भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हैं। पुष्प-घण्टिकाकार सफेद तथा २-३ इञ्च लम्बे होते हैं। परागाशय (Anthers) जल्दी ही आपस में ऐंठ जाते हैं। फल- ½-⅔ इञ्च बड़े तथा गोल होते हैं। फलत्वक् का बाहरी भाग जब फट जाता है तो भीतरी पारदर्श परदा रह जाता है जिसके अन्दर दो गह्वर और ४-१ काले एवं चिकने बीज होते हैं। इसकी जड़ लम्बी, पतली, मांसल एवं बहुत शाखायुक्त होती है। बाहर से भूरे या अरुणाभ धूसर रंग के ½-२ इञ्च तक मोटे तथा एक तरफ फटे हुए टुकड़े मिलते हैं। इस पर बाहर से गहरी धारियां होती हैं जिससे यह देखने में रस्सी की तरह दिखलाई देती है। इसका भग्न छाल में छोटा एवं काष्ठ में रेशेदार होता है। इसमें साधारण गन्ध एवं स्वाद में यह अरुचिकर होती है। आयुर्वेद में दो प्रकार की त्रिवृत् का वर्णन किया गया है। एक अरुण (श्वेताभ) या दूसरी श्याम (काली) रंग की। काली निशोथ अधिक तीव्र होने के कारण मूर्च्छा, दाह, भ्रम आदि उपद्रव करती है। अधिक दोष होने पर तथा क्रूरकोष्ठवालों के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। अच्छी भूमि में उत्पन्न, गम्भीर, श्लक्ष्ण तथा सरल मूल को लेकर उसके भीतर का काष्ठ भाग निकाल दें और बाहरी त्वचा को सुखाकर रख लें (च० अ० अ० ७)। बाजार में इसमें काण्ड के टुकड़े भी मिले रहते हैं जिनमें विरेचक गुण कम रहता है। वास्तव में निसोत की एक ही लता पाई जाती है। बाजार में श्वेत और कृष्ण ये भेद बिकते हैं और यह चिन्नार नामक लता (जिसके मूर्वा होने की अधिक संभावना है) के काण्ड हैं। वास्तविक निसोत कहीं-कहीं विधारा नाम से भी बेची जाती है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में ५-१०% एक राल पाई जाती है जिसका कुछ भाग ईथर में घुलनशील रहता है जो ऑल्फा-टर्पेथिन् (A-turpethin) एवं बीटा-टर्पेथिन (B-turpethin) का मिश्रण होता है। ईथर में अविलेय राल को टर्पेथिन् (Turpethin) कहते हैं। राल के अतिरिक्त कुछ उड़नशील तैल, वसायुक्त द्रव्य, अल्ब्यूमिन, स्टार्च, पीत रञ्जक पदार्थ, लिगनिन् एवं लौहऑक्साइड पाया जाता है। गुण और प्रयोग-निशोथ विरेचक, भेदनीय एवं अधोभागहर है। यह सुखविरेचनों में श्रेष्ठ मानी गई है। पाश्चात्य चिकित्सा में प्रयुक्त जालप (Jalap) की तरह ही इसके भी गुण हैं। इससे पतले एवं पीले रंग के दस्त होते हैं। पेट में मरोड़ न हो इसलिये इसके साथ सोंठ जैसे सुगन्धि पदार्थ तथा सैंधव का उपयोग किया जाता है। जालप की अपेक्षा यह अल्प एवं विलम्ब से कार्य करती है इसलिये इसकी अपेक्षा अधिक मात्रा में देना पड़ता है किन्तु इससे किसी प्रकार का दुष्परिणाम नहीं होता। इसका स्वाद एवं गन्ध भी हृल्लासकारक नहीं होती। ज्वर, रक्तपित्त, अर्श, विसर्प, वातशोफ, कामला एवं राजयक्ष्मा आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। वातरोग, विशेषतः आघातयुक्त या खिन्नवृत्ति रहने पर यह उपयोगी है। अर्श, उदर एवं गुल्म में इसकी शाक का उपयोग करते हैं। मात्रा-३-५ माशा। अथ श्यामा त्रिवृत् (काली निसोत)। तस्या नामानि गुणांश्चाह त्रिवृच्छ्यामाऽर्द्धचन्द्रा च पालिन्दी च सुषेणिका। मसूरविदला काली कैशिका कालमेशिका ॥१९५॥ श्यामा त्रिवृत्ततो हीनगुणा तीव्रविरेचिनी। मूर्च्छादाहमदभ्रान्तिकण्ठोत्कर्षणकारिणी ॥१९६॥ 'काली निसोत' के नाम तथा गुण-श्यामा, त्रिवृत्, अर्धचन्द्रा, पालिन्दी, सुषेणिका, मसूरविदला, काली, कैशिका और कालमेशिका ये सब 'काली निसोत' के नाम हैं। काली निसोत सफेद निसोत की अपेक्षा हीन गुणवाली तथा तीव्र रेचक होती है एवं मूर्च्छा, दाह, मद और भ्रान्ति को उत्पन्न करने वाली एवं कण्ठ का उत्कर्षण करने वाली होती है (पृष्ठ ३९८ भी देखें)। [१९५-१९६]