघु वातविकारों में नील देते हैं । (३) पागल कुत्ता काटने पर इसका स्वरस २ औंस की मात्रा में पिलाते हैं तथा दंशस्थान पर पत्तों का लेप करते हैं । इतनी अधिक मात्रा से कुछ शिरःशूल तथा विरेचन होता है । यह संखिया के विष में भी उपयोगी है । (४) त्वचा के विकार में नील का बहुत अधिक प्रयोग करते हैं । दग्धव्रण एवं जीर्णव्रण आदि में इसका लेप करने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं । खिजाबों में पत्तों का उपयोग किया जाता है । विषैले जन्तुओं के काटने पर इसका लेप उपयोगी है । मात्रा-नील १/२-२ र०; मूल का घन १-२ र०; क्वाथ ५-१० तो० । अथ शरपुङ्खः (सरफोंका) । तस्य नामलक्षणगुणानाह शरपुङ्खः प्लीहाशत्रुर्नीलीवृक्षाकृतिश्च सः । शरपुङ्खो यकृत्प्लीहगुल्मव्रणविषापहः । तिक्तः कषायः कासास्रश्वासज्वरहरो लघुः ॥ २१०॥ सरफोंका के नाम तथा गुण-शरपुंख, प्लीहाशत्रु और नीलीवृक्षाकृति (नीलवृक्ष के समान आकारवाला) ये सब नाम 'सरफोंका' के हैं । सरफोंका-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, लघु एवम्-यकृत, प्लीहा, गुल्म, व्रण, विष, कास, रक्तविकार, श्वास और ज्वर को दूर करता है । [२१०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA