भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५३९ यह क्षुप जाति की वनौषधि प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है। यह ऊसर भूमि में अधिक होती है। उसका क्षुप-१-४ फीट ऊँचा, झाड़दार और सीधा होता है। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, अभिलट्वाकार या तिर्यगायताकार तथा दन्तुर होते हैं। फूल-पीले रंग के बरियारे के फूलों के आकार वाले किन्तु उनसे कुछ बड़े होते हैं। फल-बरियारे के ही समान होते हैं। यह एक परिवर्तनशील जाति बतलाई जाती है जिसके अन्तर्गत कई उपभेद बतलाये गये हैं। इसी के उपभेद सिडा रॉम्बॉइडिआ (Sida rhomboidea) के पुष्प श्वेतवर्ण के होते हैं। यद्यपि भावप्रकाशकार इसे सहदेवी लिखते हैं तथापि यह वास्तविक सहदेवी नहीं है। सहदेवा यह नाम इसके लिये अधिक उपयुक्त है क्योंकि चरक सुश्रुत में बला के भेदों में सहदेवा का उल्लेख है। सहदेवी का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है जो भिन्न वर्ग की वनस्पति है। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में लुआब बहुत होता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण भी बला सदृश ही होते हैं। शीतज्वर तथा आमवात में सोंठ के साथ इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। मूत्रकृच्छ्र में इसकी जड़ के क्वाथ से वेदना कम होती है। क्षत पर मूलस्वरस की पट्टी रखने से व्रण जल्दी अच्छा होता है। हरिताल के साथ इसकी जड़ के लेप से श्लीपद में लाभ होता है। मात्रा-६ मा० से १ तोला। ६८. सहदेवी सं०-सहदेवी। हिं०-सहदेई, सहदैया। बं०-छोट कुकासिमा। म०-सहदेवी, सायिदेवि, सादोडी। गु०- सदोडी, शेदरडी। ता०-नैचिट्टे। ते०-घेरिट्टेकरनिना। मल०-पिरिना। क०-सहदेवी। अं०-Fleabane (फ्लीबेन)। ले०-Vernonia cinerea Less. (व्हर्नोनिआ सिनेरिआ लेस्)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। यह बरसात के दिनों में परित्यक्त भूमि में सब जगह होती है। इसका क्षुप-स्वावलंबी अथवा प्रसरणशील, रोमश तथा ८ इञ्च से ३ फीट तक ऊँचा होता है। काण्ड-पतला, रेखा युक्त एवं रोमश होता है। शाखायें-प्रायः श्वेताभ रोमश होती हैं। पत्ते-कई तरह के अर्थात् रेखाकार, अंडाकार, लट्वाकार या अभिलट्वाकार, अखंड या दन्तुर, रोमश, अवृन्त अथवा क्रमशः संकुचित होकर सूक्ष्म वृन्त से लगे होते हैं। पुष्प-हलके जामुनी रंग के पुष्प .२५ इञ्च लम्बे और आयताकार मुण्डक में आते हैं। अधःपत्रावलि-घंटिकाकार, .२ इञ्च लम्बी और उसके पत्र प्रायः रेखाकार, लम्बाग्र और उनका अग्र कंटक सदृश तीक्ष्ण होता है। यह सहदेवी बलाभेद नहीं है किन्तु जिस सहदेवी के बारे में यह मान्यता है कि जड़ शिखा में बाँधने से ज्वर कम होता है वह यही है। गुण और प्रयोग-यह शीतवीर्य, स्वेदजनक, कृमिघ्न एवं शोथहर है। ज्वर में पसीना लाने के लिये इसका क्वाथ या स्वरस पिलाते हैं तथा शरीर पर लगाते हैं। अर्श में इसका स्वरस दिया जाता है। यह पेशाब की जलन तथा बस्ति के उद्वेष्टन में लाभदायक है। इसका लेप शोथ में उपयोगी है। इसके बीज कृमिनाशक, विषहर तथा घोड़ों के लिये पौष्टिक माने जाते हैं। नेत्राभिष्यन्द में पुष्पों का व्यवहार किया जाता है। मात्रा-स्वरस ६ मा०-१ तोला; बीज ४ र०-१ मा०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA