भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६८ भावलोकननिघण्टुः नोट-यहाँ दन्तिबीज का अर्थ बड़ीदन्ती (द्रवन्ती) का बीज उचित मालूम पड़ता है क्योंकि क्षुद्रदन्ती का बीज जयपाल नहीं है । १०१. जमाल गोटा (द्रवन्तीबीज) हिं०-जमाल गोटा। बं०, म०-जयपाल । पं०-जपोलोटा । गु०-नेपालो । ता०-नेवलिम् । ते०-नेपालवेमु । क०-नेपाल, जापालबीज । तुम्बे बेदअञ्जीर, तुम्बे बेदंजीरखताई । अ०-हब्बुरस्सलातीन । फा०-तुख्मे बेदअञ्जीर खताई । अं०-Croton oil seed (क्रोटन! ऑयल सीड) । ले०-Croton tiglium Linn. (क्रोटन् टिग्लिअम् लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह आसाम, बंगाल, ब्रह्मा तथा समस्त भारत में पाया जाता है । इसका वृक्ष-छोटा होता है और वह बारहो मास हरा-भरा रहता है । इसकी शाखायें रोमयुक्त छोटी-छोटी होती हैं। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, चौड़े अंडाकार, चिकने, नोकीले, दन्तुर और ३-५ शिराओं से युक्त होते हैं। फूल-हरिताभ पीत रङ्ग के मंजरी के रूप में आते हैं । फल-प्रायः १ इञ्च लम्बे अंडाकार और त्रिकोणयुक्त होते हैं । बीज-बादामी रंग के होते हैं जिन्हें जयपाल (जमाल गोटा) कहा जाता है। इसके बीज एवं बीज तैल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। शोधन-आयुर्वेद में शोधन करके ही जमाल गोटे का व्यवहार किया जाता है । जमाल गोटे के छिलके एवं दो दलों के बीच के अंकुर (जीभ) को निकाल, गोदुग्ध में ३ घण्टे तक स्वेदन करे। फिर शीतल होने पर गरम जल से धो, नींबू के रस के साथ पीस, मिट्टी के कोरे तवे पर बिछा कर सुखा ले । इस प्रकार करने से यह शुद्ध हो जाता है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एक स्थिर तैल. टिग्लिनिक् अम्ल (Tiglinic acid), क्रोटनिक् या क्वार्टेनिलिक अम्ल (Crotonic or quartenylic acid) एवं क्रोटन तैल (Croton oil) रहता है। क्रोटन तैल में मुख्य क्रियाशील तत्त्व क्रोटोनोलिक अम्ल (Crotonolic acid) होता है जिसके अतिरिक्त टिग्लिक् अम्ल या मैथिल् क्रोटनिक अम्ल (Tiglic acid or Methyl crotonic acid), क्रोटोनाल् (Crotonol) जिसमें रेचनगुण नहीं होता किन्तु जो त्वचा के लिये प्रक्षोभक होता है, कुछ उड़नशील तैल जिनके कारण इसमें गन्ध होती है एवे कुछ स्नेहाम्ल पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-यह कटु, उष्ण, विरेचन, दीपन, कफ वातहर, कृमि एवं जलोदर नाशक है। बाह्य प्रयोग में यह प्रक्षोभक एवं विस्फोटजनक है। यह अत्यन्त तीव्र रेचन है। अधिक मात्रा में यह विष है। इसके तैल के एक बूँद प्रयोग से पचीसो पतले दस्त होते हैं तथा पेट में बहुत मरोड़ होता है। इससे आन्त्र की श्लेष्मकला में कुछ शोथ भी हो जाता है। यद्यपि इससे कृमि भी गिरते हैं तथापि कृमि के लिये इसका प्रयोग नहीं करते, रक्तगत जलीय अंश को जब जल्दी कम करना रहता है तब इसका उपयोग करते हैं। (१) मस्तिष्कगत रक्तस्रावजन्य अर्धांग आदि में इसका प्रयोग करते हैं। इससे जलीय अंश कम होकर रक्तस्राव कम होता है तथा मस्तिष्कगत दबाव कम होता है । रोगी बेहोश हो तो तैल का एक बूँद मक्खन में मिलाकर जीभ पर लगा दें। (२) हृदयोदर में भी जलीय अंश को कम करने के लिये इसका प्रयोग करते हैं, किन्तु कभी-कभी इसके प्रयोग के बाद दस्त बन्द नहीं होते । (३) आमवात, सन्धिशोथ, वातविकार तथा तिलाओं के रूप में इसके तैल का बाह्य प्रयोग किया जाता है। विषप्रभाव-इसकी अधिक मात्रा से दाह, मरोड़, शूल, रक्तयुक्त दस्त एवं दौर्बल्य आदि लक्षण होते हैं। इसके निवारण के लिये जल में कत्था घिसकर या नींबू का रस पिलावे । मात्रा-बीज १/४-१/२ २०, तैल १/२-१ बूँद मक्खन के साथ ।