भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 579

५२८ भावप्रकाशनिघण्टुः ५७. कपिकच्छू (केवाँच) हिं०-केवाँच, कौंच, कौंछ, केवाछ, खुजनी। बं०-आलकुशी। म०-खाज कुहिली, कुहिली, कवच। गु०- कवच, कौंचा। क०-नासुगुन्नी। ते०-पिल्ली अडुगु। ता०-पुनाइक काली, पुनैक्कल्लिल। पं०-कवांच, कूँच। अं०-Cowhage (काउहेज); Cowitch (काउइच)। ले०-Mucuna pruriens Bek. (म्युक्युना प्रूरिएन्स बेक्)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह भारतवर्ष के सभी मैदानी भागों में एवं लंका तथा वर्मा में पाया जाता है। यह सभी उष्ण प्रदेशों में होता है एवं इसकी खेती भी की जाती है। इसकी लता-पतली, चक्रारोही, एकवर्षायु तथा चौमासे में अधिक होती है। पत्ते-त्रिपत्रक एवं २ १/२-५ १/२ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पत्रक-३-६ इञ्च लम्बे, पार्श्वपत्रक किञ्चित् हृद्वत् और लट्वाकार एवं अग्र्य पत्रक तिर्यगायताकार (Rhomboid), पतले तथा ऊपर चिकने किन्तु अधर तल पर तलशयी रोमों से युक्त होते हैं। पुष्प- नीलारुण (Purple), १ १/२ इञ्च तक लम्बे, सघन, लटकी हुई और ६-१२ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फली- २-३ इञ्च लम्बी, १/२ इञ्च चौड़ी, दोनों अग्रों पर विपरीत दिशाओं में टेढ़ी, कुछ फूली सी एवं लम्बाई में धारियों से युक्त होती है। यह भूरे रंग के करीब ०.१ इञ्च लम्बे सघन दृढ़ रोमों से ढँकी रहती हैं। ये रोम शरीर में लगाने से अत्यन्त खुजली उत्पन्न होकर दाह तथा सूजन उत्पन्न होती है। बीज-प्रत्येक फली में ५-६ काले चमकीले तथा अन्तभित्ति के पतले आवरण में ढँके रहते हैं। कौंच जंगली और बागी दो प्रकार का होता है, जंगली के फलियों के ऊपर तीक्ष्ण रोवें होते हैं। इसके शरीर में लगने से खुजलाहट, सूजन और पीड़ा उत्पन्न होती है। बागी किवाँच को बाग और खेतों में लगाते हैं। यह दो प्रकार का होता है। एक की फलियों के ऊपर रोवें कम होते हैं और उनमें अधिक तीक्ष्णता नहीं होती और दूसरे में रोवें नहीं होते हैं। दोनों की तरकारी बनती है। किन्तु इसकी तरकारी सर्वप्रिय नहीं होती। रोवें निकाल कर ही तरकारी बनाते हैं। नोट-चरक में ऋषभी नाम से बल्यवर्ग में, कच्छुरा नाम से पुरीषविरजनीय गण में एवं मधुरस्कंध में ऋष्यप्रोक्ता नाम से तथा सुश्रुत में कच्छुरा नाम से विदारिगन्धादि गण तथा वातसंशमनवर्ग में इसका उल्लेख है। 'पंजाब में सफेद रंग के कौंच के बीज पन्सारी बेचते हैं। ये चरक में लिखी हुई काकाण्डोला¹ नाम की सेम की जाति के बीज हैं' (श्री यादवजी कृत द्रव्यगुणविज्ञानम्, उत्तरार्ध द्वितीय खण्ड, पृष्ठ १७३)। इसके बीज, मूल एवं फली के ऊपर के रोमों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। चिकित्सा की दृष्टि से जंगली केंवाच के बीजों का ही व्यवहार करना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसमें राल, टैनिन, वसा एवं मॅन्गॅनीझ रहता है। बीजों की मज्जा की अपेक्षा ऊपर के छिलके में मॅन्गॅनीझ (Manganese) अधिक रहता है। गुण और प्रयोग-केवाँच के बीज पौष्टिक, उत्तेजक, वाजीकर एवं वातशामक होते हैं। फली के ऊपर के रोम उत्तम आंत्रकृमिघ्न होते हैं। इसकी जड़ वातनाड़ियों के लिये बल्य, उत्तेजक एवं मूत्रजनन है। रोम के स्थानिक प्रयोग से कण्डू, दाह, शोथ एवं स्फोट उत्पन्न होता है। (१) इसके रोमों को घृत, मधु या गुड़ के साथ गोला बनाकर केंचुए की बीमारी में खिला देते हैं। इससे प्रक्षोभ उत्पन्न होकर कृमि बाहर निकलते हैं। इसके पश्चात् विरेचन देना आवश्यक है। १. काकाण्डोलात्मगुप्तानां माषवत्फलमादिशेत् (चरक सू. अ. २७-३२)।

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 579, कुल 1167 में से · BharatKosha