भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५६९ १०२. नागदन्ती नागदन्ती कटुस्तिक्ता रूक्षा वातकफापहा। मेधाकृद्विषदोषघ्नी पाचनो शोथनाशिनी ।। गुल्मशूलोदरव्याधिकुष्ठदोषनिकृन्तनी । (रा० नि०) सं०-हस्तिदन्ती (च० सू० अ० १), नागदन्ती (च० वि० अ० ८) । हिं०-हकूम, पुतेर, पुथरी, चुक । म०- घणसर । बं०-बरागाच्छ । ने०-अच । ते०-भुतन् कुसुम । ले०-Croton oblongifolius, Roxb. (क्रोटन् ऑब्लॉगिफोलिअस्, राक्स.) । Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी) । यह प्रायः समस्त भारत में विशेषकर दक्षिण कोंकण, लंका, बंगाल, बिहार एवं वर्मा में होता है। इसका वृक्ष- छोटे आकार का तथा दूर से देखने पर आम की तरह दिखाई देता है। मूलस्तम्भ-सीधा एवं छाल चिकनी तथा राख के रंग की होती है। पत्ते-६-१२ इञ्च लम्बे, सवृन्त, चिमड़े, एकान्तर तथा शाखाओं पर समूहबद्ध, दन्तुर, आयताकार या अंडाकार तथा चिकने होते हैं। पुष्प-एकलिङ्ग, हलके हरे रंग के, ५-१२ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल- गोल, मांसल, ४५ इञ्च बड़े एवं ६ धारियों से युक्त होते हैं। बीज-चिकने और भूरे रंग के होते हैं। मूल-ऐंठी हुई एवं कुछ चिपटी होती है। इसकी छाल मोटी, खुरदरी, भूरे रंग की एवं अन्दर से पीली एवं उस पर कुछ भूरे रंग के धब्बे होते हैं। मूलत्वक् का स्वाद कपूर की तरह तीता एवं सुगन्धयुक्त होता है। इसकी मूलत्वक् पत्र एवं बीजों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी मूलत्वक् शोथघ्न, ज्वरघ्न, रेचक, शिरोविरेचक एवं विषनाशक है। (१) तीव्र शोथयुक्त आभ्यन्तर विकार (Acute inflammatory conditions) जैसे-न्युमोनिया, फुफ्फुसावरण शोथ, अंडशोथ, यकृत् शोथ, फोड़ा तथा गलका आदि अवस्थाओं में इनको निर्गुण्डी तथा करञ्ज के साथ देने से लाभ होता है। इनमें इसका बाह्य लेप भी करते हैं। इसकी अधिक मात्रा से सिवाय विरेचन के कोई अन्य तीव्र परिणाम नहीं होता एवं विरेचन से लाभ ही रहता है। (२) ज्वर में नवसादर के साथ इसका उपयोग करते हैं। इससे यकृत् की क्रिया ठीक होकर पित्त की शुद्धि होती है एवं दूषित पित्त शौच द्वारा निकल जाता है तथा यकृतदाह कम होता है। यकृत के शोथ में यह बहुत ही उत्तम औषध है। (३) सर्पविष में इसको १ से २ तोला की मात्रा में हर दो घण्टे पर देते हैं। कोंकण में इसका बहुत प्रचार है। मात्रा-⅛-½ तोला सुगन्धि द्रव्यों के साथ। अथेन्द्रवारुणी महेन्द्रवारुणी च। (इन्द्रायण-बड़ी इन्द्रायण)। तयोर्नामगुणानाह ऐन्द्रीन्द्रवारुणी चित्रा गवाक्षी च गवादनी। वारुणी च पराऽप्युक्ता सा विशाला महाफला ।।२०३।। श्वेतपुष्पा मृगाक्षी च मृगैर्वारुर्मृगादनी। गवादनीद्वयं तिक्तं पाके कटु सरं लघु ।।२०४।। वीर्योष्णं कामलापित्तकफप्लीहोदरापहम् ।।२०५।। श्वासकासापहं कुष्ठगुल्मग्रन्थिव्रणप्रणुत् । प्रमेहमूढगर्भामगण्डामयविषापहम् ।।२०६।। 'इन्द्रायण' तथा 'बड़ी इन्द्रायण' के नाम और गुण-ऐन्द्री, इन्द्रवारुणी, चित्रा, गवाक्षी, गवादनी और वारुणी ये सब नाम 'इन्द्रायण' के हैं। दूसरी जो 'बड़ी इन्द्रायण' है, उसके नाम-विशाला, महाफला, श्वेतपुष्पा, मृगाक्षी, मृगैर्वारु और मृगादनी ये सब हैं। इन्द्रायण-बड़ी इन्द्रायण ये दोनों-स्वाद में तिक्त रस और विपाक में कटु रसयुक्त, सारक, लघु, उष्णवीर्य एवम् कामला, पित्त, कफ, प्लीहा, उदररोग, श्वास, कास, कुष्ठ, गुल्म, ग्रन्थि व्रण, प्रमेह, मूढगर्भ, आमदोष, गण्डरोग (गलगण्ड, गण्डमाला आदि) तथा विष को दूर करने वाली होती हैं। [२०३-२०६]