भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 618, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५६७ आकार भिन्न-भिन्न होता है। नीचे वाले पत्ते ६ से १२ इञ्च लम्बे, अञ्जीर के पत्तों के समान कटे किनारे वाले ३ से ५ भागों में विभक्त तथा किञ्चित् नुकीले होते हैं और ऊपर वाले पत्ते गूलर के पत्तों के आकार वाले २-३ इञ्च लम्बे और भालाकार होते हैं। फूल-एकलिंगी, गुच्छाकार हरिताभ रंग के होते हैं। फूल-किंचित् रोमश, ३ खण्ड का एवं करीब १/२ इञ्च लम्बा होता है। बीज-भूरे, बाह्यवृद्धि से युक्त तथा एरण्ड से छोटे होते हैं। इसकी जड़ एवं बीज औषधि के काम में आते हैं। जड़-अङ्गुली के बराबर मोटी, सीधी और कभी-कभी टूटी हुई होती है। जड़ की छाल भूरे रंग खुरदरी एवं काष्ठ भाग श्वेत, पीताभ, मुलायम किन्तु चीमड़ रहता है। यद्यपि जमालगोटे को दन्तीबीज कहते हैं तथापि जमालगोटा उक्त दन्ती का बीज नहीं है। संग्रहविधि-दन्ती तथा द्रवन्ती के हाथी दाँत के सदृश कठिन, स्थूल एवं श्याम ताम्र वर्ण के मूल को छोटी पीपल के चूर्ण एवं मधु का लेप करके कुशा के बीच में रख कर मिट्टी का लेप करके पुटपाक करे। फिर धूप में सुखा लें। इस प्रकार अग्नि एवं धूप से इसका विकाशी गुण नष्ट हो जाता है। (च. क. अ. १२) रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में राल एवं स्टार्च पाया जाता है। गुण और प्रयोग-दन्ती की जड़, कटु, उष्ण, शोथघ्न, ज्वरघ्न, रेचन एवं कफपित्तनाशक है। इसका उपयोग, उदर, जलोदर, शोथ, कामला, यकृद्विकार, आध्मान, गुल्म, अर्श एवं ज्वर में किया जाता है। इसके बीज अत्यन्त तीव्र रेचन होते हैं। इसके बीजों का तैल तिक्त, कटु, कषाय एवं अधोभाग दोषहर है तथा कृमि, कुष्ठ, कफ, वात और दूष्योदर को दूर करने वाला एवं दुष्टव्रणशोधक है। (१) ज्वर में तक्र के साथ इसकी जड़ देने से यकृत् की क्रिया ठीक होकर शौच के द्वारा दूषित पित्त निकल जाता है। (२) जलोदर, हृदयोदर, यकृदुदर, वृक्कविकृतिजन्य उदर आदि में इसकी जड़ का विरेचनार्थ प्रयोग करते हैं। कामला में भी विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। (३) श्वास में इसके पत्तों का उपयोग किया जाता है। (४) त्वचा के विकारों में इसका उपयोग किया जाता है। (५) इसके बीज एवं तैल जमालगोटे की तरह तीव्र रेचक होते हैं। प्रयोगविधि-इसको सौफ आदि सुगन्धित पदार्थों के साथ क्वाथ के रूप में देना चाहिये। अधिक मात्रा में यह क्षोभक एवं मादक है जिसके निवारण के लिये मधुर-स्निग्ध पदार्थ, शर्बत तथा दूध आदि का उपयोग करना चाहिये। मात्रा-१-३ माशा; बीज १/२-१ र०। अथ लघुदन्तीफलम्। तस्य गुणानाह क्षुद्रदन्तीफलं तु स्यान्मधुरं रसपाकयोः। शीतलं सृष्टविण्मूत्रं गरशोथकफापहम्॥२०१॥ छोटी दन्ती के फल का गुण-छोटी दन्ती का फल-रस और पाक में मधुर रसयुक्त, शीतवीर्य, मल और मूत्र को निकालने वाला, विष, शोथ तथा कफ का नाशक होता है। [२०१] अथ जयपालः (जमालगोटा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह जयपालो दन्तिबीजं विख्यातं तिन्तिडीफलम्। जयपालो गुरुः स्निग्धो रेची पित्तकफापहः॥२०२॥ जमालगोटा के नाम तथा गुण-जयपाल, दन्तिबीज, तिन्तिडीफल ये सब जमालगोटा के विख्यात नाम हैं। जमालगोटा-गुरु, स्निग्ध, रेचक एवं पित्त-कफ का नाशक होता है। [२०२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA