भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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५६२ भावप्रकाशनिघण्टुः जंगली असगन्ध-अवसादक, स्वापजनक एवं मूत्रजनक है । इसका अवसादक प्रभाव वातनाड़ियों पर होता है न कि हृदय पर । अल्प मात्रा में धतूरे जैसा मद इससे उत्पन्न होता है तथा कामोत्तेजना होती है । वद, ग्रन्थि, शोथ तथा फोड़े आदि पर इसके लेप से लाभ होता है । तिलाओं में इसका उपयोग किया जाता है । इससे सिद्ध तैल दौर्बल्य तथा वातव्याधि में मालिश के उपयोग में आता है । इसके बीज स्वापजनन एवं मूत्रजनन हैं । अधिक मात्रा में विषैले होते हैं । आमवात में इसके ताजे पत्ते बाँधते हैं । मात्रा-नागौरी असगन्ध चूर्ण ३-६ माशा । अथ पाठा (पाठी) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पाठाऽम्बष्ठाऽम्बष्ठकी च प्राचीना पापचेलिका। एकाष्ठीला रसा प्रोक्ता पाठिका वरतिक्तिका ।। १९९१।। पाठोष्णा कटुका तीक्ष्णा वातश्लेष्महरी लघुः । हन्ति शूलज्वरच्छर्दिकुष्ठातीसारहृद्रुजः । दाहकण्डूविषश्वासकृमिगुल्मगरव्रणान् ।।१९९२।। 'पाठ' के नाम तथा गुण-पाठा, अम्बष्ठा, अम्बष्ठकी, प्राचीना, पापचेलिका, एकाष्ठीला, रसा, पाठिका और वरतिक्तिका ये सब नाम 'पाठ' के हैं । पाठ-उष्णवीर्य, कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, लघु, वात-कफनाशक एवं शूल, ज्वर, वमन, कुष्ठ, अतीसार, हृद्रोग, दाह, कण्डू (खुजली), विष, श्वास, क्रिमि, गुल्म, उदररोग और व्रण को दूर करने वाली होती है । [१९९१-१९९२] प्राचीनों ने पाठा के दो भेद माने हैं। एक लघु पाठा तथा दूसरी राजपठा (बड़ी पाठा) इनमें से लघु पाठा यह सिसँम्पेलोस् पेरैरा (Cissampelos pareira) है । राजपठा या पाठा ही के स्थान पर इसी वर्ग की अन्य वनस्पतियों का भी उपयोग विभिन्न स्थानों में किया जाता है। साइक्लिआ पेल्टेटा (Cyclea peltata) एवं साइक्लिआ वर्मेनी (Cyclea burmanni)-यह केवल आसाम एवं खासिया पर्वत से पूर्व की तरफ तथा दक्षिण में पश्चिमी, पूर्वी घाट एवं कोंकण में पाई जाती है तथा दक्षिण में इन्हीं का अधिक प्रयोग छोटी एवं बड़ी पाठा के नाम से किया जाता है यद्यपि सि. पेरैरा भी वहाँ पाई जाती है । उत्तरी भारत में यह (साइक्लिआ) नहीं पाई जाती, किन्तु स्टिफेनिआ हर्नैण्डिफोलिआ (Stephania hernandifolia) नामक बड़ी जाति पाई जाती है, जिसे राजपठा कह सकते हैं । बंगाल की तरफ आकनादि नाम से इसका अधिक उपयोग किया जाता है । गुजरात तथा काठियावाड़ में इसी वर्ग की पातालगरुडी का उपयोग पाठा के स्थान पर करते हैं जो उचित नहीं है । एक ही वर्ग तथा स्वरूप-गुणादि में साम्य होने के कारण पाठा नाम से इनका उपयोग भिन्न-भिन्न स्थानों में किया जाता है । ९८. पाठा सं०-लघुपाठा, पीलुफला, अविद्धकर्णी । हिं०-पाठा, पाठ, पाढ, पाठी, पाढी, पुरइन पाठी । बं०-आकनादि, निमुक, एकलेजा । म०-पहाड़ वेल । गु०-वेणीवेल, करेढियुं । क०-षडवलि । ता०-अप्पाट्टा, पोंमुतूत्तै । गोवा०- पारवेल । ते०-पाटा, विरुबोड्डि । ले०-Cissampelos paeira Linn. (सिसँम्पेलोस् पेरैरा लिन.) । अं०- Velvet leaf (वेल्वेट लीफ) । Fam. Menispermaceae (मेनिसपर्मेसी) । यह इस देश के सभी उष्ण एवं साधारण भागों में सिंध, पंजाब, शिमला, देहरादून तथा दक्षिण में कोंकण से लंका तक पाई जाती है । एशिया, पूर्व अफ्रिका तथा अमेरिका के उष्ण प्रदेशों में भी होती है । यह लता-खुली हुई पथरीली जगहों में प्रायः छोटे वृक्षों और झाड़ियों पर फैली हुई पाई जाती है । शाखाएँ- पतली, सीधी एवं क्वचित् लोमयुक्त होती हैं। पत्र-लटूवाकार या कभी-कभी वृत्ताकार-वृक्काकार हृदयाकृति, एकांतर, १-४ इञ्च बड़े, नोकरहित एवं क्वचित् नुकीले रहते हैं । पर्णनाल प्रायः पृष्ठ भाग से जुड़ा हुआ तथा पृष्ठ के बारबर या