भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७२ भावप्रकाशनिघण्टुः १०५. विशाला (महाकाल, इन्द्रायण भेद) सं०-विशाला, महाकाल। हिं०-लाल इन्द्रायण, महुरार, महर। म०-कौंडल, काकतौंडि, कवंड़ल। गु०- रातां इन्द्रायणां। बं०-माकाल। ता०-कुरट्टै। ते०-अव्वरगूद। क०-कालेमंदलि। अ०-हंजले-अहमर। फा०- हंजले सुर्स। ले०-Trichosanthes palmata, Roxb. (ट्राइकोसॅन्थिस् पामेटा, रॉक्स)। Fam. Cucurbitaceae (कुकु-बिटेसी)। इसकी विशाल आरोही लता झाड़ियों पर फैली हुई अथवा ऊँचे वृक्षों पर चढ़ी हुई पाई जाती है। शाखाएँ लम्बी तथा नीचे की ओर लटकी हुई रहती हैं। सूत्र (Tendrils) २-५ शाखाओं वाले होते हैं। पत्ते-२ १/२-५ इञ्च लम्बे तथा उतने ही चौड़े, दन्तुर, प्रायः पाणिवत् खण्डित, खण्ड ३-५ एवं प्रायः अधर तल पर फैली हुई गाढ़े रंग की गोल ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत एवं व्यास में २ १/२-३ इञ्च होते हैं। फल-१ १/२-२ इञ्च व्यास के गोल या दीर्घ वृत्ताभ, पकने पर लाल रंग के एवं १० नारंगी रंग की पतली धारियों से युक्त होता है। फल का छिलका मोटा होता है एवं मज्जा कृष्णाभ हरित होती है। बीज-दीर्घ वृत्ताभ एवं चिकने होते हैं। इसकी जड़ एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक ट्राइकोसॅन्थिन् (Trichosanthin) नामक कड़वा द्रव्य पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी फलत्वक् वामक किन्तु अल्प मात्रा में कफनिःसारक हैं। मज्जा भेदन है। मूल श्वयथुहर एवं ज्वरहर है। यद्यपि जंगली जाति के फल तीव्र विरेचक होते हैं किन्तु रोपित विशाला के फल पकाकर खाने योग्य हो जाते हैं। तमक श्वास, डिफ्थीरिया एवं गले के शोथयुक्त विकार तथा श्वासनलिका-शोथ में कफ चिपचिपा होकर श्वासावरोध होता है तब इसके फलत्वक् या मूल की छाल को थोड़ा सा चिलम में रख कर धूम्रपान कराते हैं जिससे वमन होकर कफ निकलने लगता है। कभी-कभी रक्त भी गिरता है। इससे श्वासावरोध कम होता है एवं गले की सूजन भी कम होती हैं। फुफ्फुस-शोथ में मूलत्वक् का क्वाथ देने से ज्वर एवं श्वासावरोध कम होता है। व्रणशोथ पर इसकी जड़ घिस कर लगाते हैं। स्तनशोथ, गलका, कार्यंकल आदि फोड़े पर इन्द्रायण की जड़ के साथ इसकी जड़ को शीतल जल में घिस कर मोटा लेप करते हैं। इसके फल, से सिद्ध गरी का तेल कर्णस्राव में डालते हैं तथा शिरःशूल एवं प्रतिश्याय में प्रयोग करते हैं। मात्रा-फलत्वक् १/२-१ र० दिन में ३ बार। अथ नीली (नील) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह नीली तु नीलिनी तूणी काला दोला च नीलिका। रञ्जनी श्रीफली तुच्छा ग्रामीणा मधुपर्णिका ।।२०७।। क्लीतका कालकेशी च नीलपुष्पा च सा स्मृता। नीलिनी रेचनी तिक्ता केश्या मोहभ्रमापहा ।।२०८।। उष्णा हन्युदरप्लीहवातरक्तकफानिलान्। आमवातमुदावर्त्तं मदं च विषमुद्धतम् ।।२०९।। 'नील' के नाम तथा गुण-नीली, नीलिनी, तूणी, काला, दोला, नीलिका, रञ्जनी, श्रीफली, तुच्छा, ग्रामीणा, मधुपर्णिका, क्लीतका, कालकेशी और नीलपुष्पा ये सब नाम 'नील' के हैं। नील-तिक्त रसयुक्त, रेचक, बालों के लिये हितकर, उष्णवीर्य, एवम् मोह, भ्रम, उदररोग, प्लीहा, वातरक्त, कफ, वायु, आमवात, उदावर्त्त, मदरोग और उग्र विष को दूर करने वाली होती है। [२०७-२०८]