भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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गुडूच्यादिवर्गः ५५७ ९२. विदारीकन्द (२) क्षीरविदारी हिं०-बिलाईकन्द, विदारीकन्द, भुइकुम्हड़ा। बं०-भुइ कुमड़ा। म०-भुईकोहला। गु०-विदारीकन्द। क०- नेलकुम्बल। ते०-मत्तपलतिगा, नेल्लगुम्मुडु। मल०-मोतलकंद। ता०-फलमोदिक। ले०-Ipomoea digitata Linn. (आइपोमिया डिजिटॅटा लिन.)। Fam. Convolvulaceae (कॉन्वॉल्व्युलेसी)। यह भारतवर्ष के उष्ण कटिबंध में विशेषकर आर्द्र प्रदेशों जैसे बंगाल, आसाम आदि में पाया जाता है। यह लता जाति की वनस्पति झाड़दार और विस्तार में फैलने वाली होती है। पत्ते-३-७ इञ्च के घेरे में हाथ के पंजे के समान ५-७ भागों में विभक्त रहते हैं। फूल-नलिकाकार, चौथाई इञ्च गोल ऊपर का भाग १॥ इञ्च से २॥ इञ्च के घेरे में होता है और यह बैंगनी रंग का दिखाई पड़ता है। फल-चार छिलके वाले गोलाकार छोटे-छोटे होते हैं और वे झूमकों में आते हैं। उनके भीतर एक प्रकार की पर्तदार रूई से ढँके हुये त्रिकोणाकार अर्द्धगोल बीज रहते हैं। बीजों के रोपण करने से लता उत्पन्न होती है। इसके नीचे जो बन्द बैठता है वह रतालू के आकार का होता है इसका वजन एक सेर से अधिक नहीं होता। कन्द बाहर से भूरे रंग का तथा खुरदरा होता है। काटने पर अन्दर से यह श्वेत रंग का दिखाई देता है तथा उसमें से बहुत क्षीर निकलता है। इसकी सुखाई हुई कचरी बहुत हलकी रहती है तथा उसमें मंडल दिखलाई देते हैं। इसका स्वाद पिष्टमय, कुछ कसैला एवं कडुवा सा होता है। रासायनिक संगठन-इसके कन्द में पिष्टमय पदार्थ अधिक होता है। इसके अतिरिक्त १०% शर्करा एवं अत्यन्त अल्प प्रमाण में जालप में पायी जाने वाली आनुलोमिक राल होती है। गुण और प्रयोग-यह अनुलोमक, पित्तसारक, स्तन्यजनक, स्नेहक तथा उत्तम पौष्टिक है। इससे भूख लगती है, अन्न पचता है, शौच साफ होता है, शरीर का वर्ण सुधरता है एवं वजन बढ़ता है। काडलीव्हर तैल से अधिक अच्छा इससे कार्य होता है। किसी भी कारण से शिथिलता आयी हो और वजन कम हुआ हो तो इसके चूर्ण को घृत में भूनकर दूध एवं शर्करा के साथ पेया बनाकर देने से बहुत जल्दी वजन बढ़ता है। यकृत् एवं प्लीहावृद्धि में इसका चूर्ण देने से पित्तस्राव ठीक होकर शौच साफ होता है। दुग्धवृद्धि के लिये द्राक्षासव के साथ इसे देते हैं। मात्रा-कन्द चूर्ण १/४-१/२ तोला। अथ मुशलीकन्दः। तस्य लक्षणगुणानाह तालमूली तु विद्वद्भिर्मुशली परिकीर्त्तिता। मुशली मधुरा वृष्या वीर्योष्णा बृंहणी गुरुः। तिक्ता रसायनी हन्ति गुदजान्यानिलं तथा ॥१८३॥ काली मूसली के नाम तथा गुण-विद्वान् लोग 'तालमूली' ही को 'मुशली' कहते हैं, अर्थात् तालमूली, मुशली ये दोनों नाम 'काली मूसली' के हैं। काली मूसली-मधुर तथा तिक्त रस युक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), उष्णवीर्य, बृंहण (रक्तादिधातुवर्धक), गुरुपाकी, रसायन एवम् अर्श (बवासीर) तथा वात का नाशक होता है।।१८३] मुसली दो प्रकार की होती है। काली एवं सफेद। काली मुसली का लेटिन नाम कर्बुलिगो ओर्किओइडिस् (Curculigo orchioides) एवं सफेद मुसली का एस्पेरगस् एडस्केण्डेन्स् ((Asparagus adscendens) है। जो दो विभिन्न वर्गों की है। कुछ लोग क्लोरोफाइटम् एरूण्डिनेसिअम् (Chlorophytum arundinaceum) को सफेद मुसली मानते हैं। यहाँ पर इनका अलग-अलग वर्णन किया गया है। ९३. काली मूसली हिं०-स्याह मूसली, काली मूशली। म०, गु०-काली मूसली। बं०-तालमूली। क०-नेलताल। ते०- नेल तडि गड्डुा। ता०-निलधनैका। पं०-स्याह मूसली। मा०-काली मूसली। फा०-मुशली स्याह। अ०-