भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ५३३ ६२. वेतस २ (बेंत) सं०- वेत्र, वेतस । हिं०- वेंत । बं०- छांचि वेत । म०- वेत । क०- वेतसु । गु०- नेतर । ते०- जतयूर् कुली । पं०- बैत । ता०- बेत्तम् । फा०- बेंत, हजां खिरजा । अ०- खीरजा, खलाफ, हरजां । अं०- Cane (केन) । ले०- Calamus tenuis Roxb. (कॅलॅमस् टेन्युइस् राक्स.) । Fam. Palmeae (पामेइ) । यह जलप्राय भूमि में २ हजार फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है । इसकी लता- सघन, आरोही तथा काँटेदार होती है । यह काँटों की सहायता से फैलती है । काण्ड- चिकना, हरा और कोषमय पत्राधारों से ढँका हुआ रहता है । पत्ते- २-४ फीट लम्बे, पक्षाकार और पत्रदण्ड काँटों से युक्त होते हैं । पत्रक- ६-१२ इञ्च लम्बे, १/२-३/४ इञ्च चौड़े, रेखाकार, मालाकार, नुकीले एवं तीन शिराओं से युक्त होते हैं । पत्रक के किनारे तथा शिरा पर भी काँटे होते हैं । पत्रनाल और पत्रकोष पर भी प्रायः १ इञ्च तक लम्बे और सीधे काँटे होते हैं । पत्रकोष से चाबुक के सदृश ८ फीट तक लम्बी एक रचना फ्लॅजेलम् (Flagellum) निकली रहती है जिस पर भी टेढ़े काँटे होते हैं । पुष्प- पत्रकोषों के अन्दर एकलिंगी पुष्पों की विदाण्डिक मंजरियाँ पाई जाती हैं । फल- प्रायः १/२ इञ्च लम्बा एवं काले किनारे के वल्कपत्रों से ढँका हुआ रहता है । शीतऋतु में फल पक जाते हैं । बेंत की कई जातियाँ पाई जाती हैं । गुण और प्रयोग- इसको कुछ विद्वान् वेतस मानते हैं तथा वेतस के स्थान पर इसका प्रयोग करते हैं । इसकी जड़ ज्वरहर, पित्तहर, पौष्टिक एवं विरेचक मानी जाती है । इसके फल का गूदा ग्राही होता है । इसके कोमल अंकुरों का शाक तिक्तपौष्टिक माना जाता है । अथ जलवेतसः । तस्य नामगुणानाह निकुञ्चकः परिव्याधो नादेयो जलवेतसः । जलजो वेतसः शीतः १कुष्ठहृद्वातकोपनः ॥१३७॥ जलवेतस के नाम तथा गुण- निकुञ्चक, परिव्याध, नादेय और जलवेतस ये सब पर्यायवाची शब्द हैं । जलवेतस- शीतल, कुष्ठनाशक तथा वात को कुपित करनेवाला होता है । [१३७] ६३. जलवेतस (जलमाला) सं०- जलवेतस, वंजुल ? हिं०- जलमाला, सुकूलवेत, बंद । म०- वालुञ्ज । बं०- पानिजामा । ता०- अन्नुपलै । ते०- एतिपाल । फा०- वेदसादा, वेदलेला । अ०- खिलाफ्, सफ्साफ । ले०- Salix tetrasperma Roxb. (सॅलिक्स टेट्रास्पर्मा राक्स) । Fam. Salicaceae (सॅलिकॅसी) । इसका वृक्ष प्रायः नदी नालों के किनारे पाया जाता है । हिमालय में ६००० फीट की ऊँचाई तक यह होता है । काश्मीर तथा पश्चिमोत्तर प्रान्त में इसे लगाते हैं । इसका वृक्ष- साधारण ऊँचा तथा सुन्दर होता है । छाल- कृष्णाभ, तन्तुमय, चिमड़, कड़वी, कषाय तथा कुछ सुगन्धित होती है । पत्ते- ३-६ इञ्च लम्बे, रेखाकार-भालाकार, चिकने, पत्रोदार हरा, पत्रपृष्ठ, सफेद एवं पत्रवृन्त लाल रंग का होता है । पुष्प- सफेदी लिये पीले और कुछ सुगन्धित मंजरियों में आते हैं । फल- करीब ५ इञ्च लम्बा होता है तथा प्रत्येक फल में ४-६ बीज होते हैं । इसकी छाल एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । इसके लचीले पतले काण्ड से टोकरियाँ बनायी जाती हैं । इसकी अन्य उपजातियों को वेत, लैला, मजनूं तथा भैंसा आदि नामों से पुकारा जाता है । १. संग्राही इति पाठः ।