भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६४ भावप्रकाशनिघण्टुः यह लता आसाम तथा खासिया से पूर्व की तरफ एवं दक्षिण में कोंकण, माथेरान, महाबलेश्वर तथा सिलोन तक पाई जाती है। इसकी शाखाएँ—धारीदार एवं अल्प रोमश होती हैं। पत्ते—पतले, रोमश, ३-६" × २-४" बड़े एवं १-२ १/२" लम्बे पर्णवृन्त से युक्त रहते हैं। पर्णवृन्त पाठा की तरह ही फलक से पृष्ठ की ओर जुड़ा रहता है। पुष्प— बहुत छोटे, हरे रंग के एवं फल—वृक्काकार तथा रोमश रहते हैं। इसी का एक और भेद सा. वर्मेनी (C. burmanni Miers.) भी पाया जाता है। लघु पाठा (सि. परेरा) में बाह्य कोश के दल आपस में मिले नहीं रहते किन्तु इसमें ये मिले हुवे तथा संख्या में ४-८ होते हैं। दक्षिण में पाठा नाम से इसका बहुत उपयोग किया जाता है। इसके पंचांग का उपयोग होता है। गुण और प्रयोग—यह कड़वी, वातहर, स्वेदजनक एवं मूत्रजनक है। छोटे बच्चों के उदर शूल, आँव, अतिसार एवं अर्श में इसकी जड़ पीस कर देते हैं। इसके साथ अतीस एवं करंज देते हैं। पैत्ति कुपचन में इसका स्वरस सोंठ के साथ देते हैं। प्रमेह में मट्ठे के साथ जड़ देते हैं। मात्रा—मूल चूर्ण १/२ से १ माशा। अथ श्वेता त्रिवृत् (निसोत श्वेत)। तस्या नामगुणानाह श्वेता त्रिवृत् त्रिभण्डी स्यात् त्रिवृता त्रिपुटाऽपि च। सर्वानुभूतिः सरला निशोत्त्रा रेचनीति च ॥१९३॥ श्वेता त्रिवृद्रेचनी स्यात्स्वादुरुष्णा समीरहत्। रूक्षा पित्तज्वरश्लेष्मपित्तशोथोदरापहा ॥१९४॥ सफेद निसोत के नाम तथा गुण—श्वेता त्रिवृत्, त्रिभण्डी, त्रिवृता, त्रिपुटा, सर्वानुभूति, सरला, निशोत्रा और रेचनी ये सब नाम सफेद निसोत के हैं। सफेद निसोत—रेचक, स्वादु, उष्णवीर्य, रूक्ष, वातनाशक एवं पित्तज्वर, कफ, पित्त, शोथ और उदररोग को दूर करने वाली होती है। [१९३-१९४] ९९. निसोत हिं०—निसोत, निशोथ, पितोहरी। बं०—तेउड़ी, तिउरी, दूधकलमी। म०—निशोत्तर, तेंड, फुटकरी, शेतवड। क०—तिगडे। ते०—तेल्ल, तेगड़। ता०—शिवदै, चिवदै। गु०—नसोतर। अ०—तुर्बुद। अं०—Turpeth root (टरपेथ रूट); Indian Jalap (इंडियन जालप)। ले०—Operculina turpethum, Silva Manso (ऑपेक्युलिना टर्पेथम्, सिल्वा मॅन्सो); Syn. Ipomoea turpethum R. Br. (आइपोमिआ टरपेथम्)। Fam. Convolvulac (क्वॉन्वॉल्व्यूलेसी)। निशोत इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में ३००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। बगीचों में लगाई हुई भी मिलती है। लंका, मलाया द्वीप एवं ऑस्ट्रेलिया में भी यह अधिक होती है। यह लता जाति की वनौषधि बारहो मास पाई जाती है परन्तु वर्षा ऋतु में विस्तार से फैली अधिक देखने में आती है। इसका काण्ड—तीन धार वाला होता है इसलिये इसको त्रिवृता कहते हैं। यह बहुत लम्बा, आरोही तथा ऐंठा हुआ रहता है। पुराना होने पर यह कुछ कड़ा, भूरे रंग का तथा मृदु रोमश हो जाता है। स्राव कुछ-कुछ दुग्धसदृश होता है। पत्ते—नीचे के पत्ते चौड़ाई लिये हुए लट्वाकार, हृद्गत, प्रायः २-४ इञ्च लम्बे, १/२ से ३ इञ्च तक चौड़े, लम्बाग्र तथा तीक्ष्णाग्र होते हैं। ऊपर के पत्ते प्रायः आयताकार, कुण्ठित रोमश अग्रयुक्त एवं सवृन्त (वृन्त .७५-३ इञ्च लम्बे) होते