भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५४४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसके पत्ते तथा बीजों के गुण-कपास के पत्ते-वायुनाशक, रक्त तथा मूत्रवर्धक होते हैं एवम् कर्णपिडका (कान की फुन्सी), कर्णनाद (कान में शब्द होना) और कर्णपूयास्राव (कान से पीव का आना) इन सबको नाश करने वाले होते हैं। कपास के बीज-दुग्धवर्धक, वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, कफकारक तथा पाक में गुरु होते हैं। [१५१-१५२] ७५. कपास हिं०-कपास, रूई। म०-कापसी, कापूस। गु०-बोण, कपास। बं०-कार्पास, तुला। ते०-पत्तिचेट्टु, कार्पासमु। क०-हत्ति। ता०-परुक्ति। फा०-पंबः। अ०-नवातुलकुल। अं०-Cotton Plant (कॉटन प्लॅण्ट), Indian Cotton (इण्डियन कॉटन)। ले०-Gossypium herbaceum Linn. (गॉसिपिअम् हर्बेंसिअम् लिन.); Fam. Malvaceae (मालवेसी)। कपास के बीज के नाम-हि०-बिनौला। म०-सरकी। गु०-कपासिया। मा०-कांकड़ा। अ०-हब्बुलकुत्न। फा०-पंबः दाना। कपास या रूई यह सुप्रसिद्ध द्रव्य है। भारतवर्ष के अनेक भागों में बहुलता से इसकी खेती की जाती है। मिस्र, अमेरिका तथा संसार के अन्य उष्ण प्रदेशों में भी इसकी खेती की जाती है। यह गुल्म जाति की वनस्पति ४-५ फीट तक ऊँची होती है। इसके पत्ते-हाथ के पंजे के समान कई भागों में विभक्त रहते हैं। प्रायः ३ से ७ भाग तक देखने में आते हैं। फूल-घंटाकार पीले रंग के होते हैं, उनके बीच का हिस्सा बैंगनी रंग का होता है। फल-डोडी या फल गोलाकार होता है तथा उसके भीतर सफेद रूई से लिपटे हुये ५-७ बीज होते हैं। बीज-किंचित् काले रंग के, चने के समान गोल होते हैं और उनके भीतर सफेद मज्जा होती है। जड़-बाहर से पीले रंग की तथा अन्दर से सफेद होती है। जड़ की छाल गंधयुक्त, पतली, चिमड़, रेशेदार, धारीदार एवं करीब १ फीट तक लम्बी होती है। छाल का स्वाद कुछ तीता एवं कषाय होता है। प्रतिवर्ष प्रायः चौमासे के आरम्भ में खेतों में बीजों का रोपण करते हैं और फाल्गुन-चैत में रूई संग्रह कर पौधे को काट कर खेत साफ कर देते हैं। जाति-इसकी निम्नलिखित अन्य जातियाँ भी पाई जाती हैं। देशभेद से भी यह अनेक प्रकार का होता है। उद्यान कार्पास-सं०-उद्यानकार्पास। हिं०-नर्मा। म०-देवकापसीण। गु०-हिरवणी। पं०-कपास। संता०- बुदिकरकोम। ले०-Gossypium arboreum Linn. (गॉसिपिअम् आर्बोरिअम् लिन.)। यह एक प्रकार की कपास होती है, जिसका बागों में रोपण करते हैं। इसके पौधे-बहुवर्षायु, ८-१० फीट तक ऊँचे होते हैं। पत्ते और फल भी कुछ बड़े होते हैं तथा फूल लाल रंग के होते हैं। अरण्य कार्पासी-सं०-भारद्वाजी (च० सू० अ० ४, रा० नि०)। हिं०-जंगली कपास, वनकपासी। म०- रानकापूस। ले०-Thespesia lampas Dalz & Gibs (थेस्पेसिआ लॅम्पस् डा., गि.)। यह जाति जंगलों में स्वयं उत्पन्न होती है। इसके क्षुप-झाड़ीदार, दृढ़ तथा ४-६ फीट ऊँचे होते हैं। पत्ते- करतलाकार, ३ खण्डयुक्त या अखण्ड एवं व्यास में ४-५ इञ्च होते हैं। फूल-पीले रंग के तथा मध्य में प्रायः लाल रंग के होते हैं। इसकी रूई कुछ पीताभ होती है। रासायनिक संगठन-कपास की जड़ की छाल में एक रंगहीन या पीताभ अम्ल राल ८% तक पाई जाती है जो आक्सीजन के संयोग से चमकीले रक्ताभ भूरे रंग की हो जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें डिहाइड्रोक्सि बेञ्जोइक एसिड (Dihydroxy benzoic acid), सॅलिसिलिक् एसिड (Salicylic acid), स्नेहाम्ल, बिटेन (Betaine), सेरिल ॲल्कोहोल् (Ceryl alcohol), फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol), शर्करा एवं फेनॉल के सदृश दो पदार्थ पाये जाते हैं। बीजों में १०-२९% हलके पीले रंग का गन्धहीन तथा स्वादहीन तैल पाया जाता है जिसमें गिलसराइड्स, स्नेहाम्ल, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA