भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५३८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका क्षुप-छोटा, २-४ फीट ऊँचा, स्वावलम्बी, मृदुरोमश तथा अनेक शाखाओं से युक्त रहता है। स्तम्भ- काष्ठमय एवं रेशेदार होता है। छाल-हल्के पीताभ भूरे रङ्ग की होती है। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे, हृदयाकृति, लट्वाकार- आयताकार, तूलरोमश, गोलदन्तुर, ७-९ शिराओं से युक्त एवं १/२-१ १/२ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प- बरसात के अन्त में छोटे पीले रङ्ग के फूल आते हैं जिनमें ७-१० स्त्रीकेसर होते हैं। फल-छोटे, मूंग जितने बड़े होते हैं। बीज-गहरे भूरे या काले रङ्ग के छोटे बीज रहते हैं जिन्हें बीजबन्द कहा जाता है। ग्रन्थिपर्ण (पृ० २५३) के बीजों को भी बीजबन्द कहा जाता है। जड़-प्रायः २-५ इञ्च लम्बी तथा १/२ इञ्च मोटी होती है। इसकी जड़, पत्र, बीज एवं पञ्चांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पञ्चांग में एक क्षाराभ, तैल, फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol), म्यूसिन, राल, रालीय अम्ल एवं पोटॉशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate) ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसके पत्र, काण्ड एवं मूल में क्षाराभ की मात्रा ०.०८५% रहती है किन्तु बीजों में यह ०.३% होती है। इसके क्षाराभ में प्रधान अंश एफ़ेड्रीन (Ephedrine) का रहता है। गुण और प्रयोग-बला (बरियरा) शीतवीर्य, बल्य, रसायन, वृष्य, प्रजास्थापन, संग्राही वातपित्तहर एवं स्निग्ध है। इसका उपयोग रक्तपित्त, प्रमेह, प्रदर, वातविकार एवं व्रण में किया जाता है। (१) शुक्रमेह में इसके पञ्चांग का स्वरस देने से लाभ होता है। (२) श्वेत प्रदर, बारबार पेशाब होना तथा सोजाक में इसके जड़ की छाल का चूर्ण शर्करा तथा दुग्ध के साथ प्रयोग करते हैं। (३) अर्द्धाङ्ग, अर्दित, मन्यास्तम्भ, अवबाहुक, गृध्रसी तथा शिरःशूल आदि वातविकारों में इसकी केवल जड़ या हींग और सैंधव मिलाकर जड़ का प्रयोग करते हैं तथा दुग्ध के साथ सिद्ध तैल का बाह्य प्रयोग करते हैं। (४) नेत्राभिष्यंद में इसके पत्र पीसकर बाँधते हैं। (५) उपदंश, फिरंग तथा क्षत में इसकी जड़ को पीसकर बाँधने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं। पञ्चांग के क्वाथ से व्रण प्रक्षालन भी किया जाता है। (६) (महा) बला की जड़ एवं सोंठ का क्वाथ कम्पयुक्त विषम ज्वरों में लाभदायक होता है। (७) हृदय को बल देने के लिये मकरध्वज तथा कस्तूरी के साथ इसका प्रयोग करते हैं। (८) राजयक्ष्मा में दूध के साथ इसकी जड़ से सिद्ध घृत का उपयोग मधु मिलाकर करते हैं। (९) श्लीपद में (महा) बला की जड़ एवं हरिताल पीसकर लेप करते हैं। (१०) रसायन के लिये इसकी जड़ (१/२-१ पल) को दूध के साथ पीसकर पिलाते हैं तथा आहार में घृत युक्त दूध भात खिलाते हैं। इससे आयु वृद्धि होती है। मात्रा-मूल ६ माशा-१ तोला, पञ्चांग ६ माशा-१ तोला। ६७. महाबला, सहदेवी ? सं०-सहदेवा, क्षेत्रबला। हिं०-सहदेई, सहदेया, पीतबला। बं०-पीतबडेला। म०-चिकणी, सहदेवी, तुपकड़ी। गु०-खेतराऊबल, खेतराऊबलदाणा। पं०-सहदेवि। ते०-मयिलमाणिक्यम्। ता०-मयिरमाणिक्कम्। ले०-Sida rhombifolia Linn. (सिडा रॉम्बिफोलिया लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA