भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ५३५ (१) बच्चों के प्रतिश्याय, कास, फुफ्फुसपाक आदि कफविकारों में इसे देते हैं। यदि इसके देने के पश्चात् वमन न हो तो नमक डालकर उष्ण जल पिलाना चाहिये। इससे वमन होकर कफ निकल जाता है तथा पखाना भी होता है। यदि इसके प्रयोग से कुछ दुष्परिणाम मालूम पड़े तो चावल की माँड़ घी मिलाकर दें। समुद्रफल को पीसकर छाती तथा पेट पर भी लगाते हैं। (२) तमकश्वास में ६ माशा समुद्रफल व सफेद कोयल की जड़ ६ माशे दूध में घिसकर देते हैं जिससे वमन- विरेचन होकर आराम मिलता है। (३) शिरःशूल में इसके बीजों का नस्य लाभदायक होता है। (४) इसके पत्तों का रस मधु मिलाकर आमातिसार में देने से लाभ होता है। (५) आँखों से पानी जाता हो तो समुद्रफल को जल में घिसकर लगाने से लाभ होता है। (६) उदरशूल, आनाह आदि में नमक, अजवायन के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है। (७) पर्यायिक ज्वरों में काली मिर्च एवं तुलसी पत्र के साथ इसे देते हैं। मात्रा-१-२ रत्ती। अथाङ्कोटः (अङ्कोल-ढेरा)। तस्य नामगुणानाह अङ्कोटो दीर्घकीलः स्यादङ्कोलश्च निकोचकः। अङ्कोटकः कटुस्तीक्ष्णः स्निग्धोष्णास्तुवरो लघुः।।१३९।। रेचनः कृमिशूलामशोफग्रहविषापहः। विसर्पकफपित्तास्रमूषकाहिविषापहः ।।१४०।। अंकोल के नाम तथा गुण-अंकोट, दीर्घकील, अङ्कोल और निकोचक ये सब 'अङ्कोल' के नाम हैं। अङ्कोल- कटु तथा कषाय (कसेला) रसयुक्त, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, स्निग्ध, लघु (हलका), रेचक (दस्तावर) होता है एवं कृमि, शूल, आम, शोथ (सूजन), ग्रहबाधा, विष, विसर्प, कफ, पित्त, रक्तविकार एवं मूसा तथा सर्प के विष को दूर करने वाला होता है। १३९-१४०] अथाङ्कोटफलस्य गुणानाह तत्फलं शीतलं स्वादु श्लेष्मघ्नं बृंहणं गुरु। बल्यं विरेचनं वातपित्तदाहक्षयास्रजित् ।।१४१।। अङ्कोल के फल का गुण-अङ्कोल का फल-शीतल, स्वादिष्ट, कफनाशक, बृंहण, पाक में गुरु, बलकारक, विरेचक एवं वायु, पित्त, दाह, क्षय तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१४१] ६५. अङ्कोट हिं०-अङ्कोल, ढेरा, टेरा, ढेला। बं०-आंकोड, बाघ, आंकडा, अकरकंटा। म०-अंकोल। गु०-आंकोल, अंकोल। क०-अंकोले-मर। ते०-कुडुगु; अंकोलमु। ता०-अलंर्गी। सन्ता०-डेला, ढेला। ले०-Alangium lamarckii thwaites (एलैञ्जिअम् लेमार्काई थ्वेट्स)। Fam. Alangiaceae (एलेञ्जियेसी)। यह मध्य और दक्षिण भारत, उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार, हिमालय की घाटी से गङ्गा तक और राजपुताना आदि कई प्रान्तों में पाया जाता है। यह प्रायः नदी-नालों की ढालों पर अधिक होता है। इसका छोटा वृक्ष, काँटेदार देखने में सुन्दर और सघन होता है। छाल-धूसर रङ्ग की, मोटी एवं खुरदरी होती है। जड़-भारी, पीताभ, तेलिया तथा मजबूत होती है। जड़ की छाल, दालचीनी की अपेक्षा भूरे रङ्ग की रहती है। पत्ते- कनेर के पत्तों के समान तीन से पाँच इञ्च लम्बे, १ से २।। इञ्च चौड़े, आयताकार, आयताकार-प्रासवत् या कोई अंडाकार होते हैं। पुष्पोद्गम के पूर्व पत्ते गिर जाते हैं। फूल-सुगन्धित सफेद रङ्ग के होते हैं। फल-कच्ची अवस्था में नीले और पकने पर जामुनी लाल, .४-.६ इञ्च बड़े तथा मांसल होते हैं। बीज-गुठलीदार और बड़े होते हैं। Aesculus indica CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA