भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५३६ भावप्रकाशनिघण्टुः colebr. (एस्क्युलस् इण्डिका कोले.) को 'कंडार, बंखोर, अंकोल' आदि नामों से क्वचित् वर्णित किया जाता है किन्तु प्रस्तुत अङ्कोट के प्रतिनिधि के रूप में उक्त वनस्पति का व्यवहार नहीं करना चाहिये । इसकी जड़ की छाल, पत्र, बीज एवं बीज तैल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कड़वा एवं गन्ध अप्रिय होती है । रासायनिक संगठन-इसकी जड़ की छाल में ॲलेज़ाइन (Alangine) नामक एक कड़वा क्षाराभ एवं पोटॅशियम् क्लोराइड (Potassium chloride) पाया जाता है । इस क्षाराभ के रवे नहीं बनते तथा यह जल में भी नहीं घुलता । यह मद्यसार में घुल जाता है । बिल्ली में ॲलेज़ाइन सल्फेट (Alangine sulphae) नामक इसके लवण के शिरान्तर्गत सूचिकाभरण से रक्तनिपीड कम होता है जो १, २ मिनट में ही स्वाभाविक हो जाता है। इससे हृदय अवसादित होता है तथा आन्त्र की पुरःसरण क्रिया बढ़ती है । इससे श्वास अनियमित हो जाता है । गुण और प्रयोग-इसकी छाल उष्ण, कड़वी, वामक, स्वेदजनक, मूत्रल, रेचक, ज्वरहर, कृमिघ्न एवं विषहर है । अल्प मात्रा में (१-३ र०) यह हल्लासकारक, स्वेदजनन एवं मूत्रल है । अधिक मात्रा (३ माशा) में यह वामक एवं विरेचक है । इसके गुण मदार तथा एपिकाक के समान हैं । वामक मात्रा में प्रयोग से आमाशय में दाह तथा हृदय एवं रक्तवाहिनियों पर अवसादक प्रभाव पड़ता है ! (१) कुष्ठ, उपदंश तथा सभी प्रकार के त्वचा के विकारों में इसकी मूलत्वक् १/२-१ रत्ती की मात्रा में दिन में तीन बार देते हैं तथा बीज तैल या जड़ को पीसकर लगाते हैं । (२) प्रतिश्याय, इन्फ्लूएञ्जा एवं संधिपीड़ा युक्त ज्वर (डेंग्यु) में इसकी जड़ घोड़वच या सोंठ के साथ चावल की मांड में उबालकर देते हैं तथा पत्तों को पीसकर जरा गरम कर पीड़ा युक्त स्थान पर बाँधते हैं । (३) यकृतोदर, जलोदर एवं वृक्कजन्य शोफ में इसकी मूलत्वक् ३ रत्ती की मात्रा में देने से विरेचन होता है तथा यकृत् की क्रिया सुधरती है । इसके साथ यवक्षार का प्रयोग करने से मूत्र भी बढ़ता है । (४) चूहे के विष में तथा सर्पविष में यह लाभदायक माना जाता है । सर्प विष में २० रत्ती की मात्रा में मूल का चूर्ण चावल की धोवन के साथ देते हैं । मात्रा-मूलत्वक् १-३ रत्ती; वामक ३ माशा । अथ बलाचतुष्टयम् तस्य नामगुणानाह बलावाट्यालिका वाट्या सैव वाट्यालकाऽपि च । महाबल पीतपुष्पा सहदेवी च सा स्मृता ।।१४२।। ततोऽन्याऽतिबला ऋष्यप्रोक्ता कङ्कतिका च सा । गाङ्गेरुकी नागबला झषा ह्रस्वगवेधुका ।।१४३।। बलाचतुष्टय (चारों प्रकार के बला) के नाम तथा गुण-(१) बला, वाट्यालिका, वाट्या तथा वाट्यालका ये सब नाम बला (खिरैंटी) के हैं । (२) महाबला, पीतपुष्पा और सहदेवी ये सब नाम महाबला के हैं । (३) अतिबला, ऋष्यप्रोक्ता और कङ्कतिका ये सब अतिबला के हैं । [१४२-१४३] बलाचतुष्टयं शीतं मधुरं बलकान्तिकृत् । स्निग्धं ग्राहि समीरास्रपित्तास्रक्षतनाशनम् ।।१४४।। बलाचतुष्टय-शीतवीर्य, मधुररसयुक्त, बलकारक, कान्तिकारक, स्निग्ध एवं ग्राही होता है और वायु रक्तपित्त, रक्तविकार तथा व्रण को दूर करने वाला होता है । [१४४] ❖ बरियारा, सहदेवी, ककहिया, गुलशकरी, इति बलाचतुष्टयम् ।।१४४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA