भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ
पृष्ठ 583, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 583
५३२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसी जाति के अन्य उपभेद (जलमाला) सँ० टेट्रास्पर्मा (S. tetrasperma) एवं सँ० ॲक्मोफाइला (S. acmophylla) को जलवेतस माना जाता है। भावप्रकाशकार वंजुल और बानीर पर्याय में लिखते हैं किन्तु चरक¹ में दोनों का साथ-साथ उल्लेख होने से ऐसा मालूम होता है कि ये दो अलग वनस्पतियाँ हैं। च० नि० अ० ४-३६ में वेत्र तथा वेतस भी साथ-साथ आये हैं जिससे ये भी दो अलग द्रव्य हैं ऐसा मालूम होता है। वंजुल नाम से चरक में वेदनास्थापन महाकषाय में एवं आसवयोनिसार वृक्षों (सु० अ० २५) में तथा सुश्रुत में न्यग्रोधादिगण में उल्लेख है 'विदुल' नाम चरक में वमनोपग महाकषाय (सू.अ. ४ में आया है जिसका अर्थ चक्रपाणि हिज्जल करते हैं। सुश्रुत (सू.अ. ३९) में ऊर्ध्वभागहरगण में विदुल आता है वहाँ डल्हण उसका अर्थ वेतस करते हैं। श्रीयुत यादव जी विदुल नाम हिज्जल के पर्याय में मानते हैं। हिज्जल (समुद्रफल) में वामक गुण देखा भी जाता है। चरक में वेतस नाम से उसकी मूलत्वक् का उपयोग रक्तपित्त (चि० अ० ४) में एवं सुश्रुत में जीर्णज्वर (उ० अ० १९) में मूल का उपयोग किया हुआ है। चरक में वेत्र नाम से रक्तपित्त (चि० अ० ४), शोथ (चि० अ० १२) एवं ऊरुस्तम्भ (चि० अ० २७) में उपयोग किया गया है। गुणों की दृष्टि से वेदमुश्क के गुण भावप्रकाशोक्त वेतस से मिलते हैं। यहाँ पर वेदमुदक एवं वेंत का अलग- अलग वर्णन किया गया है। जलवेतस के अन्तर्गत वेदमुश्क की अन्य उपजाति जलमाला का वर्णन किया गया है। ६१. वेतस १ (वेदमुश्क) सं०-वेतस, वानीर, गन्धपुष्प। हिं०, पं०-वेदमुश्क। पश्तो०-ख्वगवल। अ०-खिलाफुल् बलखी। फा०-वेदेमुश्क, गुर्वएबेद्। अं०-Willow विलो; Sallow (सॅलो)। ले०-Salix caprea Linn. (सॅलिक्स कॅप्रिआ लिन.)। Fam. Salicaceae (सॅलिकॅसी)। यह फारस, ईरान, उत्तर पश्चिम सीमान्प्रान्त एवं भारतवर्ष में काश्मीर तथा पंजाब में होता है। इसका वृक्ष-छोटा तथा १५-३० फीट ऊँचा होता है। छाल-पतली, लचीली, कषाय एवं बहुत कड़वी होती है। पत्ते-एकांतर, हरे, बड़े, अंडाकार, दन्तुर एवं नुकीले होते हैं। मध्यशिरा ऊपर के पृष्ठ पर कुछ श्वेत किन्तु अधोपृष्ठ पर रोमश होती है। पुष्प-पीतवर्ण के तथा सुगन्धित होते हैं। इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। इसके पुष्पों से बनाये अर्क का 'अर्क वेदमुश्क' नाम से यूनानी चिकित्सा में बहुत व्यवहार किया जाता है। इससे स्रवित हुई शर्करा, वेद अंगबीन का भी उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में ४-१०% टैनिक ऐसिड, २-७% एक रवेदार ग्लूकोसाइड, सॅलीसिन (Salicin), मोम, वसा एवं गोंद होता है। इसके पुष्पों में एक सुगन्धित उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल ग्राही, शीतल, ज्वरहर, दाहप्रशमन, वेदनास्थापक, मूत्रल, शिरःशूल नाशक, हृदय को बल देने वाली, उत्तेजक एवं वाजीकर है। इसके पुष्प रोचक एवं पत्ते ज्वरहर होते हैं। (१) इसकी छाल का क्वाथ विषम ज्वर, पैत्तिक ज्वर, नूतन आमवात तथा कफक्षय में देते हैं। इससे दाह, शिरःशूल, संधिपीड़ा, संधिशोथ एवं रक्तष्ठीवन कम होता है। अर्श में छाल का लेप किया जाता है। रक्तष्ठीवन में इसके काण्ड की राख खिलाते हैं। (२) इसके फूलों का अर्क उष्ण ज्वर तथा हृदय की धड़कन में पिलाते हैं। नेत्राभिष्यन्द तथा शिरःशूल में इसमें कपड़ा भिंगो कर उसकी पट्टी रखते हैं। मात्रा-छाल १/२-१ तो०; अर्क १-२ तोला।
१. क. अ. १, ९; सि. अ. १०, १९।