भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५२९ (२) इसके बीजों की मज्जा का चूर्ण या पाक (वानरीवटिका) आदि बनाकर वाजीकरण के लिये प्रयोग किया जाता है। प्रायः वाजीकरण के प्रत्येक योग में इसका उपयोग किया जाता है। (३) इसकी जड़ का क्वाथ या स्वरस वातनाडी-दौर्बल्य, अंगघात, अर्दित एवं अवबाहुक आदि वातरोगों में तथा ज्वर में भ्रम उत्पन्न होने पर देते हैं। यह मूत्रजनन होने के कारण इसे वृक्करोग में पिलाते हैं तथा शरीर पर लेप भी करते हैं। हैजा में इसके फांट में मधु मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। पक्वातिसार तथा रक्तातिसार में मूल का कल्क दिया जाता है तथा पथ्य में मूलसिद्ध दुग्ध का प्रयोग करते हैं (सु० उ० अ० ४०-७४)। श्लीपद में मूल का लेप किया जाता है। इसके मूलक्वाथ के धारण से योनिसंकोच होता है (भा० प्र०)। (४) इसके रोमों से बनाया हुआ मलहम स्थानिक उत्तेजक तथा साधारण स्फोटोत्पादक माना जाता है। मात्रा—बीजचूर्ण २-६ माशा; रोम ५-१० रत्ती। अथ मांसरोहिणी। तस्या नामगुणानाह मांसरोहिण्यतिरुहा वृत्ता चर्मकषावसा१,२। प्रहारवल्ली विकशा वीरवत्यपि कथ्यते ।। स्यान्मांसरोहिणी वृष्या सरा दोषत्रयापहा ।।१३२।। मांसरोहिणी के नाम तथा गुण—मांसरोहिणी, अतिरुहा (अग्निरुहा), वृत्ता, चर्मकषा, वसा, प्रहारवल्ली, विकशा और वीरवती ये सब पर्यायवाचक शब्द हैं। मांसरोहिणी—वीर्यवर्द्धक, सारक (दस्तावर) और त्रिदोषनाशक है।[१३२] ५८. मांसरोहिणी हिं०—मांसरोहिणी, रोहण, रोहिनी, रोहन, रोहिना, रकत रोहन। म०, बें०—रोहण। गु०—रोण, रोहणी। कोल०—रोहिनी। सन्ता०—रोहन। गोंड०—सोइमि। भील—रोयटा। ता०—शेम्मरम्। क०—स्वामीमर। ते०— सूमि, सोमिडमनु। अं०—Red wood tree (रेड वुड् ट्री)। ले०—Soymida febrifuqa A. Juss. (सॉयमिडा फेब्रीफ्युजा ए. जस्.)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। यह प्रायद्वीप से उत्तर की तरफ मेरवारा तक तथा मिर्जापुर एवं छोटा नागपुर आदि स्थानों में पाई जाती है। इसका वृक्ष—बहुत ऊँचा और स्तम्भ मोटा होता है। इसकी छाल—तिहाई इञ्च मोटी नीलापन युक्त खाकी अथवा कालापनयुक्त भूरे रंग की एवं कड़वी होती है। लकड़ी—लालीयुक्त भूरे रंग की और खूब टिकाऊ होती है। पत्ते—पक्षवत् तथा ९-१८ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्रक—२ से ४ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार या आयताकार, लगभग अवृन्त, चिकने, तिर्यक् आधार वाले तथा संख्या में ३ से ६ जोड़े होते हैं। नवीन पत्ते ग्रंथियों से युक्त और लाल होते हैं। पत्रक-दण्ड तथा पत्रक-सिरा सर्वदा लाल बनी रहती है। फूल—नन्हें-नन्हें हरियाली लिये सफेद रंग के अग्रद्य मंजरियों में आते हैं। फल—१ से २।। इञ्च बड़े, बहुत कठोर, भूरे लाल रंग के किन्तु पकने पर काले एवं अग्र पर खुल जाते हैं। प्रत्येक फल में अगणित पङ्खदार बीज होते हैं जो आषाढ़, श्रावण में पककर गिर जाते हैं। इसकी छाल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। नोट—चरक में बल्य एवं सुश्रुत में न्यग्रोधादिगण में इसका उल्लेख है। सुश्रुत के टीकाकार डल्हण ने रोहिणी का अर्थ कुटकी, कायफल, कडुवी तुम्बी तथा हरीतकी भेद आदि किये हैं। इसके रकतरोहक, रोहिनी आदि प्रचलित नाम मांसरोहिणी के समानार्थक मालूम होते हैं तथा इसकी छाल भी मांसवर्ण की होती है। इस दृष्टि से इसके मांसरोहिणी होने में सन्देह नहीं मालूम पड़ता। अन्य निघंटुकारों ने इसके गुणों में 'ग्राही' लिखा है जो अधिक उचित मालूम पड़ता १. चर्मकरी इति पाठा०। २. कुशा इति पाठा०—गुण तथा आकृति की दृष्टि से इसका वसा पर्याय अधिक उचित है। ३७ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA