भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 612, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५६१ असगन्ध-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य, बलकारक अत्यन्त शुक्रवर्धक, रसायन एवं वात, कफ, श्वित्र (श्वेत कुष्ठ), शोथ और क्षय को दूर करने वाला होता है। [१८९-१९०] ९७. असगन्ध हिं०-असगन्ध, अश्वगन्धा, नागोरी असगन्ध। बं०-अश्वगन्धा, आसकन्द, ढोरगुंज। गु०-आसन्य। संथा०- घोड़ाइन, घोड़ाआकुन। क०-अंगरबेरु। ते०-पैन्नेरुगड्डु, पिल्ली आंड्रा, अश्वगन्धी। ता०-चुवदिगं। फा०- बहमनबरीं। अं०-Winter cherry (विंटरचेरी)। ले०-Withania somnifera Dunal (विथेनिआ सॉम्नीफेरा)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। असगन्ध इस देश के अनेक भागों के कुछ गरम और साधारण प्रान्तों में विशेषकर पश्चिम के शुष्क प्रदेशों में अधिक होती है। भारत के अतिरिक्त यह लङ्का, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, सिंध, भूमध्यसागरीय प्रदेश, उत्तमाशाअन्तरीप आदि देशों में पाई जाती है। मालवा में इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप-भंटा के क्षुप के समान सघन होता है। इसकी ऊँचाई-३-४ फीट की होती है। शाखायें-टेढ़ी-मेढ़ी तारकाकार रोमों से युक्त होती हैं। पत्ते-अखंड, लटवाकार, लगभग कुंठिताग्र, सरलधार से युक्त, २-४ इञ्च लम्बे १-२ इञ्च चौड़े, सूक्ष्म तारकाकार रोमों से युक्त, फलकमूल क्रमशः संकुचित एवं १/४-१/२ इञ्च तक लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-प्रायः ५ एक साथ सचूड़ाकार गुच्छों में, छोटे, हरिताभ या पीताभ पत्रकोणों में निकलते हैं। फल-पत्रदण्ड के पास १/४ इञ्च बड़े फल लगते हैं और वे प्रवृद्ध बाह्य कोश के पतले छिलके के परदे में रहते हैं। उनका आकार मटर के समान होता है और पकने पर वे लाल हो जाते हैं। फलों से दूध जम जाता है। बीज-वनभण्टा के बीज के समान छोटे-छोटे चिपटे बीज होते हैं। इसका क्षुप ३- ४ वर्ष के बाद नष्ट हो जाता है। इसकी जड़ १-१ १/२ फीट लम्बी, १-१ १/२ इञ्च मोटी, मूली की तरह शंक्वाकार, मजबूत, चिकनी, बाहर से हलके भूरे रंग की तथा अन्दर से श्वेत होती है। मूल का भन छोटा तथा स्टार्च युक्त होता है। ताजी जड़ में अश्व के मूत्र सदृश गन्ध आती है जिससे इसे अश्वगन्धा कहा जाता है। इसका स्वाद कड़वा तथा तीक्ष्ण होता है। नोट-असगन्ध दो प्रकार की होती है। एक जिसका ऊपर वर्णन किया गया है तथा दूसरी नागौरी असगन्ध के नाम से बाजार में बिकने वाली। इन दोनों की जड़ें भिन्न दिखलाई देने के कारण ऐसा अनुमान था कि नागौरी असगन्ध यह उपर्युक्त असगंध का कोई कृषिजन्य परिवर्तित रूप हो। किन्तु नई खोज से यह सिद्ध किया गया है कि नागौरी असगंध की स्वतन्त्र जाति (Species) ही होती है जिसका नया नामकरण विथेनिया अश्वगंधा (Withania ashwagandha) किया गया है। बाजीकर, बल्य तथा बृंहण गुण के लिये खाने के काम में बाजारी असगन्ध (नागौरी) लेना चाहिये तथा वातघ्न गुण के लिये अपस्मारादि व्याधियों में, लेपादि बाह्य प्रयोगों में तथा तैलादि में उपर्युक्त असगन्ध के मूल लेने चाहिये। इसका दुग्ध में स्वेदन करके शोधन कर लेना चाहिये। असगन्ध के पञ्चांग तथा विशेषकर जड़ का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में उड़नशील तैल, रवेदार विथेनियॉल (Withaniol C₂₅ H₃₅ O₅) नामक पदार्थ, हेण्ट्रियाकॉण्टेन् (Hentriacontane), फाइटोस्टेरॉल तथा तैल ये पदार्थ होते हैं। इनके अतिरिक्त इसमें ३ विभिन्न क्षाराभ (Alkaloid) होते हैं जिनमें से सॉम्निफेरिन् (Somniferin C₁₂ H₁₆ N₂) रवेदार होता है। गुण और प्रयोग-नागौरी (बाजारी) असगन्ध उष्ण, मधुर, बृंहणीय, बल्य, रसायन, वृष्य, एवं शोथहर है। क्षय, बालशोष, सुखण्डी, वार्धक्य आदि में इसके १/२-१ तो० चूर्ण को थोड़े घृत में गरम कर दूध एवं शर्करा मिलाकर देते हैं। यह उत्तम पौष्टिक है। बच्चों के लिये यह बहुत ही अच्छा है। इससे बच्चों का सूखना बन्द हो जाता है। स्त्रियों के कटिशूल एवं श्वेत प्रदर में इससे लाभ होता है। ३९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA