भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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यहाँ पर 'बलाचतुष्टय' से (१) बरियारा, (२) सहदेई, (३) ककहिया, (४) गुलशकरी—इन चारों को ही समझना चाहिये । [१४४] बलामूलत्वक्चूर्णं पीतं सक्षीरशर्करम् । मूत्रातिसारं हरति दृष्टमेतन्न संशयः ॥ १४५॥ हरेन्महाबला कृच्छ्रम् भवेद्वातानुलोमिनी। हन्यादतिबला मेहं पयसा सितया समम् ।। १४६ ।। 'बरियारे' के जड़ की छाल का चूर्ण यदि दूध तथा शक्कर के साथ मिलाकर पीया जाय तो मूत्रातिसार को दूर करता है, यह परीक्षा करके देखा गया है, अतएव इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । 'महाबला' मूत्रकृच्छ्र को दूर करती है तथा इससे वायु का अनुलोमन भी होता है। 'ककहिया' का चूर्ण दूध तथा चीनी के साथ खाने से प्रमेह नष्ट होता है। [१४५-१४६] नोट-भावप्रकाशकार बला के चार भेद लिखते हैं। आधुनिक उद्भिज्जवेत्ताओं ने भी बला प्रजाति (Sida) की कई जातियों का वर्णन किया है। इनमें से अतिबला (कंघी) निस्संदेह ॲब्युटिलॉन् (Abutilon) प्रजाति की बनस्पति है । अधिकांश विद्वानों ने सिडा कॉर्डिफोलिआ (Sida cordifolia) को बला माना है, किन्तु श्री ठाकुर बलवन्त सिंह जी ने (पीत पुष्प) सिडा रॉम्बिफोलिया (Sida rambifolia) को वास्तविक बला लिखा है जिसको अन्य विद्वानों ने महाबला माना है । कुछ विद्वान रॉम्बिफोलिआ का अन्य उपभेद (श्वेत पुष्प) सिडा रॉम्बिफोलिया (Sida rhombifolia) को महाबला मानते हैं । भावप्रकाशकार महाबला के पर्याय में सहदेवी लिखते हैं लेकिन वास्तव में सहदेवी यह भिन्न वर्ग की ह्वर्नोनिआ सिनेरिआ (Vernonia cinerea) है । चरक-सुश्रुत में महाबला नाम नहीं आया है किन्तु सहदेवा नाम है । सम्भव है कि चरक, सुश्रुतोक्त सहदेवा ही महाबला हो तथा गलती से सहदेवा के स्थान पर सहदेवी छप गया हो । नागबला-के सम्बन्ध में अधिक मतभेद हैं। सिडा हेरोनिसीफोलिआ या सिडा ह्यूमिलिस् (Sida veronicaefolia; Syn-Sida humilis) को अधिकांश विद्वान् नागबला मानते हैं। यह भूमि पर सर्प की तरह टेढ़ी-मेढ़ी फैलती है। कुछ विद्वान् गुलसकरी को नागबला मानते हैं क्योंकि नागबला के पर्याय में गांगेरुकी आया है । गुलसकरी के ले० नाम के विषय में भी मतभेद है। सिडा स्पाइनोसा (Sida spinosa) को कुछ लोगों ने गुलसकरी लिखा है किन्तु श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने उसे अशुद्ध बतलाया है तथा वे ग्रेविआ हिर्सुटा (Grewia hirsuta) को गुलसकरी मानते हैं । नागबला का चतुष्फला पर्याय इसके लिये उपयुक्त मालूम होता है । इसे तथा इसके अन्य भेद ग्रे० पोप्यूलिफोलिया (Grewia populifolia) को गांगेरुकी (गंगरेन) कहते हैं जिससे इन्हें नागबला माना जाता है। इनके अतिरिक्त सिडा ॲक्युटा (Sida acuta) एवं अन्य भेद भी पाये जाते हैं। यहाँ पर संक्षेप में उपर्युक्त भेदों का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है । वास्तव में गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने के कारण एक के स्थान में दूसरे का व्यवहार किया जा सकता है । ६६. बला (बरियारा) हिं०-बरियार, बरियारा, बरियाल, खरेठी, खरैटी, खिरैंटी । बीजबन्द-(बीज) । बं०-बेडेला । म०-चिकणा । गु०-बलदाणा (बीज), खरेटी, बल, बला । क०-किसंगी, हेतुट्टि-गिडा । ते०-चिरिबेण्डा, मुत्तवु । ता०-अखिल- मनैपुण्डु । मा०-खरेंटी । पं०-खरैहटी, सिमक । अं०-Country mallow (कण्ट्री मॅलो); Sida (सिडा) । ले०-Sida cordifolia Linn. (सिडा कॉर्डिफोलिआ लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । यह सब प्रान्तों में प्रायः बारहों मास पाया जाता है। किन्तु वर्षा ऋतु में इसकी बहुलता खेतों और मेड़ों पर देखने में आती है। इसकी जड़ और डंडी बहुत मजबूत होती है जो आसानी से नहीं टूटती ।