भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५७१ इसके मूल में ऑल्फा एलटेरिन् (aelaterin), सॅपोनिन् (Saponin) तथा कुछ राल पाई जाती है । गुण और प्रयोग—इसकी फलमज्जा अत्यन्त कड़वी एवं तीव्र विरेचक है। इसकी १-२ रत्ती की मात्रा से २, ३ घंटे में पानी जैसे पतले दस्त होते हैं। इससे यद्यपि मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है तथापि इस कार्य के लिये इसका प्रयोग नहीं करते क्योकि इससे बहुत मरोड़ होती है। इसका अल्पमात्रा में शोषण होकर मूत्र एवं दुग्ध द्वारा उत्सर्ग होता है। इसकी अधिक मात्रा से विषैला परिणाम होकर मृत्यु होती है। इसकी विषैली मात्रा ०.६-१ ग्राम (४-८ रत्ती) एवं घातक मात्रा ४ ग्राम (३० रत्ती) है। एक स्त्री ने गर्भपात के लिए ६० रत्ती की मात्रा खाई किन्तु ५० घंटे में उसकी मृत्यु हुई । इसकी जड़ विरेचक एवं शोथहर है। बीजों में विरेचक गुण नहीं है। (१) कफप्रधान रोगों से इसका प्रयोग करते हैं। इससे स्रोतोवरोध दूर होता है। आमवात, संधिशोथ, जलोदर, कामला, यकृद्दाल्युदर, प्लीहोदर, तथा तीव्र विबन्ध में इसकी जड़ का चूर्ण सोंठ एवं गुड़ के साथ देते हैं। पाश्चात्य चिकित्सा में प्रयुक्त एक्स्ट्रॅक्टम कोलोसिन्थिडिस् कम्पोजिटम् (Extractum Colocynthidis Compositum) का भी व्यवहार किया जा सकता है। अनार्तव में मूल का उपयोग करते हैं। (२) इसकी जड़ को नूतन शोथ पर लेप करते हैं। स्तनशोथ तथा बच्चों के उदर आदि पर इसको जल में घिस कर लगाते हैं। (३) इसके बीजों के तैल का उपयोग बाल काले रहने के लिये करते है। विष चिकित्सा—कषाय द्रव्य (Dil. Tannic acid solution) से आमाशय प्रक्षालन के पश्चात् दुग्ध पिलाना चाहिये । मात्रा—फलचूर्ण १-२ १/२ रत्ती; मूलचूर्ण १-३ माशा । १०४. इन्द्रायण भेद हिं०—भाकुरा । म०—विसलंबी । बं०—गोमुक्त । गु०—कोठिबन । पं०—कचरी । ले०—Cucumis trigonus, Roxb. (कुकुमिस्र ट्राइगोनस्, रॉक्स.) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) । यह भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में खुली हुई शुष्क जगहों में कहीं-न-कहीं पायी जाती है। यह लता—लता जाति की वनौषधि प्रसरणशील एवं स्पर्श में कर्कश होती है। इसमें तंतु (Tendrils) निःशाख होते हैं। यद्यपि इसके लता पत्र नष्ट हो जाते हैं परन्तु इसकी जड़ भूमि के भीतर जीवित रहती है। समय आने पर उसी जड़ में से अंकुर निकल कर लता रूप में परिणत होता है। पत्ते—स्पर्श में कर्कश, १-२ इञ्च लम्बे तथा चौड़े (कभी- कभी और बड़े), गोलाकार किन्तु पाँच से सात भागों में विभक्त रहते हैं और प्रत्येक भाग किंचित् लम्बाई युक्त गोलाकार, अग्र पर गोल और कुछ दंतुर सा होता है। पुष्प—पीले रंग के और व्यास में १/२ इञ्च बड़े होते हैं। पुरुष जाति के फूल गुच्छों में और स्त्री जाति के फूल एक-एक करके आते हैं। फल—चिकने तरबूज के आकारवाले गोलाकार, किंचित् त्रिकोणाकार, १।। इञ्च लम्बे और १। इञ्च मोटे तथा १० हरी रेखाओं से युक्त होते हैं। पकने पर ये रेखाएँ हलके पीले रंग की हो जाती हैं। इसकी मज्जा कडुवी होती है। बीज—खेत एवं दीर्घ वृत्ताभ होते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में कोलोसिन्थिन (Colocynthin) या तत्सम पदार्थ पाया जाता है। बीजों से निकाला तेल जलाने के काम आता है। गुण और प्रयोग—इन्द्रायण के स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है। इसके मूल का क्वाथ सौम्य विरेचक होता है। इसके बीज शीतल, ग्राही तथा पित्त विकार में उपयोगी होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA