भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ५६३ अधिक लम्बा होता है। पुष्प-एकलिंग, छोटे, श्वेताभ, किंचित् पीत वर्ण के वर्षा काल में आते हैं। नरमंजरी लम्बी, अनेक पुष्पों से युक्त, मृदुरोमश तथा पत्रकोणों से निकली रहती है। फल-रक्त या नारंग वर्ण के, कुछ गोलाकार, ४ मि० मि० बड़े एवं रोमावृत रहते हैं। बीज-मुड़े हुए होते हैं। इसके मूल का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। इसकी सूखी हुई जड़ के लम्बे गोल, अंडाकार या दबे हुये टुकड़े, कभी-कभी लम्बाई में टूटे हुये मिलते हैं। ये व्यास में १/२ से ४ इञ्च तक मोटे एवं ४ इञ्च से लेकर ४ फीट तक लम्बे होते हैं। बाहर से ये भूरे बादामी रंग के तथा लम्बाई में झुर्रीदार होते हैं। इन झुर्रियों पर अनुप्रस्थ चक्राकार कुछ उभार रहते हैं। अन्दर से ये काष्ठमय, पीताभ भूरे रंग के एवं सुषिर होते हैं तथा इनमें स्पष्ट किन्तु प्रायः अपूर्ण चक्राकार रेखाएँ तथा मज्जक किरणें (Medullary rays) दिखलाई देती हैं। इनका स्वाद प्रारम्भ में कुछ मधुर एवं सुगन्धित तथा बाद में अत्यन्त कडुवा होता है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में ०.७२% क्षाराभ पाये जाते हैं जिसमें बेबीराइन (Bebeerine) भी रहता है। अल्प मात्रा में एक रवेदार डेयामेट्रीन (Deyamettin) नामक पदार्थ एवं एक राल पाई जाती है। गुण एवं प्रयोग-पाठामूल, उष्ण, तिक्त, ग्राही, स्तन्यशोधक, ज्वरहर, बल्य, बस्तिशोधक एवं मूत्रजनक है। अल्प मात्रा में इससे भूख बढ़ती है, अन्न का पाचन होता है तथा आंत्र की श्लेष्मलकला को बल मिलता है। अधिक मात्रा से पाखाना साफ होता है। सम्पूर्ण क्षाराभ का अनैच्छिक मांसपेशी पर अवसादक प्रभाव पड़ता है। इसका उपयोग कुपचन, अतिसार, ज्वर, मूत्रविकार, शोफ, कास, आर्तव-विकार एवं अर्श में किया जाता है। पैरेरारूट (Pareira root) जो कि कोण्ड्रोडेण्ड्रोन टोमेण्टोजम् (Chondrodendron tomentosum Ruiz & Pav.) की जड़ है उसके स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है। मूत्रमार्ग की श्लेष्मल त्वचा पर इसका शामक संग्राही एवं बलदायक प्रभाव पड़ता है। यह बस्ति के लिये उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। (१) मूत्रसंस्थान के विकारों में इसकी जड़ का फांट दिया जाता है। बस्तिशोथ, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, सान्द्रमेह, रक्तमूत्र तथा अन्य विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। इन विकारों में इसे अधिक मात्रा में देते हैं। इसके साथ मुलेठी तथा गुडूची का प्रयोग अधिक उपयोगी है। (२) कुपचन, उदरशूल, अतिसार, रक्तातिसार एवं ज्वरातिसार आदि विकारों में इसको अन्य सुगन्धि द्रव्यों के साथ देते हैं। मात्रा-चूर्ण १ से ३ माशा। प्रतिनिधि- (१) ले०-Stephania hernandifolia (Willd.) Walp. (स्टिर्फेनिआ हर्नैण्डिफोलिआ, वाल्प)। सं०- राजपाठा। बं०-आकनादि, नेमुक। यह भी देखने में पाठा के समान लता होती है किन्तु दोनों की पुष्पमंजरियों में अन्तर होता है। पाठा में बाह्यकोश के दल ४ (पुं.-पुष्प) और २ (स्त्री-पुष्प) एवं आभ्यंतर दल ४ संयुक्त (पुं.-पुष्प) और १ (स्त्री-पुष्प) होते हैं। इसमें बाह्य कोश के दल ६.१० एवं आभ्यंतर दल ३.५ होते हैं। इसमें पाठा की अपेक्षा पत्ते बड़े (३-५" x २ १/२-४") और शिराजाल कम सघन होता है। इसके फल बड़े एवं बीज मुड़कर करीब-करीब गोल हो जाते हैं। इसमें कुछ सॅपोनिन् (Saponin) होते हैं। इसकी जड़ का भी उपयोग पाठा की तरह अतिसार, कुपचन तथा मूत्रविकारों में किया जाता है। इसका सत्त्व मेढक के लिये अत्यन्त विषैला होता है। (२) ले०-Cyclea peltata H. f. & T. (साइक्लिआ पेल्टेटा)। सं०-राजपाठा भेद। म०-पाडल, पाडावल। गु०-कालीघाट। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA