भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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गुडूच्यादिवर्गः ५४३ चीन में अरॅलिआ क्विन्क्वीफोलिआ (Aralia quinquefolia; Fam. Araliaceae) नामक एक पौधा पाया जाता है जिसे वहाँ जिन्सेंग (Ginseng) कहते हैं। इसकी जड़ को वहाँ अत्यन्त प्रभावशाली औषध मानते हैं। संभवतः इसका कारण इसका मानवाकृति से सादृश्य हो सकता है। इसको वहाँ के चिकित्सक रोग निवारक एवं जनाव्याधि विनाशक मानते हैं। लक्ष्मणा के वर्णन में 'पुत्रकाकार' का अर्थ यदि मानवाकृति कंद करे तो दोनों में पर्याप्त साम्यता मालूम होती है क्योंकि जितना महत्त्व अपने यहाँ लक्ष्मणा को दिया जाता है वैसा ही जिन्सेंग को चीन में दिया जाता है। इसका पौधा छोटा एवं पत्ते करतलाकार होते हैं। इसकी जड़ का स्वाद कुछ कड़ुआ तथा सुगनयुक्त होता है। निम्नलिखित वनस्पतियों को लक्ष्मणा नाम दिया हुआ मिलता है किन्तु इनके लक्ष्मणा होने में सन्देह है। (क) Ipomoea sepiaria Koen. (आइपोमिआ सेपिएरिआ कोएन्.)। Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्युलेसी)। गु०-हनुमानवेल। (ख) Atropa mandragora (एट्रोपा मेण्ड्रागोरा)। Fam. Atropaceae (एट्रोपेसी)। संभवतः इस वनस्पति का उचित नाम Mandragora autumnalis Spreng; Fam. Solanaceae (मॅण्ड्रागोरा ऑटम्नॅलिस् स्प्रे.; सोलेनेसी) है। (ग) Smithia geminiflora Roth (स्मिथिया जेमिनिफ्लोरा रॉथ)। Fam. Legumin osae (लेग्युमिनोसी)। (घ) Biophytum sensitivum (Linn.) DC. (बायोफाइटम् सेन्सिटिव्हम् डीसी.)। Fam. Geraniaceae (जिरॅनिएसी)। अथ स्वर्णवल्ली (सोनबेल) । तस्या नामगुणानाह स्वर्णवल्लीरक्तफला काकायुः काकवल्लरी । स्वर्णवल्ली शिरःपीडां त्रिदोषान्हन्ति दुग्धदा ।।१४९।। 'सोनबेल' के नाम तथा गुण—स्वर्णवल्ली, रक्तफला, काकायु और काकवल्लरी ये सब संस्कृत नाम 'सोनबेल' के हैं। सोनबेल—शिर की पीड़ा तथा त्रिदोष को दूर करती है एवं दूध को बढ़ाने वाली होती है। [१४९] ७४. स्वर्णवल्ली 'स्वर्णवल्ली' की लता कैसी होती है, इस सम्बन्ध में कोई वर्णन अन्य ग्रन्थों में नहीं मिलता। रक्तफला विशेषण के उल्लेख के कारण आकाशवल्ली इसका पर्याय नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त आकाशवल्ली का स्वतन्त्र रूप में भी भावप्रकाशकार ने इसी वर्ग में वर्णन किया है। प्राचीन ग्रन्थों में भी स्वर्णवल्ली का स्वतन्त्र रूप में कोई विशिष्ट प्रयोग वर्णित नहीं है। इसीलिये व्यवहार में भी इसका शुद्ध या व्यामिश्रित रूप उपलब्ध नहीं है। अथ कार्पासी (कपास) । तस्या नामगुणानाह कार्पासी तुण्डकेशी च समुद्रान्ता च कथ्यते । कार्पासकी लघु कोष्णा मधुरा वातनाशिनी ।।१५०।। 'कपास' के नाम तथा गुण—कार्पासी, तुण्डकेशी और समुद्रान्ता ये सब नाम 'कपास' के हैं। कपास—लघु, किञ्चित् उष्णवीर्य, मधुर तथा वातनाशक होता है। [१५०] अथ तत्पत्रबीजयोर्गुणानाह तत्पलाशं समीरघ्नं रक्तकृन्मूत्रवर्द्धनम् । तत्कर्णपिडकानादपूयास्रावविनाशनम् ।।१५१।। तद्बीजं स्तन्यदं वृष्यं स्निग्धं कफकरं गुरु ।।१५२।।