भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५३१ अथ टङ्कारी । तस्या गुणानाह टङ्कारी वातजित्तिक्ता श्लेष्मघ्नी दीपनी लघुः । शोथोदरव्यथाहन्त्री हिता पीठविसर्पिणाम् ।। १३४ ।। नोट-टंकारी का उल्लेख अन्य निघण्टुओं में नहीं मिलता। लघु अग्निमन्थ (Clerodendrum phlomidis) को कहीं-कहीं 'टेकारी' कहते हैं जो 'तर्कारी' का अपभ्रंश मालूम पड़ता है। इसका वर्णन ४५९ पृष्ठ पर किया गया है। टंकारी नाम से फाइसेलिस मिनिमा (Physalis minima) का वर्णन आधुनिक उद्भिदवेत्ताओं ने किया है जिसका यहाँ वर्णन किया जा रहा है। यह विदेश से आने वाले मकोय की जाति के फल 'काकनज' (Physalis alkekenji Linn.) के प्रतिनिधि माने जाते हैं। डॉ० देसाई ने सम्भवतः इसका उल्लेख फा० इण्डिका (P. indica) नाम से किया है। ६० टंकारी सं०-टंकारी, लक्ष्मीप्रिया, चिरपोटा। हिं०-तुलसीपति। बं०-वनटेपारि। म०-थानमोडी, चिरबोटी, चिरबुटले। गु०-पोपटी, पर्पोटी। पं०-हुब्बककनज। क०-बोंडुल। ता०-सिसयक्कालिक। ते०-कुपण्टे। ले०-Physalis minima Linn. (फाइसेलिस मिनिमा लिन.)। Fam. Solanaceae (सोलेनॅसी)। यह सब प्रान्तों में पाया जाता है। इसका क्षुप-६-१८ इञ्च ऊँचा, नरम लोमयुक्त एवं वर्षजीवी होता है। पत्ते- २ इञ्च लम्बे, अंडाकार तथा दन्तुर होते हैं। पुष्प-घंटाकृति, पीतवर्ण तथा १/८ इञ्च बड़े होते हैं। फल-१ १/२ इञ्च लम्बा, १/२ इञ्च चौड़ा, लाल रंग का रुचिकर होता है जिसमें छोटे-छोटे अनेक बीज होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल बलकारक, मूत्रजनन एवं विरेचक होते हैं। 'काकनज' के स्थान पर इनका उपयोग किया जाता है। सोजाक में फलों को खिलाते हैं। स्तनशिथिलता दूर करने के लिये इसके पंचांग को चावल को धोवन में पीस कर लेप करते हैं। मलावष्टम्भ में इसके फलों का पाक बहुत लाभदायक है। तमकश्वास में इसकी जड़ तथा टंकण का लावा मधु के साथ देने से श्वासावरोध कम होकर कफ निकलता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ वेतसः । तस्य नामगुणानाह वेतसो नम्रकः प्रोक्तो वानीरो वञ्जुलस्तथा। अभ्रपुष्पश्च विदुलो रथः शीतश्च कीर्त्तितः ।। १३५ ।। वेतसः शीतलो दाहशोथार्शोयोनिरुक्प्रणुत्। हन्ति वीसर्पकृच्छ्रास्रपित्ताश्मरीकफानिलान् ।। १३६ ।। वेतस के नाम तथा गुण-वेतस, नम्रक, वानीर, वञ्जुल, अभ्रपुष्प, विदुल, रथ और शीत ये सब वेतस के नाम हैं। वेतस-शीतल है तथा दाह, शोथ, अर्श (बवासीर), योनिरोग, विसर्प, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, अश्मरी (पथरी), कफ तथा वात को दूर करने वाला है। [१३५-१३६] नोट-वेतस के विषय में विद्वानों में मतभेद है। भावप्रकाश, ध० नि०, रा० नि० आदि में वेतस तथा जलवेतस इन दो भेदों का उल्लेख है। रा० नि० ने वेत्र १ नाम से एक स्वतन्त्र द्रव्य का भी उल्लेख किया है। अन्य निघंटुओं ने वेतस के पर्याय में या स्वतंत्र रूप से वेत्र का उल्लेख नहीं किया है। कुछ विद्वान् वेतस से बेंत का ग्रहण करते हैं जो कॅलॅमस् टेनुइस् (Calamus tenuis) है। कुछ लोगों के मत से वेतस से वेदमूद्रक का ग्रहण उचित है जो सॉलिक्स कॅप्रिआ (Salix caprea) है। कुछ विद्वानों के मत से इसी जाति के सं० ऑल्बा (S. alba) को वेतस मानना चाहिये। १. वेत्रो वेतो योगिदण्डः सुदण्डो मृदुपर्वकः। वेत्रः पंचविधः शैत्यकषायो भूतपित्तहृत्।। रा. नि.