भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७० भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-उपर्युक्त इन्द्रवारुणी एवं विशाला के अतिरिक्त इन्द्रवारुणी का एक अन्य भी भेद पाया जाता है। ध० नि० ने भी ३ भेद लिखे हैं। १०३. इन्द्रायण हिं०-इनारुन, इन्द्रायण, इन्दायण, इन्द्रारुन। बं०-राखालशा। म०-इन्द्रावण, कडुजुंदावन, कडु इन्द्रायण। मा०-तूसणबेल, तूसतूंबा, तूस। गु०-इन्दरबरणा, इन्द्रावणा। क०-हामेक्के, हाबुमेक्के कायि। ते०-एतिपुच्छा, एटिपुच्छा, पुस्तकाय, पापर, एटि पुच्चकायि। ता०-पेयक्कूमुट्टी, पेदिकारि। कौड, तुम्बी, घोरूम्बा, तुम्बा। फा०- खुरबुज एतल्व, हिन्दबानहे तल्ख। अ०-इज्झल, अलकम। अं०-Colocynth (कोलोसिथ)। ले०-Citrullus colocynthis Schrad (सिट्रयुल्स् कोलोसिन्थ्िस् श्रँड)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। यह बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश, मध्य और दक्षिण भारत तथा राजपुताना आदि अनेक प्रान्तों में पाई जाती है। रेतीली भूमि में अधिक उत्पन्न होती है तथा गंगा, यमुना सोन, सरयू आदि नदियों के दियारे में बाहुल्य से देखने में आती है। जहाँ यह अधिक रहती है वहाँ दूसरे अन्न की उत्पत्ति अधिक परिमाण में नहीं होती। इस कारण किसान लोग इसको समूल नष्ट करने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। यह एशिया एवं अफ्रिका के उष्ण प्रदेशों में भी पाई जाती है। यह लता जाति की वनस्पति वर्षजीवी या बहुवर्षजीवी भी होती है। वर्षा ऋतु के सिवा सब ऋतुओं में मिलती है। वर्षा ऋतु में नदियों की बाढ़ के कारण रेतीली भूमि के पानी में डूबने से इसकी लता नष्ट हो जाती है, किन्तु जड़ सजीव रहती है और वही वर्षान्त के बाद अंकुरित होकर लता रूप में बढ़ करके वसन्त ऋतु तथा गरमी के दिनों में फूल, फल देती है। जिस भूमि में वर्षा का पानी इकट्ठा नहीं होता अथवा जहाँ नदियों की बाढ़ नहीं आती, वहाँ ऊँची भूमि वाली लता नष्ट नहीं होती, बल्कि वर्षा ऋतु में भी फूल-फल देती रहती है। फलों का संग्रह करना गरमी में ही अच्छा होता है, क्योंकि इसके फल कड़ी धूप के कारण खूब सूख जाते हैं और बिगड़ने नहीं पाते तथा बरसात में संग्रह किये हुए फल प्रायः सड़-गल कर खराब हो जाते हैं। इसकी लता बहुधा भूमि पर फैली एवं स्पर्श में अत्यन्त कर्कश होती है। इसके सूत्र (Tendrills) निःशाख या द्विशाख होते हैं। पत्ते-विषमवर्त्ती, २-२॥ इञ्च के घेरे में लम्बे-चौड़े, ऊपर से हलके हरे एवं नीचे से धूसर रंग के, स्पर्श में कर्कश, अनियमित कटे किनारे वाले तथा तरबूज के पत्तों के आकार वाले त्रिकोणाकार होते हैं। खेतों में रोपण की हुई इन्द्रायण के पत्ते बड़े एवं तरबूज के पत्तों के बराबर दिखलाई पड़ते हैं। फूल-पाँच पंखड़ी वाले, हलके पीले रंग के तथा व्यास में .५-.७ इञ्च होते हैं। फल-२-२॥ इञ्च के घेरे में गोलाकार, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर सन्तरे के समान पीले रंग के सफेद छींटेदार एवं चिकने होते हैं। फलों के भीतर किंचित् पीलापनयुक्त सफेद रंग की, सूखी हुई सुषिर एवं अत्यन्त कड़वी गूदी होती है और गूदी के बीच छोटे-छोटे १/४-१/६ इञ्च बड़े, चिपटे, तरबूज के बीज के आकार वाले, हलके भूरे रंग के बीज होते हैं। फल का छिलका-कोमल होता है। मूल एवं बीज विरहित फल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा में केवल अपक्व फल की सुखाई हुई मज्जा का व्यवहार करते हैं। इसके सभी अंग कड़वे होते हैं तथा इसकी सूखी गर्द नाक एवं आँखों में जाने से अत्यन्त प्रक्षोभ करती है। रासायनिक संगठन-इसकी फलमज्जा में एक कडुवा विरेचक क्षाराभ, विरेचक रालें एवं अल्प मात्रा में ग्लाइकोसाइड् पाया जाता है। ये सभी अनियत रूप (Amorphous) होते हैं इनके अतिरिक्त ऑल्फा एलंटेरिन् (aelaterin) आदि अन्य द्रव्य जो होते हैं उनको कोई विशिष्ट प्रभाव नहीं होता। छिलका निकाले फल में बीजों की मात्रा ७५% होती हैं। बीजों में १५% तैल, अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ, एक किण्व (Enzyme) एवं फाइटोस्टैरॉल (Phytosterol) द्रव्य होते हैं।