भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५३० भावप्रकाशनिघण्टुः है। उपर्युक्त डल्हण की टीका के अनुसार यदि किसी द्रव्य को रोहिणी माना जाय तो उस अवस्था में 'सरा' यह उचित हो सकता है। **रासायनिक संगठन-**इसकी छाल में एक रंगहीन, जल में न घुलने वाला किन्तु मद्यसार में घुलनशील रालयुक्त कड़वा पदार्थ एवं अधिक मात्रा में टॅनिक ॲसिड् तथा गॅलिक ॲसिड् रहता है। **गुण और प्रयोग-**इसकी छाल शीत, ग्राही, तिक्त, कषाय, वृष्य, पौष्टिक, अल्प नियतकालिक, ज्वर- प्रतिबन्धक, सन्थानीय, व्रणरोपण एवं कण्ठशुद्धिकर है। अधिक मात्रा में इससे चक्कर एवं संज्ञानाश होता है। ओक वृक्ष की छाल की तरह इसका क्वाथ बाह्य प्रयोग में व्यवहार में लाते हैं। आन्तरिक प्रयोग के लिये चूर्ण का ही व्यवहार उचित है। (१) विसर्पों या जीर्णज्वरों में शरीर व आंतों में जब शिथिलता आती है तब इसका चूर्ण देते हैं। मलेरिया में इसका क्वाथ १ औंस की मात्रा में दिन में ३ बार देने से लाभ होता है। (२) पुरानी आंव तथा अतिसार में इससे अच्छा लाभ होता है। (३) इसकी छाल के क्वाथ से व्रण धोते हैं, बस्ति देते हैं तथा कुल्ले कराते हैं। **मात्रा-**त्वक् चूर्ण ३० रत्ती त्रिवार। अथ चिल्हकः 'चिल्ह' इति लोके तस्य नामगुणानाह चिल्हको वातनिर्हारः श्लेष्मघ्नो धातुपुष्टिकृत्। आग्नेयो विषवद्यस्य फलं मत्स्यनिषूदनम् ।।१३३।। चिल्हक के गुण-चिल्हक वातनाशक, कफ को दूर करने वाला, धातु की पुष्टि करने वाला और आग्नेय (अत्यन्त गरम) होता है और इसका **फल-**विषतुल्य मछलियों को मारने वाला होता है। [१३३] ५९. चिल्हक **हिं०-**चिल्ला, चिलर, चिल्हक। **म०-**मस्सी, करी लेंज। **संथा०-**चोरचो। **खर०-**बेरी। **कोल-**रोरी। **उडि०-**गिरटि। **ले०-**Casearia tomentosa Roxb. (केसएरिआ टोमेण्टोसा राक्स.)। Fam. Samydaceae (सॅमिडेसी)। यह सब जगह पाया जाता है। शाल वनों के पास या झाड़ीदार जंगलों में यह बहुत होता है। इसके **वृक्ष-**छोटे एवं शाखाएँ दिगन्तसम फैली हुई होती हैं। **छाल-**मोटी-भंगुर और चौकोर टुकड़ों में छूटती है। **काष्ठ-**पीताभ श्वेत, कठोर एवं खुरदरा होता है। **पत्ते-**आयताकार (छोटे लट्त्वाकार या अंडाकार), अधरपृष्ठ की नसों पर मृदु रोमश, २-७ इञ्च लम्बे, २ इञ्च चौड़े एवं दन्तुर होते हैं। पत्रसिरायें रक्ताभ होती हैं। **पुष्प-**हरिताभ पीत वर्ण के पुष्प नवीन टहनियों पर आते हैं। **फल-**मांसल, अंडाकृति, ३/४ इञ्च बड़े, कड़वे एवं ६ रेखाओं से युक्त होते हैं। फलों का चूर्ण पानी में डाल देने से मछलियाँ मर जाती हैं। इसके सभी भागों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। **नोट-**अन्य निघण्टुओं में इसका उल्लेख नहीं पाया जाता। इसकी एक दूसरी उपजाति केसिएरिआ एस्क्यू लेण्टा राक्स. (C. esculenta Roxb.), के मूल एवं पत्र का उपयोग सप्तरंगा या स्वर्णमूला नाम से यकृत्-वृद्धि, अर्श तथा यकृतोद्भव मधुमेह में किया जाता है। **गुण और प्रयोग-**जलशोथ में फल का गूदा खिलाते हैं, सर्वांग में छाल का लेप करते हैं तथा पत्रक्वाथ से स्नान कराते हैं। इससे पेशाब अधिक होती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA