भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
गुडूच्यादिवर्गः ५३९ यह क्षुप जाति की वनौषधि प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है। यह ऊसर भूमि में अधिक होती है। उसका क्षुप-१-४ फीट ऊँचा, झाड़दार और सीधा होता है। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, अभिलट्वाकार या तिर्यगायताकार तथा दन्तुर होते हैं। फूल-पीले रंग के बरियारे के फूलों के आकार वाले किन्तु उनसे कुछ बड़े होते हैं। फल-बरियारे के ही समान होते हैं। यह एक परिवर्तनशील जाति बतलाई जाती है जिसके अन्तर्गत कई उपभेद बतलाये गये हैं। इसी के उपभेद सिडा रॉम्बॉइडिआ (Sida rhomboidea) के पुष्प श्वेतवर्ण के होते हैं। यद्यपि भावप्रकाशकार इसे सहदेवी लिखते हैं तथापि यह वास्तविक सहदेवी नहीं है। सहदेवा यह नाम इसके लिये अधिक उपयुक्त है क्योंकि चरक सुश्रुत में बला के भेदों में सहदेवा का उल्लेख है। सहदेवी का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है जो भिन्न वर्ग की वनस्पति है। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में लुआब बहुत होता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण भी बला सदृश ही होते हैं। शीतज्वर तथा आमवात में सोंठ के साथ इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। मूत्रकृच्छ्र में इसकी जड़ के क्वाथ से वेदना कम होती है। क्षत पर मूलस्वरस की पट्टी रखने से व्रण जल्दी अच्छा होता है। हरिताल के साथ इसकी जड़ के लेप से श्लीपद में लाभ होता है। मात्रा-६ मा० से १ तोला। ६८. सहदेवी सं०-सहदेवी। हिं०-सहदेई, सहदैया। बं०-छोट कुकासिमा। म०-सहदेवी, सायिदेवि, सादोडी। गु०- सदोडी, शेदरडी। ता०-नैचिट्टे। ते०-घेरिट्टेकरनिना। मल०-पिरिना। क०-सहदेवी। अं०-Fleabane (फ्लीबेन)। ले०-Vernonia cinerea Less. (व्हर्नोनिआ सिनेरिआ लेस्)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। यह बरसात के दिनों में परित्यक्त भूमि में सब जगह होती है। इसका क्षुप-स्वावलंबी अथवा प्रसरणशील, रोमश तथा ८ इञ्च से ३ फीट तक ऊँचा होता है। काण्ड-पतला, रेखा युक्त एवं रोमश होता है। शाखायें-प्रायः श्वेताभ रोमश होती हैं। पत्ते-कई तरह के अर्थात् रेखाकार, अंडाकार, लट्वाकार या अभिलट्वाकार, अखंड या दन्तुर, रोमश, अवृन्त अथवा क्रमशः संकुचित होकर सूक्ष्म वृन्त से लगे होते हैं। पुष्प-हलके जामुनी रंग के पुष्प .२५ इञ्च लम्बे और आयताकार मुण्डक में आते हैं। अधःपत्रावलि-घंटिकाकार, .२ इञ्च लम्बी और उसके पत्र प्रायः रेखाकार, लम्बाग्र और उनका अग्र कंटक सदृश तीक्ष्ण होता है। यह सहदेवी बलाभेद नहीं है किन्तु जिस सहदेवी के बारे में यह मान्यता है कि जड़ शिखा में बाँधने से ज्वर कम होता है वह यही है। गुण और प्रयोग-यह शीतवीर्य, स्वेदजनक, कृमिघ्न एवं शोथहर है। ज्वर में पसीना लाने के लिये इसका क्वाथ या स्वरस पिलाते हैं तथा शरीर पर लगाते हैं। अर्श में इसका स्वरस दिया जाता है। यह पेशाब की जलन तथा बस्ति के उद्वेष्टन में लाभदायक है। इसका लेप शोथ में उपयोगी है। इसके बीज कृमिनाशक, विषहर तथा घोड़ों के लिये पौष्टिक माने जाते हैं। नेत्राभिष्यन्द में पुष्पों का व्यवहार किया जाता है। मात्रा-स्वरस ६ मा०-१ तोला; बीज ४ र०-१ मा०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५४० भावप्रकाशनिघण्टुः ६९. अतिबला (कंघी) हिं०-कंघी, ककही, ककहिया, कंगही । बं०-पेटारी । म०-मुद्रा, मुद्रिका, करंडी, पेटारी । पं०-पीली बूटी, अतिखिरते । गु०-खपाट, कांसकी, डावली । मा०-डावी । क०-श्रीमद्रिगिडा । ते०-तुतुरुबेंड । सिन्ध०-सिम्बुल । सन्ता०-मिरूबहा । ता०-तुत्ति । फा०-दरख्ते शाहनाह । अ०-मश्तुलगूल । अं०-ndian Mallow (इण्डियन् मॅलो) । ले०-Abutilon indicum (Linn.) Sw. (एब्युटिलोन् इण्डिकम् (लिन.) स्व.) । Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । यह वनौषधि प्रायः गरम प्रान्तों में अधिक पाई जाती है । इसका क्षुप-झाड़दार, दो से ढाई हाथ ऊँचा और पुराना होने पर ४-५ हाथ तक ऊँचा देखा जाता है । इस पर मृदु श्वेताभ मखमली रोमावरण होता है । पत्ते-एकांतर, ³/₄- १ इञ्च लम्बे, गिलोय के पत्तों के आकार वाले, दन्तुर, मृदुरोमश तथा लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । फूल-पीले नारङ्गी रङ्ग के प्रायः सन्ध्याकाल में खिलते हैं । फल-चक्राकार गोल कंघी की तरह होते हैं । इनसे प्रायः बालक छापा किया करते हैं । बीज-बरियारे के बीजों से कुछ बड़े होते हैं । इन्हें भी बीजबंद कहा जाता है । इसकी एक दूसरी जाति होती है जिसे हिं०-बड़ी कंघी, ले०-Abutilon hirtum G. Don. (एब्युटिलोन् हिट्म् जी. डॉन्.) कहते हैं । इसमें मृदुरोमावरण के अतिरिक्त चिपचिपे रोम तथा शाखाओं और पुष्पडंडों पर लम्बे मुलायम रोयें भी होते हैं । इसका भी अतिबला के नाम से प्रयोग किया जा सकता है । रासायनिक संगठन- इसके पत्तों में लुआब बहुत होता है जो उष्ण जल में आ जाता है । पत्तों की राख १६% होती है जिसमें क्षारीय सल्फेट, क्लोराइड, मॅग्नेशियम् फास्फेट तथा कॅल्शियम कार्बोनेट आदि लवण होते हैं । गुण और प्रयोग-इसकी जड़ वातहर, रसायन, मूत्रजनन; बीज स्नेहन, मृदुरेचन, वाजीकर, कासहर; छाल मूत्रजनन एवं पत्र स्नेहन, वेदनाहर हैं । (१) सोजाक, मूत्रकृच्छ्र एवं बस्तिविकार आदि में इसके पत्तों का क्वाथ या बीजों का प्रयोग बहुत लाभदायक होता है । मूत्रकृच्छ्र तथा रक्तमूत्र में मूल का क्वाथ लाभदायक है । प्रमेह में पेशाब साफ होने के लिये दूध एवं शर्करा के साथ इसकी छाल देते हैं । (२) मसूढ़े ढीले हों तथा दाँत में दर्द हो तो इसके पत्ते के क्वाथ से कुल्ला कराते हैं । वेदनायुक्त स्थान पर इससे सेंकते हैं । व्रण तथा फोड़े आदि पर इसके पुष्प तथा पत्तों का लेप किया जाता है । (३) ज्वर में दाहशान्ति के लिये इसके पत्ते तथा मूल का क्वाथ दिया जाता है । (४) रक्तप्रदरं में इसकी जड़ का चूर्ण शर्करा एवं मधु के साथ दिया जाता है । (५) इसके बीज नपुंसकता, अर्श, सोजाक तथा बस्तिविकारों में दिये जाते हैं । (६) पित्तातिसार में पत्रस्वरस में घृत मिलाकर खिलाते हैं । (७) गुदा पर इसके बीजों के धूप से सूत्र-कृमि नष्ट होते हैं । मात्रा-मूल ६ माशा-१ तोला; बीज ४-८ माशा । ७०. नागबला-१ सं०-भूमिबला, नागबला, विश्वदेवा । हिं०-फरीदबूटी ? म०-भुईबल, मुईचिकणा । गु०-भोंयबल । बं०- जोंका । ता०-पलुपुन्दु । ते०-गायपूआकु । ले०-Sida vero-nicaefolia Lam. (सिडा ह्वेरोनिसीफोलिआ लॅम्.) Syn-Sida humilis Cav. (सिडा ह्युमिलिस् कॅह.) । Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५४१ यह प्रायः सब प्रान्तों में पाई जाती है। इसका क्षुप (प्रसर)—बहुवर्षायु, रोमश, लम्बी शाखाओं से युक्त तथा जमीन पर अथवा झाड़ियों पर फैला हुआ होता है। भूमि पर सर्प की तरह टेढ़े-मेढ़े यह फैला होने के कारण इसे नागबला कहते हैं। पत्ते—१/२-१ इञ्च लम्बे, प्रायः लट्वाकार, हृद्वत्, दन्तुर, रोमश तथा लम्बाग्र होते हैं। पुष्प—पीले रंग के छोटे अनेक पुष्प आते हैं। गुण और प्रयोग—गर्भिणी अतिसार में इसके पत्तों का फाण्ट देते हैं। मूत्र-कृच्छ्र में पुष्प तथा कोमल-फल चीनी के साथ देते हैं। क्षत तथा ठोकर लगने पर पत्तों को पीसकर बाँधते हैं। नागबला की जड़—यह बहुत उत्तम रसायन, पुष्टिदायक, आयुवर्धक मानी गयी है। राजयक्ष्मा तथा क्षतक्षय आदि में यह बहुत लाभदायक मानी जाती है। रसायन के लिये इसकी जड़ की छाल १/२-१ तोले दूध में पीसकर अथवा घृत एवं मधु के साथ इसका चूर्ण-सेवन का विधान है। पथ्या में घृत दुग्धयुक्त रक्तशालि अथवा साठी चावल का भात खाये (च० चि० अ० १)। इसी प्रकार प्रतिदिन १/२ तोले से बढ़ाकर ४ तोले तक की मात्रा में इसका चूर्ण दूध के साथ खाये तथा आहार में दूध ही पीये। क्षतक्षयी के लिये इस प्रकार एक महीने प्रयोग से पुष्टि, आयु, बल तथा आरोग्य की वृद्धि होती है (च० चि० अ० ११)। राजयक्ष्मा में दूध के साथ नागबला का चूर्ण सेवन करने से लाभ होता है (सु० उ० अ० ४१)। शोढल ने घृत एवं मधु के साथ क्षय के लिये इसका प्रयोग लिखा है। हृद्रोग, कास तथा श्वास में भी दूध के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है (चक्र)। उपर्युक्त गुण जिसमें मिलें वही शास्त्रीय नागबला हो सकती है। मात्रा—मूल १/२ से १ तो०। ७१. नागबला—२ (गुलसकरी ?) सं०—कण्टकिनीबला। हिं०—गुलशकरी, जङ्गली मेथी। बं०—गोरक्षचाकुले, बोन मेथी। म०—नागबला। मा०—गङ्गेरण। पं०—गङ्गेरण, गङ्गेरन। गु०—कांटालोबल। फा०—शनबलिदेवरी। अ०—शमलोदेदस्ती। ले०— Sida spinosa Linn. (सिडा स्पाइनोसा लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। यह इस देश के अधिक उष्ण भागों में पश्चिमोत्तर प्रदेश से दक्षिण तक पाई जाती है। इसका क्षुप—अनेक शाखाओं से युक्त, स्वावलम्बी तथा श्वेताभ वर्ण का होता है। शाखाएँ—पतली, खुरदरी एवं किञ्चित् सूक्ष्म रोवेंदार होती हैं। पत्ते—१-१ १/२ इञ्च लम्बे, अंडाकार, कुछ नुकीले, दन्तुर और मोटे होते हैं। पत्तों के नीचे सन्धि पर प्रायः तीक्ष्ण काँटे होते हैं। फूल—आध इञ्च के घेरे में गोलाकार, ५ पंखड़ियों से युक्त सफेद रङ्ग के आते हैं। फल—पाँच पंखड़ीवाले होते हैं तथा सूखने पर ५ भाग हो जाते हैं। बीज—५-९ बीज होते हैं। कुछ विद्वानों ने इसके दो भेद माने हैं जिसमें श्वेतपुष्प के क्षुप को सि० अॅल्बा (S. alba) तथा पीतपुष्प वाले को सि० ऑल्निफोलिआ (S. alnifolia) लिखा है। इसकी जड़ तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके पत्र स्नेहन तथा मूत्रजनन हैं। इसकी जड़ बल्य तथा ज्वरघ्न है। विषम ज्वर में मूलत्वक तथा सोंठ का क्वाथ पिलाते हैं। मूत्रकृच्छ्र, सोजाक तथा मूत्रेन्द्रिय के अन्य विकारों में इसके पत्तों का उपयोग किया जाता है। मात्रा—६ माशा-१ तोला। ७२. नागबला ३ (गुलसकरी, गांगेरुकी) सं०—गुडशर्करा। हिं०—गुलसकरी, कुकुरांड, कुकुरबिचा। संता०—सेतकट, सेताण्डीर। बिहा०—सेतारेपडी, सेतापेटू, सेताजरका। म०—गोवाली। ले०—Grewia hirsuta, Vanb. (ग्रेविआ हिर्सुटा, व्हेन्ब)। Fam. Tiliaceae (टिलिएसी)। यह उत्तर पश्चिम भारत, नेपाल तथा कोंकण में पाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५४२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसके क्षुप-डेढ़-३ फीट ऊँचे तथा रोमश होते हैं। इसकी जड़ के पास से अनेक शाखायें निकली रहती हैं। पत्ते-विचित्र प्रकार के, रेखाकार, लट्वाकार-भालाकार या गोलाई लिये हुये आयताकार, लम्बाग्र, अल्पवृन्त युक्त तथा तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं। पुष्प-पीतवर्ण के होते हैं। फल-प्रायः चार खण्ड वाले तथा मृदुरोमों से ढँके रहते हैं। नागबला का चतुष्फला यह पर्याय इसे उपयुक्त होने के कारण कुछ इसे नागबला मानते हैं। किन्तु श्री ठा० बलवन्त सिंह जी इसे गुलसकरी मानते हैं तथा इसे 'गुडशर्करा' का अपभ्रंश मानते हैं। अन्य विद्वानों ने गुलसकरी पूर्वोक्त नागबला २ को माना है। इसे या इससे मिलती जुलती एक छोटी वृक्ष जाति ग्रेविआ पोप्युलीफोलिया वाह. (Grewia populifolia Vahl.) को गांगेरुकी (गंगरेन) कहते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि यह ग्रे० पोप्युलीफोलिआ ही गांगेरुकी है जिसे नागबला नहीं मानना चाहिये क्योंकि गांगेरुकी यह नागबला का पर्याय मानना उचित नहीं। गांगेरुक (फल) का चरक सू० अ० २७ तथा सू० अ० ४६ में उल्लेख है। गांगेरुक (फल) यह धन्वन के समान गुण वाला मधुर, कुछ कषाय, शीतल तथा पित्त-कफनाशक है। तलवार आदि से घाव होने पर इसके (गांगेरुकी) मूल का स्वरस उसमें भरकर बाँधने से वेदना नष्ट होती है (शा० ध० म० खं० अ० १-२०)। गुण और प्रयोग-शुक्र-दौर्बल्य में इसके मूल का उपयोग किया जाता है। फोड़े पर इसके मूल को पीसकर बाँधने से फोड़ा पककर जल्दी अच्छा होता है। आमातिसार में इसके पत्तों के क्वाथ से बहुत लाभ होता है। अथ लक्ष्मणा । तस्या लक्षणगुणानाह पुत्रकाकाररक्ताल्पबिन्दुभिर्लाञ्छितच्छदा ।।१४७।। लक्ष्मणा पुत्रजननी बस्तगन्धाकृतिर्भवेत् । कथिता पुत्रदाऽवश्या लक्ष्मणा मुनिपुङ्गवैः ।।१४८।। 'लक्ष्मणा' के लक्षण तथा गुण-जिसके पत्तों पर लाल रङ्ग के छोटे-छोटे बिन्दुओं से पुरुष का आकार बना हो तथा जो देखने में बस्तगन्धा (वन अजवायन) के समान मालूम पड़े उसे पुत्र को उत्पन्न करने वाली 'लक्ष्मणा' समझनी चाहिये। श्रेष्ठ मुनियों ने इसे अवश्य पुत्र देनेवाली बतलाया है। [१४७-१४८] ७३. लक्ष्मणा लक्ष्मणा यह एक सन्दिग्ध वनस्पति है। भावप्रकाशकार इसके परिचय में लिखते हैं कि इसके पत्तों पर पुरुषाकृति रक्त-चिह्न होते हैं तथा इसका आकार बस्तगन्धा की तरह होता है। बस्तगन्धा का अर्थ कुछ लोगों ने वन अजवायन किया है। कुछ ने इसका अर्थ बकरे की गन्ध सदृश गंध वाला किया है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। तुलसी की तरह के क्षुप को भी बस्तगन्धा कहा गया है। मदनपाल निघण्टु में लक्ष्मणा के परिचय में 'गोक्षीरसद्दृशं पुष्पं र मवल्लिसमन्वितम् । रक्तबिन्दुयुतं पत्रं लक्ष्मणाऽऽकार उच्यते' लिखा है। कोश में लक्ष्मणा का अर्थ हंस जाति का पक्षी दिया हुआ है। ध० नि० एवं रा० नि० में एक विशेष प्रकार की श्वेत कंटकारी का लक्ष्मणा नाम से उल्लेख किया हुआ है किन्तु रा० नि० ने आगे मूलकादि वर्ग में फिर से लक्ष्मणा नामक अन्य वनस्पति का उल्लेख किया है जिसके गुणों में 'स्त्रीवन्ध्यत्वविनाशिनी' दिया हुआ है। इससे ऐसा मालूम होता है कि उस समय भी श्वेत जाति की कंटकारीविशेष को लक्ष्मणा मानते थे जैसा आजकल कुछ विद्वान् मानते हैं। यद्यपि श्वेत कंटकारी में गर्भकारक गुण हैं तथापि लक्ष्मणा उससे भिन्न है क्योंकि एक ही स्थान पर दोनों का उल्लेख मिलता है (अ० ह० शा० अ० १-४०)। अन्य निघंटुओं ने इसे शीत, मधुर, रसायन, बल्य, त्रिदोषघ्न एवं स्त्रीबन्ध्यत्वविनाशक लिखा है। पुत्रप्राप्ति के लिये सुश्रुत (शा० अ० २-३३) में लक्ष्मणा को दूध के साथ कूचकर उसका रस दाहिने नासा पुट में डालने के लिये लिखा है। नवजात शिशु के लिये उत्पन्न होने के दूसरे दिन लक्ष्मणासिद्ध घृत के पान कराने का विधान है (सु० शा० अ० १०)। बन्ध्यत्व नाशन के लिये इसकी जड़ को दूध के साथ सेवन करने का विधान है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmti. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५४३ चीन में अरॅलिआ क्विन्क्वीफोलिआ (Aralia quinquefolia; Fam. Araliaceae) नामक एक पौधा पाया जाता है जिसे वहाँ जिन्सेंग (Ginseng) कहते हैं। इसकी जड़ को वहाँ अत्यन्त प्रभावशाली औषध मानते हैं। संभवतः इसका कारण इसका मानवाकृति से सादृश्य हो सकता है। इसको वहाँ के चिकित्सक रोग निवारक एवं जनाव्याधि विनाशक मानते हैं। लक्ष्मणा के वर्णन में 'पुत्रकाकार' का अर्थ यदि मानवाकृति कंद करे तो दोनों में पर्याप्त साम्यता मालूम होती है क्योंकि जितना महत्त्व अपने यहाँ लक्ष्मणा को दिया जाता है वैसा ही जिन्सेंग को चीन में दिया जाता है। इसका पौधा छोटा एवं पत्ते करतलाकार होते हैं। इसकी जड़ का स्वाद कुछ कड़ुआ तथा सुगनयुक्त होता है। निम्नलिखित वनस्पतियों को लक्ष्मणा नाम दिया हुआ मिलता है किन्तु इनके लक्ष्मणा होने में सन्देह है। (क) Ipomoea sepiaria Koen. (आइपोमिआ सेपिएरिआ कोएन्.)। Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्युलेसी)। गु०-हनुमानवेल। (ख) Atropa mandragora (एट्रोपा मेण्ड्रागोरा)। Fam. Atropaceae (एट्रोपेसी)। संभवतः इस वनस्पति का उचित नाम Mandragora autumnalis Spreng; Fam. Solanaceae (मॅण्ड्रागोरा ऑटम्नॅलिस् स्प्रे.; सोलेनेसी) है। (ग) Smithia geminiflora Roth (स्मिथिया जेमिनिफ्लोरा रॉथ)। Fam. Legumin osae (लेग्युमिनोसी)। (घ) Biophytum sensitivum (Linn.) DC. (बायोफाइटम् सेन्सिटिव्हम् डीसी.)। Fam. Geraniaceae (जिरॅनिएसी)। अथ स्वर्णवल्ली (सोनबेल) । तस्या नामगुणानाह स्वर्णवल्लीरक्तफला काकायुः काकवल्लरी । स्वर्णवल्ली शिरःपीडां त्रिदोषान्हन्ति दुग्धदा ।।१४९।। 'सोनबेल' के नाम तथा गुण—स्वर्णवल्ली, रक्तफला, काकायु और काकवल्लरी ये सब संस्कृत नाम 'सोनबेल' के हैं। सोनबेल—शिर की पीड़ा तथा त्रिदोष को दूर करती है एवं दूध को बढ़ाने वाली होती है। [१४९] ७४. स्वर्णवल्ली 'स्वर्णवल्ली' की लता कैसी होती है, इस सम्बन्ध में कोई वर्णन अन्य ग्रन्थों में नहीं मिलता। रक्तफला विशेषण के उल्लेख के कारण आकाशवल्ली इसका पर्याय नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त आकाशवल्ली का स्वतन्त्र रूप में भी भावप्रकाशकार ने इसी वर्ग में वर्णन किया है। प्राचीन ग्रन्थों में भी स्वर्णवल्ली का स्वतन्त्र रूप में कोई विशिष्ट प्रयोग वर्णित नहीं है। इसीलिये व्यवहार में भी इसका शुद्ध या व्यामिश्रित रूप उपलब्ध नहीं है। अथ कार्पासी (कपास) । तस्या नामगुणानाह कार्पासी तुण्डकेशी च समुद्रान्ता च कथ्यते । कार्पासकी लघु कोष्णा मधुरा वातनाशिनी ।।१५०।। 'कपास' के नाम तथा गुण—कार्पासी, तुण्डकेशी और समुद्रान्ता ये सब नाम 'कपास' के हैं। कपास—लघु, किञ्चित् उष्णवीर्य, मधुर तथा वातनाशक होता है। [१५०] अथ तत्पत्रबीजयोर्गुणानाह तत्पलाशं समीरघ्नं रक्तकृन्मूत्रवर्द्धनम् । तत्कर्णपिडकानादपूयास्रावविनाशनम् ।।१५१।। तद्बीजं स्तन्यदं वृष्यं स्निग्धं कफकरं गुरु ।।१५२।।
५४४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसके पत्ते तथा बीजों के गुण-कपास के पत्ते-वायुनाशक, रक्त तथा मूत्रवर्धक होते हैं एवम् कर्णपिडका (कान की फुन्सी), कर्णनाद (कान में शब्द होना) और कर्णपूयास्राव (कान से पीव का आना) इन सबको नाश करने वाले होते हैं। कपास के बीज-दुग्धवर्धक, वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, कफकारक तथा पाक में गुरु होते हैं। [१५१-१५२] ७५. कपास हिं०-कपास, रूई। म०-कापसी, कापूस। गु०-बोण, कपास। बं०-कार्पास, तुला। ते०-पत्तिचेट्टु, कार्पासमु। क०-हत्ति। ता०-परुक्ति। फा०-पंबः। अ०-नवातुलकुल। अं०-Cotton Plant (कॉटन प्लॅण्ट), Indian Cotton (इण्डियन कॉटन)। ले०-Gossypium herbaceum Linn. (गॉसिपिअम् हर्बेंसिअम् लिन.); Fam. Malvaceae (मालवेसी)। कपास के बीज के नाम-हि०-बिनौला। म०-सरकी। गु०-कपासिया। मा०-कांकड़ा। अ०-हब्बुलकुत्न। फा०-पंबः दाना। कपास या रूई यह सुप्रसिद्ध द्रव्य है। भारतवर्ष के अनेक भागों में बहुलता से इसकी खेती की जाती है। मिस्र, अमेरिका तथा संसार के अन्य उष्ण प्रदेशों में भी इसकी खेती की जाती है। यह गुल्म जाति की वनस्पति ४-५ फीट तक ऊँची होती है। इसके पत्ते-हाथ के पंजे के समान कई भागों में विभक्त रहते हैं। प्रायः ३ से ७ भाग तक देखने में आते हैं। फूल-घंटाकार पीले रंग के होते हैं, उनके बीच का हिस्सा बैंगनी रंग का होता है। फल-डोडी या फल गोलाकार होता है तथा उसके भीतर सफेद रूई से लिपटे हुये ५-७ बीज होते हैं। बीज-किंचित् काले रंग के, चने के समान गोल होते हैं और उनके भीतर सफेद मज्जा होती है। जड़-बाहर से पीले रंग की तथा अन्दर से सफेद होती है। जड़ की छाल गंधयुक्त, पतली, चिमड़, रेशेदार, धारीदार एवं करीब १ फीट तक लम्बी होती है। छाल का स्वाद कुछ तीता एवं कषाय होता है। प्रतिवर्ष प्रायः चौमासे के आरम्भ में खेतों में बीजों का रोपण करते हैं और फाल्गुन-चैत में रूई संग्रह कर पौधे को काट कर खेत साफ कर देते हैं। जाति-इसकी निम्नलिखित अन्य जातियाँ भी पाई जाती हैं। देशभेद से भी यह अनेक प्रकार का होता है। उद्यान कार्पास-सं०-उद्यानकार्पास। हिं०-नर्मा। म०-देवकापसीण। गु०-हिरवणी। पं०-कपास। संता०- बुदिकरकोम। ले०-Gossypium arboreum Linn. (गॉसिपिअम् आर्बोरिअम् लिन.)। यह एक प्रकार की कपास होती है, जिसका बागों में रोपण करते हैं। इसके पौधे-बहुवर्षायु, ८-१० फीट तक ऊँचे होते हैं। पत्ते और फल भी कुछ बड़े होते हैं तथा फूल लाल रंग के होते हैं। अरण्य कार्पासी-सं०-भारद्वाजी (च० सू० अ० ४, रा० नि०)। हिं०-जंगली कपास, वनकपासी। म०- रानकापूस। ले०-Thespesia lampas Dalz & Gibs (थेस्पेसिआ लॅम्पस् डा., गि.)। यह जाति जंगलों में स्वयं उत्पन्न होती है। इसके क्षुप-झाड़ीदार, दृढ़ तथा ४-६ फीट ऊँचे होते हैं। पत्ते- करतलाकार, ३ खण्डयुक्त या अखण्ड एवं व्यास में ४-५ इञ्च होते हैं। फूल-पीले रंग के तथा मध्य में प्रायः लाल रंग के होते हैं। इसकी रूई कुछ पीताभ होती है। रासायनिक संगठन-कपास की जड़ की छाल में एक रंगहीन या पीताभ अम्ल राल ८% तक पाई जाती है जो आक्सीजन के संयोग से चमकीले रक्ताभ भूरे रंग की हो जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें डिहाइड्रोक्सि बेञ्जोइक एसिड (Dihydroxy benzoic acid), सॅलिसिलिक् एसिड (Salicylic acid), स्नेहाम्ल, बिटेन (Betaine), सेरिल ॲल्कोहोल् (Ceryl alcohol), फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol), शर्करा एवं फेनॉल के सदृश दो पदार्थ पाये जाते हैं। बीजों में १०-२९% हलके पीले रंग का गन्धहीन तथा स्वादहीन तैल पाया जाता है जिसमें गिलसराइड्स, स्नेहाम्ल, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५४५ फॉस्फोलिपिन् (Phospholipin), फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterols) तथा रंजक द्रव्य पाये जाते हैं। तैल के फेनॉलयुक्त भाग से एक सुनहले वर्ण का गॉसिपॉल् (Gossypol) नामक विषैला रवेदार पदार्थ पाया जाता है जो जल में नहीं घुलता किन्तु मद्यसार आदि अन्य द्रवों में घुलता है। यह छाल में पाया जाता है। गुण और प्रयोग-कपास के बीज-स्तन्यजनन, स्नेहन, स्रंसन, श्लेष्म निःसारक, बल्य एवं नाडीसंस्थान के लिये पौष्टिक हैं। इसकी रुई उपशोषण तथा रक्षण है। पुष्प-उत्तेजक तथा सौमनस्यजनन हैं। कोमल पत्ते-स्नेहन तथा मूत्रजनन हैं। तैल-स्नेहन, पौष्टिक तथा अधिक मात्रा में स्निग्ध विरेचक है। इसकी जड़ की छाल गर्भाशयसंकोचक एवं आर्तवजनन है। गर्भाशय पर इसकी क्रिया अर्गट (Ergot) की तरह होती है। इससे गर्भाशय का अच्छी तरह संकोच होकर रक्तस्राव रुकता है। इसकी अधिक मात्रा से गर्भपात होता है। (१) प्रसव के बाद इसकी छाल का क्वाथ पिलाने से गर्भाशय का संकोच होता हैज यह आँवल (अपरा) गिरने के बाद पिलाना चाहिए। यदि आधे घण्टे में गर्भाशय संकुचित होकर गेंद की तरह न मालूम पड़े तथा नाड़ी की गति तेज हो तो फिर दुबारा इसे देना चाहिये। पीडितार्तव तथा शीत से उत्पन्न आनार्तव में छाल के क्वाथ से लाभ होता है। श्वेत प्रदर में इसकी जड़ को चावल के धोवन के साथ देते हैं। (२) प्रसूता को दुग्ध वृद्धि के लिये बीजों की पेया बनाकर देते हैं। बीजों की चाय प्रवाहिका में उपयोगी है। शीतज्वर में ज्वर के पूर्व इसका क्वाथ पिलाते हैं। (३) इसके पुष्पों का शरवत उदासीनता-प्रधान मानसिक रोगों (Hypochondriasis) में पिलाते हैं। (४) घाव में रुई जलाकर भरने से रक्तस्राव रुकता है तथा घाव जल्दी अच्छा होता है। रुई का उपयोग शीत से रक्षा, उष्णता पहुँचाने तथा व्रण संरक्षण के लिये करते हैं। (५) इसके कोमल पत्तों का रस आमातिसार में देते हैं। मात्रा-मूलत्वक २-४ माशा; बीजचूर्ण ३-६ माशा। वनकपासी १-इसका उपयोग कपास की तरह ही किया जाता है। इसकी जड़ तथा फल सोजाक में देते हैं। नर्मा-इसमें कपास की अपेक्षा स्निग्धता अधिक रहने के कारण इसके पत्ते तथा जड़ का लेपों में अधिक उपयोग करते हैं। मूत्रकृच्छ्र में पत्तों को दूध में पीसकर पिलाते हैं। अथ वंशः (बांस) । तस्य नामगुणानाह वंशस्त्वक्सारकर्मारत्वचिसारतृणध्वजाः । शतपर्वा यवफलो वेणुमस्करतेजनाः ।। १५३ ।। वंशः सरो हिमः स्वादुः कषायो बस्तिशोधनः । छेदनः कफपित्तघ्नः कुष्ठास्रव्रणशोथजित् ।। १५४ ।। 'बाँस' के नाम तथा गुण-वंश, त्वक्सार, कर्मार, त्वचिसार, तृणध्वज, शतपर्वा, यवफल, वेणु, मस्कर और तेजन ये सब नाम 'बाँस' के हैं। बाँस-सारक, शीतवीर्य, स्वादिष्ट, कषायरसयुक्त, बस्तिशोधक, छेदक, कफपित्तनाशक एवं कुष्ठ, रक्तविकार, व्रण तथा शोथ इन सबको दूर करने वाला होता है। [१५३-१५४] अथ वंशस्य करीरयवयोर्गुणानाह तत्करीरः कटुः पाके रसे रूक्षो गुरुः सरः । कषायः कफकृत्स्वादुर्विदाही वातपित्तलः ।। १५५ ।। तद्यवास्तु सरा रूक्षाः कषायाः कटुपाकिनः । वातपित्तकरा उष्णा बद्धमूत्राः कफापहाः ।। १५६ ।। १. भारद्वाजी हिमा रुच्या व्रणशस्त्रक्षतापहा। (रा. नि.)। ३८ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५४६ भावप्रकाशनिघण्टुः 'बाँस' के अङ्कुर तथा यव (चावल) के गुण-बाँस का अङ्कुर-पाक में कटु रसयुक्त, रूक्ष, गुरु, सारक, कटु तथा कषायरसयुक्त, कफकारक, स्वादिष्ट, दाहजनक एवं वात-पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है। बांस के यव (चावल)-सारक, रूक्ष, कषायरसयुक्त, पाक में कटुरसयुक्त, वातपित्तकारक, उष्णवीर्य, मूत्ररोधक तथा कफनाशक होते हैं। [१५५-१५६] ७६. बाँस हिं०-बाँस। गु०-बाँस। म०-बांबू। बं०-बाँश। ते०-बेदरू, बोंगा। ता०-मुंगिल। कोल०-कटंगा। मा०-बांव। सन्ताल०-माट। अ०-कसब। अं०-Bamboo (बांबू)। ले०-Bambusa arundinacea Willd. (बांबुसा अरुण्डिनेसिया विल्ड)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। बाँस इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न किया जाता है और छोटी-छोटी पहाड़ियों के आस-पास आप ही आप जंगली भी उत्पन्न होता है। छोटे, बड़े, मोटे, पतले, ठोस और पोले इन भेदों से बांस कई प्रकार का होता है। इसकी ऊँचाई ३०-४० फीट से १०० फीट तक होती है और मोटाई ३-४ से १२-१६ इञ्च तक होती है। इसके पत्ते-१- १॥ इञ्च चौड़े और ५-६ इञ्च तक लम्बे होते हैं। प्रायः बाँस का वृक्ष पुराना होने पर फूलता-फलता है और कोई-कोई बाँस अवधि के पूर्व ही फूलने-फलने लगता है। इसके फूल-छोटे-छोटे सफेद होते हैं और फल-जइ के आकार के दिखाई पड़ते हैं। इसको वेणुबीज कहते हैं। इसकी कई अन्य जातियाँ होती हैं। बाँस के संबंध में शेष वर्णन वंशलोन के साथ पृष्ठ ? पर किया गया है। अथ नलः (नरसल) तस्य नामगुणानाह नलः पोटगलः शून्यमध्यश्च धमनस्तथा। नलस्तु मधुरस्तिक्तः कषायः कफरक्तजित्। उष्णो हृद्बस्तियोन्यर्त्तिदाहपित्तविसर्पहृत् ।।१५७।। 'नरसल' के नाम तथा गुण-नल, पोटगल, शून्यमध्य और धमन ये सब नाम 'नरसल' के हैं। नरसल- मधुर, तिक्त तथा कषायरसयुक्त और उष्णवीर्य होता है, एवम् कफ, रक्तविकार, हृदय, बस्ति तथा योनि सम्बन्धी पीड़ा, दाह, पित्त और विसर्प को दूर करने वाला होता है। [१५७] नोट-नल के सम्बन्ध में जो वर्णन निघंटुओं में मिलता है उससे कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। भावप्रकाशकार नल का एक ही भेद लिखते हैं तथा इन्होंने इसे उष्णवीर्य लिखा है किन्तु इसको पित्तविकार, कफविकार, रक्तदोष एवं विसर्प इत्यादि में लाभदायक माना है। रा० नि० तथा ध० नि० में नल एवं महानल (देवनाल) ये दो भेद मिलते हैं जिनमें से नल को शीतवीर्य एवं रक्तपित्तहर माना है तथा महानल को अधिक वीर्यशाली एवं रसक्रिया में उपयोगी लिखा है। नल के जो प्रयोग सुश्रुत-चरकादि में मिलते हैं उनसे ऐसा मालूम होता है कि यह शीतवीर्य है तथा पित्त विकार, विसर्प, मूत्रविकार आदि में उपयोगी है। उन प्रयोगों में इसके साथ कुश, दूर्वा आदि पित्तशामक एवं मूत्रजनक इसी प्रकार के द्रव्यों का उल्लेख है जिससे ऐसा अनुमान होता है कि नल भी इन्हीं के वर्ग का द्रव्य है। कुछ आधुनिक ग्रन्थकारों ने ग्रेमिनी (Gramineae) वर्ग के फ्रैग्माइटीज कर्का (Phragmites kirka) को नल माना है। इसी वर्ग में कुश, दूर्बा आदि द्रव्य भी आते हैं। कुछ अन्य आधुनिक विद्वानों ने नल को लोबेलिआ निकोटिआनफोलिआ (Lobelia nicotianaefolia) माना है जो कम्पैनुलेसी (Campanulaceae) वर्ग का है तथा जिसका पाश्चात्य चिकित्सा में कफनिःसारक रूप में तमकश्वास के लिये प्रयोग किया जाता है। यह विषैला द्रव्य है। नल के परिचय में कहीं पर 'वंशपत्रो मृदुच्छदः। छिद्रांत्रो नर्तको रन्ध्री मृत्युपुष्पो विभीषणः' यह भी श्लोक मिलता है जो उपर्युक्त लोबेलिया के लिये अधिक उचित मालूम पड़ता है। भावप्रकाशकार भी नल को उष्ण एवं कफहर मानते हैं किन्तु इन्होंने भी इसका वर्णन कुश, कास, दूर्बा आदि के साथ किया है अतः नल के ग्रैमिनी वर्ग के फ्रैग्माइटीज कर्का होने की संभावना भी कम नहीं है। स्वरूप की दृष्टि से दोनों CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५४७ द्रव्यों में पर्याप्त साम्यता पाई जाती है। लोबेलिआ दक्षिण की तरफ ही प्राप्त होता है। यहाँ पर दोनों द्रव्यों का अलग- अलग वर्णन किया गया है। ७७. नरकट हिं०-नरकट । म०-नल । गु०-नाली, नाइरी । कोल०-जंकई । ले०-Phrag-mites kirka Trin. (फ्रॅग्माइटीज कर्का ट्रिन.) । Fam. Gramineae (ग्रॅमिनी) । यह दलदलों या नदियों के किनारे होता है। इसका पौधा-१०-२० फीट ऊँचा तथा बाँस की तरह दिखलाई देता है। इसके कांड के पर्व पीले तथा छोटे होते हैं। लम्बे भूमिशायी कांडों द्वारा ये शीघ्र अपनी संख्या-वृद्धि करते हैं। पत्ते-कड़े, सीधे, खड़े, १-२ फीट लम्बे एवं १ से १ १/२ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्पव्यूह की छोटी दण्डिकायें धूसर या भूरे रंग की होती हैं। इसका एक अन्य भेद अरुण्डों डोर्नैक्स लिन. (Arundo donax Linn.) भी पाया जाता है जो ६-१२ फीट ऊँचा होता है। इसके मूल का क्वाथ स्नेहन, मूत्रल, आर्तवजनन एवं दुग्ध कम करने वाला है। इसमें ग्रेमाइन (Gramine, C₁₁ H₁₄ N₂) तथा डोनेक्सेराइन (Donaxarine, C₁₅ H₁₆ O₂ N₂) नामक दो क्षाराम पाये जाते हैं जिनमें से प्रथम की अल्पमात्रा से कुत्ते में रक्त दबाव बढ़ता है किन्तु अधिक मात्रा से कम हो जाता है। ७८. नरसल, देवनल हिं०-नरसल, नल । म०-देवनल, बोकेनल, ढवनल, नल । बं०-बड़ानल । क०-काडहोगे सोप्पु । ता०- काट्टुपुगैयिलै । कच्छ०-आँची । गु०-नाली । ते०-अडवियोगाकु । अं०-Wild tobacco (वाइल्ड टोबॅको); Lobelia (लोबेलिआ) । ले०-Lobelia nicotianaefolia Heyne. (लोबेलिआ निकोटिआनिफोलिआ हेन्.) । Fam. Lobeliaceae (लोबेलियेसी) । यह पश्चिमी घाट में बम्बई से त्रावनकोर तक २-७ हजार फीट की ऊँचाई तक, कोंकण, माथेराज, दक्षिण, महाराष्ट्र का दक्षिण प्रदेश, नीलगिरी, मलाबार तथा मैसूर में पाया जाता है। इसका क्षुप-५-१२ फीट ऊँचा, द्विवर्षायु या बहुवर्षायु होता है। काण्ड-ऊपर की तरफ पोला तथा ऊपर की ओर इससे शाखाएँ निकली रहती हैं। पत्ते-तंबाकू की तरह, संख्या में बहुत, हलके हरे रंग के, छोटे पर्णवृन्त से युक्त, नीचे के १२ × २ इञ्च बड़े तथा ऊपर के क्रमशः छोटे, भालाकार, महीन दाँतों से युक्त एवं मृदुरोमश होते हैं। पुष्प- जामुनी आभायुक्त, श्वेत वर्ण के, १ फीट तक लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल-८ मि० मि० व्यास के गोल सामान्य स्फोटिफल होते हैं। बीज-बहुत छोटे, अंडाकार, दबे हुये, पीताभ भूरे रंग के तथा स्वाद में अत्यन्त तीते होते हैं। इसके पुष्पदंड पर एक गाढ़ा, पीले रंग का स्राव जमा हुआ पाया जाता है। इसमें एक प्रकार की अप्रिय गंध होती है। इसके वायवीय भाग को अक्तूबर तथा नवम्बर में तोड़कर छाया में सुखाकर उपयोग में लाया जाता है। सूखे हुए पौधे पर राल की तरह एक पदार्थ लगा रहता है तथा इसका स्वाद उष्ण एवं तीता होता है। इसकी धूल से नाक तथा गले में तंबाकू की तरह प्रक्षोभ होता है। इसकी नली से बन्सी बनाई जाती है जिसे कोंकण में पावा कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें मुख्यतया लोबेलीन (Lobeline, C₂₂ H₂₇ O₂ N) नामक एक क्षाराम पाया जाता है। गुण और प्रयोग-लोबेलीन की क्रिया बहुत कुछ तंबाकू में पाये जाने वाले निकोटिन (Nicotine) की तरह होती है। इससे हल्लास उत्पन्न होकर कफ निकलता है। पाश्चात्य चिकित्सा में उद्वेष्टनयुक्त श्वसनिकाशोथ (Bronchitis) के लिए इसका बहुत उपयोग किया जाता है। तमकश्वास (Asthma) में आवेग के समय तथा बाद में भी इसके टिंक्चर
५४८ भावप्रकाशनिघण्टुः का १० बूँद दिन में ३ बार अन्य औषधियों के साथ उपयोग किया जाता है। उद्वेष्टनयुक्त कास में भी इससे लाभ होता है। इसके श्वसनकेन्द्र को उत्तेजित करने के कारण फुफ्फुसपाक तथा कार्बन मॉन् आक्साइड एवं मॉफोन की विषाक्तता में इसका उत्तेजक रूप में प्रयोग करते हैं। इसकी फली या पत्तों को थोड़ी देर चबाने से चक्कर, शिरःशूल, कंप एवं अन्त में हल्लास, प्रस्वेद तथा शिथिलता उत्पन्न होती है। विष प्रभाव—अधिक मात्रा से उपर्युक्त लक्षण अत्यंत तीव्र होते हैं तथा साथ में गले में जलन, ऐच्छिक क्रियाओं का धीरे-धीरे ह्रास, तीव्र तथा कमजोर नाड़ी, शैत्य, निपात एवं मूर्च्छा या संन्यास होता है। कुछ में मृत्यु के पूर्व आक्षेप होते हैं। मृत्यु श्वसन के रुकने से होती है। ५-८ र० पत्रचूर्ण या बीज से तीव्र वमन होता है तथा ४ माशे (१ ड्राम) पत्रचूर्ण से मृत्यु हुई है। इसका विषैला परिणाम इसके प्रयोग के पश्चात् कभी-कभी वमन के द्वारा ओषधि न निकलने के कारण होता है। मात्रा—चूर्ण ½-१ ½ र०; टिंक्चर लोबेलिआ इथेरिआ ५-१५ बूँद। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—(१) लोबेलिआ एक्सेलसा (Lobelia excelsa Lesch.) का इसके प्रतिनिधि के रूप में व्यवहार किया जाता है। यह इसी की तरह होता है किन्तु इसमें मुलायम रोमयुक्त मोटे पत्र होते हैं तथा मंजरी बैंगनी आभायुक्त हलके पीताभ रंग के घने पुष्पों से युक्त होती हैं। इसके परागाशय (Anther) पृष्ठ भाग पर चिकने होते हैं। (२) लोबेलिआ इन्फ्लेटा लिन. (Lobelia inflata Linn.) का पाश्चात्य चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है जो अमेरिका में उत्पन्न होता है। (३) ह॒र्बस्कम् थॅप्सस लिन. (Verbascum thapus Linn.); Fam. Scro-phularia (स्क्रोप्युलेरिएसी) तथा कम्पोज़िटी वर्ग के पौधों की कभी-कभी इसमें मिलावट रहती है।
अथ भद्रमुञ्जः (रामशर-सरपत इति वा) मुञ्जश्च (मूंज)। तयोर्नामगुणानाह
भद्रमुञ्जः शरो बाणस्तेजनश्चेक्षुवेष्टनः ।।१५८।। मुञ्जो मुञ्जातको बाणः स्थूलदर्भः सुमेखलः। मुञ्जद्वयन्तु मधुरं तुवरं शिशिरं तथा ।।१५९।। दाहतृष्णाविसर्पास्रमूत्रकृच्छ्राक्षिरोगजित् । दोषत्रयहरं वृष्यं मेखलासूपयुज्यते ।।१६०।। 'सरपत' तथा 'मूँज' के नाम और गुण—भद्रमुञ्ज, शर, बाण, तेजन और इक्षुवेष्टन ये सब नाम 'सरपत' के हैं। मुञ्ज, मुञ्जातक, बाण, स्थूलदर्भ और सुमेखल ये सब नाम 'मूंज' के हैं। उक्त दोनों प्रकार के मूञ्ज—मधुर, कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य और वृष्य होते हैं एवं दाह, तृषा, विसर्प, रक्तविकार, मूत्रकृच्छ्र, नेत्ररोग तथा त्रिदोष को दूर करनेवाले होते हैं और 'मेखला' बनाने में इनका उपयोग होता है। [१५८-१६०]
७९ भद्रमुञ्ज
हिं०—भद्रमुञ्ज, रामसर, सरपत, कंडा। क०—रामसपु, सरगोलु। सन्ताल०—सर। ते०—वेल्लुपोनिक। सिन्ध०— सर। बं०—शर। म०—शर। पं०—करकाना। गु०—तीरकांस। ले०—Sacharum munja Roxb. (सकेरम् मुंज राक्स.)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। भद्रमुञ्ज—यह उत्तर भारत, पंजाब तथा गंगा के ऊपरी मैदान में उत्पन्न होता है।
गुडूच्यादिवर्गः ५४९ यह तृणजाति की बहुवर्षायु वनस्पति प्रायः नदियों के किनारे गुच्छों में उगती है। यह १२ से १८ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-बहुत पतले-पतले, ५-७ फीट लम्बे, ।।।-१ इञ्च चौड़े तथा तीक्ष्णाग्र होते हैं। डंठल के अन्त में पीताभ सफेद से रक्ताभ बैंगनी बारीक फूलों का धनहरा लगता है। इसके कांड, पत्र तथा पत्रकोषों से निकाले रेशे काम में लिये जाते हैं। इसकी एक और जाति होती है जिसे मूँज कहा जाता है जो आकार प्रकार में छोटी होती है। शर तथा मूंज की जड़ का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीतल, तृष्णानिग्राहक, मूत्रल एवं वृष्य है। व्रण में तथा प्रसूता के कमरे में इसकी जड़ से धूपन किया जाता है। मात्रा-मूल ३-६ माशा। अथ कासः । तस्य नामगुणानाह कासः कासेक्षुरुद्दिष्टः सस्यादिक्षुरसस्तथा । इक्ष्वालिकेक्षुगन्धा च तथा पोटगलः स्मृतः ।। १६१ ।। कासः स्यान्मधुरस्तिक्तः स्वादुपाको हिमः सरः । मूत्रकृच्छ्राश्मदाहास्रक्षयपित्तजरोगजित् ।। १६२ ।। 'कास' के नाम तथा गुण-कास, कासेक्षु, इक्षुरस, इक्ष्वालिका, इक्षुगन्धा तथा पोटगल ये सब नाम कास के हैं। कास-मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, विपाक में मधुर, शीतवीर्य और सारक होता है एवं मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी (पथरी), दाह, रक्तविकार, क्षय तथा पित्त सम्बन्धी रोग को दूर करता है। [१६१-१६२] ८०. कास हिं०-कास, कासी, कांस घास। बं०-केशे। म०-कसई। गु०-कांसडो। क०-किरियिकागच्छ, कासलु। ते०-रेलु। ता०-नाणलू। मा०-कास। अं०-Thactch grass (थैंच ग्रास)। अं०-Saccharum spontaneum Linn. (सॅकेरम् स्पॉण्टेनियम् लिन.) । Fam. Gramineae (ग्रैमिनी) । यह सभी प्रान्तों में उत्पन्न होता है। कास तृणजातीय वनस्पति प्रायः नदियों के किनारे तथा दलदलों के आस-पास अधिक देखने में आती है। इसके पौधे ५-७ फीट (कभी-कभी १८ फीट तक) ऊँचे होते हैं। काण्ड ठोस होते हैं। पत्ते-१-२ ।। फीट लम्बे, बहुत कम चौड़े (१/८-१/४ इञ्च) तथा उनके किनारे मुड़े हुये होते हैं। पुष्पदण्ड-।।।-२ फीट लम्बा होता है जिस पर श्वेत वर्ण के पुष्प गुच्छों में आते हैं। शरदऋतु में ये पुष्पित होते हैं तथा शीत ऋतु में फलते हैं। इसका प्रायः छप्पर और टट्टी बनाने में उपयोग किया जाता है। इसके मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ स्तन्यजनन एवं मूत्रल है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, रक्तार्श, रक्तप्रदर एवं कपोत, पारावत आदि के मांस के खाने से उत्पन्न अजीर्ण में किया जाता है। मात्रा-मूल ३-६ माशा। अथ गुन्द्रः (पटेर-गोंदपटेर इति च) । तस्य नामगुणानाह गुन्द्रः पटेरको गुल्मः शृङ्गवेराभमूलकः। गुन्द्रः कषायो मधुरः शिशिरः पित्तरक्तजित् । स्तन्यशुक्ररजोमूत्रशोधनो मूत्रकृच्छ्रहृत् ।। १६३ ।। गोंद पटेर के नाम तथा गुण--गुन्द्र, पटेरक, गुल्म और शृङ्गवेराभमूलक ये सब नाम 'गोंदपटेर' के हैं। गोंद पटेर-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतवीर्य, रक्तपित्त एवं मूत्रकृच्छ्र को दूर करनेवाला एवं दूध, शुक्र, रज और मूत्र का शोधन करनेवाला होता है। [१६३] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५५० भावप्रकाशनिघण्टुः ८१. गोंद पटेर (गुन्द्र) हिं०-पटेर, गोंदपटेर । म०-रामबाण । ले०-Typha angustata Bory & Chaub. (टाइफा अँग्स्टेटा, वो., चौ.)। Fam. Typhaceae (टाइफेसी) । नोट-आगे वर्णित एरका और गोंदपटेर एक ही जाति की वनस्पतियाँ हैं। इनका वर्णन आगे एक साथ ही किया गया है। अथैरका (मोथीतृणविशेषः) । तस्या नामगुणानाह एरका गुन्द्रमूला च शिविर्गुन्द्रा शरीति च । एरका शिशिरा वृष्या चक्षुष्या वातकोपिनी । मूत्रकृच्छ्राश्मरीदाहपित्तशोणितनाशिनी ॥१६४॥ 'एरका' के नाम तथा गुण-एरका, गुन्द्रमूला, शिबि, गुन्द्रा और शरी ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। एरका- शीतवीर्य, वृष्य, नेत्रों के लिये हितकर, वात को कुपित करने वाली एवं मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, दाह, पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [१६४] ८२. एरका हिं०-एरका, पटेरा । बं०-होगला । म०-रामबाण । गु०-घाबाजरीयुं । अं०-Elephant grass (एलिफेण्ट ग्रास) । ले०-Typha elephantina Roxb. (टाइफा एलिफेण्टीना रा.) । Fam. Typhaceae (टाइफेसी) । एरका-पश्चिमोत्तर हिन्दुस्तान आसाम एवं दक्षिण तक के दलदलों में एवं सिंधु के डेल्टा में अधिक पाई जाती -है। यह दलदलों में उत्पन्न होने वाली तृणजातीय वनस्पति ६ से १२ फीट तक लम्बी होती है तथा यह समूहबद्ध होकर उगती है। पत्ते-मूलीय, ४-६ फीट लम्बे, पौन से डेढ़ इञ्च तक चौड़े और नतोदर होते हैं। इनकी धार अग्र की ओर लहरदार होती है। पुष्प-नारीपुष्पों की विदण्डिक मंजरियाँ ८-२० इञ्च लम्बी और भूरी नारंगी रंग की होती हैं। इन्हीं पुष्पदण्डों से ८-२२ इञ्च लम्बी नरपुष्पों की मंजरियाँ भी निकली रहती हैं। इसकी एक दूसरी जाति T. angustata (टाइफा अँग्स्टेटा) भी पाई जाती है। इनमें मुख्य भेद दोनों की पत्तियों में होता है। पहली जाति में कोषमय पत्राधार के ऊपर पत्ती का घेरा त्रिभुजाकार और दूसरी जाति में क्वचित् गोलाकार होता है। इनकी पत्तियों की चटाइयाँ बनती हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, मूत्रल, ग्राही, वीर्यवर्धक, चक्षुष्य तथा अश्मरी, दाह एवं रक्तपित्तनाशक है। इसके पुष्पों को कूचकर व्रण पर बाँधने से व्रण जल्दी भर जाता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ कुशः (कुशा) क्षुरपत्रश्च (डाभ) तयोर्नामानि गुणांश्चाह कुशो दर्भस्तथा बर्हिः सूच्यग्रो यज्ञभूषणः । ततोऽन्यो दीर्घपत्रः स्यात्क्षुरपत्रस्तथैव च ॥१६५॥ दर्भद्वयं त्रिदोषघ्नं मधुरं तुवरं हिमम् । मूत्रकृच्छ्राश्मरीतृष्णाबस्तिरुक्प्रदरास्रजित् ॥१६६॥ कुश तथा डाभ के नाम और गुण-कुश, दर्भ, बर्हि, सूच्यग्र और यज्ञभूषण ये सब 'कुशा' के नाम हैं और दीर्घपत्र एवं क्षुरपत्र ये दो नाम 'डाभ' के हैं। दर्भद्वय (उपर्युक्त कुशा तथा डाभ ये दोनों)-त्रिदोषनाशक, मधुर तथा कषायरसयुक्त, शीतल एवं मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी (पथरी), तृषा, बस्तिसम्बन्धी रोग तथा रक्त प्रदर को दूर करने वाले होते हैं। [१६५-१६६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५५१ ८३. कुश, दर्भ हिं०-कुशा, दाभ, कुस घास । म०-दर्स्न । बं-कुश । पं०-दभ, द्रभ । गु०-दाभडो, दरभ । क०-वीलीय, बुद्धशशी । ते०-कुश, दर्बालु । ता०-दर्भ । ले०-Eragrostis cynosuroides Beauv. (इरेग्रॉस्टिस् साइनोसुरोइडीस् बी.); Syn. Desmostachya bipinnata Stapf (डिस्मोस्टेचिआ बाइपिन्नॉटा स्टा.) । Fam. Gramineae (ग्रॉमिनी) । कुश-मूंझ की जाति की मूंझ से छोटी एक प्रकार की घास है । इसके पत्ते, काण्ड, धनहरा आदि मूंझ के ही आकार के परन्तु मूंझ से छोटे होते हैं । यह खुले हुए घास के मैदानों में सर्वत्र पाया जाता है । इसके पौधे मोटे, बहुवर्षायु, दृढ़ तथा १-३ फीट ऊँचे होते हैं । मूलस्तम्भ-सीधा खड़ा परन्तु बहुत गहराई तक होता है । पत्ते-१८ इञ्च तक लम्बे, .२ इञ्च चौड़े, अग्र पर काँटे की तरह तीक्ष्ण और पत्रतट सूक्ष्म रोमों के कारण तेज धार का होता है । पुष्पदण्ड-६-१८ इञ्च लम्बा तथा सीधा होता है । बीज-१/४ इञ्च लम्बे, अंडाकार तथा चपटे होते हैं । वर्षऋतु में पुष्प तथा शीतऋतु में फल लगते हैं । इसकी छोटी जाति को कुश तथा बड़ी जाति को दर्भ कहते हैं । दर्भ के पत्ते लम्बे तथा खर होते हैं । चरक सुश्रुत में कुश, काश तथा दर्भ इनका एक साथ अनेक स्थानों में प्रयोग आया है । डल्हण ने इन तीनों का परिचय इस प्रकार दिया है-कुशः ह्रस्वदर्भः । ह्रस्वो मृदुः सूचीपत्रः ।। कासः चामरपुष्पः चामरपत्रः ।। दर्भः पृथुलः खरपत्रः दीर्घः ।। रा० नि० ने इसका एक श्वेत दर्भ भेद लिखा है जिसे अधिक गुणकारी माना है । इनके मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है । गुण और प्रयोग-कुश एवं दर्भ शीतल, मूत्रविरेचन, स्तन्यजनन एवं पिपासाहर है । प्रदर, आँव, दाह, रक्तार्श, अश्मरी एवं बस्तिविकारों में इसका उपयोग किया जाता है । प्रदर, रक्तप्रदर एवं रक्तार्श में इसकी जड़ एवं बला को चावल के धोवन के साथ पीसकर देने से लाभ होता है । मात्रा-३-६ माशा । अथ कत्तृणम् (रोहिस इति च) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कत्तृणं रौहिषं देवजग्धं सौगन्धिकं तथा । भूतिकं ध्यामपौरञ्च श्यामकं धूपगन्धिकम् ।। १६७ ।। रौहिषं तुवरं तिक्तं कटुपाकं व्यपोहति । हृत्कण्ठव्याधिपित्तास्रशूलकासकफज्वरान् ।। १६८ ।। 'रोहिस' नाम से प्रसिद्ध कत्तृण के नाम तथा गुण-कत्तृण, रौहिष, देवजग्ध, सौगन्धिक, भूतिक, ध्यामपौर, श्यामक तथा धूमगन्धिक ये सब 'रोहिस' वाचक शब्द हैं । रोहिस-स्वाद में कषाय तथा तिक्तरसयुक्त एवं विपाक में कटुरसयुक्त होता है और हृदय तथा कण्ठसम्बन्धी रोग, पित्तरक्त (रक्त पित्त), शूल, कास (खाँसी) तथा कफज्वर को नष्ट करता है । [१६७-१६८] ८४. रोहिष घास हिं०-रोहिस, रूसा घास, रतहर, मिरचा गन्ध । बं०-अगम घास । म०-रोहिषगवत । क०-डुंल्लु । फा०- खवालमागून, खलालमामून, खबालमामून । गु०-रोंडसो । अं०-Rosha Grass (रोषा ग्रास) । ले०-Cymbopogon schoenanthus Linn. (साइम्बोपोगोन् स्कीनैन्थस् लिन.) । Fam. Gramineae (ग्रेमिनी) । यह मध्य भारत, दक्षिण और पश्चिमोत्तर प्रान्त तथा पञ्जाब में अधिक पाई जाती है । यह वन उपवनों में आप ही आप उत्पन्न होती है और वाटिकाओं में भी रोपण की जाती है । यह ५-६ फीट ऊँची एक सुगन्धित घास है । इसकी जड़ बारहौं मास जीवित रहती है । काण्ड-चिकने, पत्रयुक्त तथा प्रायः रक्ताभ होते हैं । पत्ते-बहुत लम्बे, क्रमश: पतले, चिकने, कोमल, नुकीले, कांडासक्त तथा आधार पर गोल CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५५२ भावप्रकाशनिघण्टुः
या तांबुलाकार होते हैं। पत्तों को मसलने से सुगन्ध आती है। पुष्प-लाल, बादामी रंग के पत्रकोश से ढँकी हुई विदण्डिक मञ्जरियां आती हैं। वर्षा एवं शीतकाल में फूल-फल आते हैं। रासायनिक संगठन-इसकी पत्तियों से एक सुगन्धित तेल (Geranium oil- जिरेनियम् ऑयल) निकाला जाता है। कोमल घास से तेल अधिक एवं उत्तम प्रकार का निकलता है। इसका रंग फीका ललाई लिये जामुनी रंग का होता है। इसमें गन्ध गुलाब जैसी तथा स्वाद में यह अदरख की तरह चरपरा एवं रुचिकर होता है। गुण और प्रयोग-इसमें का तेल उष्ण, स्वेदजनन, मूत्रजनन, ज्वरघ्न, उत्तेजक, चेतनाकारक एवं त्वग्भागकारक है। नूतन आमवात में तैल मलने से लाभ होता है। गंजापन (इन्द्रलुप्त) पर इस तैल को मलते हैं। प्रतिश्याय, ज्वर, अजीर्ण तथा कफविकारों में इसके क्वाथ से लाभ होता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ भूतृणम् (शरबाण) तस्य नामगुणानाह गुह्यबीजं तु भूतीकं सुगन्ध्यं जम्बुकप्रियम्। भूतृणं तु भवेच्छत्रा मालातृणकमित्यपि ।।१६९।। भूतृणं कटुकं तिक्तं तीक्ष्णोष्णं रेचनं लघु। विदाहि दीपनं रूक्षमनेत्र्यं मुखशोधनम् ।।१७०।। अवृष्यं बहुविट्कञ्च पित्तरक्तप्रदूषणम् ।।१७१।। शरबाण के नाम तथा गुण-गुह्यबीज, भूतीक, सुगन्ध्य, जम्बुकप्रिय, भूतृण, छत्रा और मालातृणक ये सब शरबाण के नाम हैं। शरबाण-कटु तथा तिक्तरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रेचक, लघुपाकी, दाहजनक, अग्निदीपक, रूक्ष, नेत्रों के लिये अहितकर, मुख को शुद्ध करनेवाला, अवृष्य (वीर्यवृद्धि नहीं करने वाला), अत्यन्त मल उत्पन्न करने वाला और पित्तरक्त को दूषित करने वाला होता है। [१६९-१७१] नोट-भृतृण के लेटिन नाम के सम्बन्ध में मतभेद हैं। श्री यादवजी ने साइम्बोपोगोन् ज्वरांकुश (Cymbopogon jwarankusa) को भूतृण माना है जिसका वर्णन पहले पृष्ठ २६१ पर 'लामज्जक' के अन्तर्गत किया जा चुका है। कुछ विद्वानों ने हरी चाय, साइम्बोगोन् साइट्रोटस् (Cymbopogon citratus) को भूतृण माना है किन्तु इसे श्री यादवजी 'जम्बीरतृण' मानते हैं जिसका चरक सू० अ० २७ में हरित वर्ग में एवं सुश्रुत सू० अ० ४६ में शाक वर्ग लिखित में वर्णन आया है। यहाँ पर निम्नलिखित वर्णन हरीचाय का किया गया है। ८५. भूतृण (हरीचाय) हिं०-शरबाण, भूतृण, गन्धतृण, अगियाखर, हरीचाय, गन्धबेना। बं०-गन्धतृण। गु०-लीलीचा। म०- हिरवा चहा, ओला चहा। क०-मज्जिगेहुल्लु। पं०-गन्धतृण, शरवाण, रामकर्पूर। ता०-कर्पूर पुल्ल। ते०- चिप्पगंड्डि। अं०-Lemon Grass (लेमन् ग्रास); ले०-Cymbopogon-citratus (DC.) Stapf. (साइम्बोपोगॉन् साइट्रेट्स् डीसी. स्टा.); Andropogon citratus DC. (एण्ड्रोपोगॉन साइट्रेटस डीसी.)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। यह भारतवर्ष के अनेक प्रान्तों में विशेषकर पंजाब और संयुक्त प्रान्त की पहाड़ी भूमि तथा वाटिकाओं में भी उत्पन्न होती है। यह ५-७ फीट ऊँची घास है। पत्ते-३-४ फीट लम्बे, पौन इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-उभयलिङ्गी पुष्प की मञ्जरियाँ वर्षाकाल में आती हैं। इसकी पत्ती को मसलने से उसमें से नींबू की तरह सुगन्ध आती है। इस तृण का फांट बनाकर उसमें दूध और चीनी मिलाकर चाय की तरह पीते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धित उड़नशील तैल होता है जिसे Indian Melissa oil (इंडियन् मेलिसा ऑइल), Indian oil of Verbena (इंडियन् ऑइल् ऑफ वर्बेना) कहते हैं। यह गहरे पीत या भूरे से लाल रंग का नींबू की गन्ध जैसा होता है। इस तैल में प्रधान रूप से सिट्राल (Citral, C10 H16 O) नामक पदार्थ होता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५५३ है जिसे आयोनॉन् (Ionone) नामक एक अन्य पदार्थ में रासायनिक विधि से परिवर्तित किया जा सकता है। आयोनॉन् का सुगन्धि द्रव्यों एवं विटामिन् ए (Vitamin A) के बनाने में उपयोग होता हैं। आयोनॉन् में ह्वायोलेट जैसी तीव्र सुगन्ध होती है। गुण और प्रयोग-हरी चाय उष्ण, स्वेदजनन, मूत्रजनन, ज्वरघ्न, वातानुलोमन, उत्तेजक, चेतनाकारक, उद्वेष्टननिरोधि, मुखशुद्धिकर, कफवातहर, दीपन, पाचन एवं रुचिकर है। इसका तैल बाह्य प्रयोग में त्वग्रागकारक एवं वातहर है। प्रतिश्याय, ज्वर, वमन, अतिसार, आध्मान, शूल, आक्षेप एवं विसूचिका में इसके फाण्ट से बहुत लाभ होता है। विसूचिका में इससे वमन रुकता है एवं उत्तेजना आती है। इसका तैल आध्मान, शूल तथा विसूचिका में १/२-३ बूँद की मात्रा में देते हैं। मलेरिया ज्वर में हरी चाय का उपयोग किया जाता है। कटिशूल, आमवात तथा पीड़ा आदि में इसके तैल की मालिश की जाती है। मात्रा-तैल १/२-३ बूँद, तृण ३-६ माशा। अथ नीलदूर्बा (हरीदूब) तस्या नामानि गुणाँश्चाह नीलदूर्वा रुहाऽनन्ता भार्गवी शतपर्विका। शष्पं सहस्रवीर्या च शतवल्ली च कीर्तिता ।।१७२।। नीलदूर्वा हिमा तिक्ता मधुरा तुवरा हरेत्। कफपित्तास्रवीसर्पतृष्णादाहत्वगामयान् ।।१७३।। 'हरी दूब' के नाम तथा गुण-नीलदूर्वा, रुहा, अनन्ता, भार्गवी, शतपर्विका, शष्य, सहस्रवीर्या और शतवल्ली ये सब 'हरी दूब' के नाम हैं। हरी दूब-शीतवीर्य, तिक्त, मधुर तथा कषायरसयुक्त एवं कफ, पित्तरक्त, विसर्प, तृषा, दाह और चर्मरोग को दूर करने वाली होती है। [१७२-१७३] हिं०-हरी दूब, नीली दूब, रामघास। बं०-नीलदुर्बा, दूर्वा। म०-नीलदूर्वा, हरली, नीलीहारेयाली। संथाल०- धोबीघास। गु०-खडध्रो, लीलीध्रो, धरो। क०-गरिके। पं०-दूबड़ा। ते०-दूलु, गरिकेग। ता०-अरुवमपिल्लू। अ०-उश्व। फा०-मर्ग। अं०-Creeping Cynodon (क्रीपिंग साइनोडोन्)। ले०-Cynodon dactylon (Linn.) Pers. (साइनोडॉन् डॅकटीलोन पर्स.)। Fam. Gramineae (ग्रॅमिनी)। दूब-तृणजाति की वनस्पति सब प्रान्तों के वन, उपवन, खेत सब जगह उत्पन्न होती है। गर्मी के दिनों में प्रायः सूख सी जाती है, परन्तु बरसात का पानी पड़ने से फिर हरी-भरी हो जाती है। जलाशय और कुएँ के पास बारहौं मास हरी-भरी देखने में आती है। इसकी डंडियाँ पतली-पतली होती हैं, और भूमि पर फैली हुई रहती हैं। अन्तवाली शाखायें जिन पर कोमल बारीक फूल आते हैं, वे जमीन से उठी रहती हैं। पत्ते-पतले, ४-६ लम्बे, रेखाकार होते हैं। बीज- बहुत छोटे होते हैं। गुण और प्रयोग-दूर्वा शीतल, वर्ण्य, प्रजास्थापन, रक्तस्कंदन, व्रणरोपण, मूत्रजनन तथा कफपित्तहर है। (१) बस्तिशोथ, सोजाक तथा मूत्रमार्ग के दाह में इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। (२) त्वचा के रोगों में इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। सद्योव्रण तथा त्वचा के रोगों में इसकी पतियों का लेप उपयोगी है। इससे रक्तस्राव रुकता है। (३) अतिसार, पैत्तिक, वमन, उदर, जलोदर, अत्यार्तव, गर्भपात, उन्माद, अपस्मार तथा रक्तमेह आदि में इसका स्वरस पिलाया जाता है। (४) नेत्राभिष्यंद में पत्र-कल्क का लेप करते हैं। (५) अर्श में जलन कम करने के लिये पत्तों का लेप किया जाता है। मात्रा-स्वरस ६ माशा-१ तोला; मूल ३-६ माशा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५५४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ श्वेतदूर्वा । तस्या नामानि गुणाँश्चाह दूर्वा शुक्ला तु गोलोमी शतवीर्या च कथ्यते । श्वेता दूर्वा कषाया स्यात्स्वाद्वी व्रण्या च जीवनी । तिक्ता हिमा विसर्पास्रतृट्पित्तकफदाहहृत् ।।१७४।। ८७. श्वेत दूर्बा हिं०-सफेद दूर्बा । यह भी दूब के समान ही घास है जिसके पत्ते सफेदीपन लिये होते हैं । यह कोई भिन्न जाति है या केवल स्थान- भेद से इसमें सफेद पत्ते होते हैं यह कहना कठिन है । अभी इसमें अनुसंधान की आवश्यकता हैं । यह अधिक पित्तशामक मानी जाती है । अथ गण्डदूर्वा (गांडरदूब) तस्या नामानि गुणाँश्चाह गण्डदूर्वा तु गण्डाली मत्स्याक्षी शकुलादनी । गण्डदूर्वा हिमा लोहद्राविणी ग्राहिणी लघुः ।।१७५।। तिक्ता कषाया मधुरा वातकृत्कटुपाकिनी । दाहतृष्णाबलासास्रकुष्ठपित्तज्वरापहा ।।१७६।। गांडर दूब के नाम तथा गुण-गण्डदूर्वा, गण्डाली, मत्स्याक्षी और शकुलादनी, ये सब नाम गांडर दूब के हैं । गांडर दूब-शीतवीर्य, लोहे को पिघलाने वाली, मलसंग्राहक (मल को रोकने वाली), लघु, तिक्त, कषाय एवं मधुर रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, वातकारक एवं दाह, तृषा कफ, रक्तविकार, कुष्ठ तथा पित्तज्वर को दूर करने वाली होती है । [१७५-१७६] ८८. गण्डदूर्वा हिं०-गांडरदूब, गठीलादूब, गण्डदूर्वा । गांडरदूब-दूब की जाति की एक वनस्पति है, जो दूब से बड़ी होती है और यह प्रायः जलाशयों के किनारे अधिक उत्पन्न होती है । उसकी डंठी मोटी और बड़ी होती है । पत्ते-दूब के समान परन्तु दूब से बहुत बड़े होते हैं । गाँठे मोटी होती हैं । वाराहीकन्दः (गेठी इति लोके) । तस्य लक्षणनामगुणानाह वाराहीकन्दसंज्ञस्तु पश्चिमे गृष्टिसंज्ञकः । वाराहीकन्द एवान्यैश्चर्मकारालुको मतः ।।१७७।। अनूपसम्भवे देशे वराह इव लोमवान् । वाराहवदना गृष्टिर्वरदेत्यपि कथ्यते ।।१७८।। वाराही तु रसे स्वाद्धी तिक्ता पाके पुनः कटुः । शुक्रायुःस्वरवर्णाग्निबलपित्तविवर्द्धिनी । कफकुष्ठमरुन्मेहकृमिहृच्च रसायनी ।।१७९।। वाराहीकन्द के लक्षण नाम और गुण-जिसका 'वाराहीकन्द' नाम है, उसी को पश्चिम देश में 'गृष्टि' कहते हैं और 'वाराहीकन्द' को ही कुछ लोग 'चर्मकारालुक' कहते हैं । अनूप (जलप्राय) देश में यह सूअर के बालों की तरह कठिन रोम से युक्त कन्द वाला होता है । इसके वाराहवदना, गृष्टि, वरदा ये सब नाम हैं । वाराहीकन्द-यह मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, पाक में कटु और रसायन एवं शुक्र, आयु, स्वर, वर्ण, जठराग्नि, बल और पित्त को बढ़ाने वाला एवं कफ, कुष्ठ, वात, प्रमेह तथा कृमि को दूर करने वाला होता है । [१७७-१७९] नोट-वाराही कंद के स्थान पर डायोस्कोरिआ बल्बिफेरा (Dioscoea bulbifera) एवं टेक्का एस्पेरा (Tecca aspera) इन दो द्रव्यो का उपयोग किया जाता है । अधिकांश विद्वान् प्रथम के कंद को वाराही कन्द मानते हैं । उसकी अनेक उपजातियाँ भी पाई जाती हैं । यहाँ दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५५५ ८९ वाराही कन्द (१) हिं०-वाराही कन्द, नेंठी । म०-डुक्कर कन्द, कडूकरंदा । गु०-डुक्करकंद, बणा बेल । बं०-रतालु । ले०-Dioscorea bulbifera Linn. (डायोस्कोरिआ बल्विफेरा लिन.) । Fam. Doscoreaceae (डायोस्कोरिएसी) । यह दून और सहारनपुर के वनों में ५ हजार फीट की ऊँचाई तक तथा सभी स्थानों में पाया जाता है । इसकी लता-आरोही तथा वामावर्त होती है । कांड-चिकने तथा पत्रकोणों में लगभग १ इञ्च व्यास की कन्द सदृश रचनाएँ होती हैं । पत्ते-साधारण एकान्तर, २।।-६ इञ्च लम्बे, १।।।-४ इञ्च चौड़े, पतले, पुच्छाकार लम्बे नोकवाले तथा आधार पर तांबूलाकार होते हैं । इनके आधारीय खण्ड गोल और पत्राधार पर ९ शिराएँ होती हैं । पुष्प-नरपुष्पों की मंजरियाँ नीचे की ओर लटकी हुई, २-४ इञ्च लम्बी और प्रायः पत्रकोणों में समूहबद्ध होकर निकली हुई रहती हैं । नारीपुष्पों की मञ्जरियाँ ४-१० इञ्च लम्बी होती हैं । फल-३ पंख वाले और बीज भी आधार पर सपंख होते हैं । कन्द- छोटे आकार का भूरे रंग का होता है जिस पर सूअर की तरह रोम होते हैं । यह भीतर से पीताभ श्वेत होता है । इसकी अन्य जातियों का भी प्रयोग किया जाता है । कुछ में कन्द बहुत गहरे बैठते हैं तथा वे अधिक मुलायम होते हैं । रासायनिक संगठन-इसकी लता में एक विषैला ग्लूकोसाइड पाया जाता है । इसके कंद में स्टार्च होता है । गुण और प्रयोग-यह कुछ रक्तसंग्राहक तथा ग्राही है । रक्तातिसार, प्रवाहिका, उदरशूल, अर्श आदि रोगों में इसके फलों को जीरा तथा शर्करा के साथ देते हैं । त्वचा के रोगों में भी इसका व्यवहार किया जाता है । मात्रा-३-६ माशा । ९०. वाराहीकंद (२) हिं०-वाराहीकंद, भेवर के कंद, भेवर की बेल । ले०-Tacca aspera Roxb. (टॅक्का एस्पेरा राक्स.) । Fam. Taccaceae (टॅक्केसी) । यह वर्मा, बहुवर्षायु, तेनासरिम तथा मलय प्रायद्वीप में होता है । इसका क्षुप-बहुवर्षायु एवं मूलस्तंभ कंदवत्, आयताकार एवं मुड़ा हुआ रहता है । पत्ते-दीर्घवृत्ताकार, अंडाकार, ८-१६ × ४-८ इञ्च; लम्बाग्र, शिराएँ स्पष्ट एवं उनके बीच का भाग उभरा हुआ होता है । पुष्प-हरिताभ बैंगनी कुछ पीत होते हैं । फल-करीब १।। इञ्च लम्बा, आयताकार तथा मांसल होता है । गुण और प्रयोग-इसके कंद बल्य होते हैं तथा इनका उपयोग रक्तपित्त एवं चर्मरोगों में किया जाता है । मात्रा-३-६ माशा । अथ विदारीकन्दः । तस्य नामगुणानाह विदारी स्वादुकन्दा च सा तु क्रोष्ट्री सिता स्मृता । इक्षुगन्धा क्षीरवल्ली क्षीरशुक्ला पयस्विनी ।।१८० ।। विदारी मधुरा स्निग्धा बृंहणी स्तन्यशुक्रदा ।।१८१।। शीता स्वर्या मूत्रला च जीवनी बलवर्णदा । गुरुः पित्तास्रपवनदाहान् हन्ति रसायनी ।।१८२।। विदारी कन्द के नाम तथा गुण-विदारी, स्वादुकन्दा, क्रोष्ट्री, सिता, इक्षुगन्धा, क्षीरवल्ली, क्षीरशुक्ला तथा पयस्विनी के सब नाम विदारीकन्द के हैं । विदारीकन्द-मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, बृंहण, दुग्धवर्धक और शुक्र को बढ़ाने वाला, शीतवीर्य, स्तर को उत्तम बनाने वाला, मूत्रकारक, जीवनी शक्ति बढ़ाने वाला, बल तथा वर्ण को देनेवाला, गुरु, रसायन एवं पित्त, रक्त, वायु और दाह को नष्ट करने वाला होता है । [१८१-१८२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
५५६ भावप्रकाशनिघण्टुः विदारीकन्द के विदारी एवं क्षीरविदारी ये दो भेद चरक ने मधुरस्कंध (वि० अ० ८) में लिखे हैं। प्यूरेरिआ ट्युबरोजा (Pueraria tuberosa) को विदारी एवं आइपोमिआ डिजिटेटा (Ipomoea digitata) को क्षीरविदारी अधिकांश विद्वानों ने माना है। 'भुइकुम्हडा' नाम उपर्युक्त दोनों कन्दों को तथा ट्राईकोसॅन्थिस् कॉर्डेटा राक्स (Trichosanthes cordata Roxb.) के कन्द को भी देते हैं। सम्भव है डायोस्कोरिएसी (Dioscoreaceae) वर्ग जिस वर्ग का वाराहकन्द है उसी वर्ग के विदारी एवं क्षीरविदारी भी हों। उत्तर प्रदेश में अधिकतर प्यु. ट्युबरोजा को एवं बंगाल में आ. डिजिटेटा को विदारीकन्द माना जाता है। एक क्षीर युक्त लता लेट्सोमिया सेटोसा राक्स (Lettsomia setosa, Roxb.) के कन्द का स्तन्यवर्धक के रूप में प्रयोग प्रचलित है। संभव है यह क्षीरविदारी हो। यहाँ पर प्रथम दो का अलग-अलग वर्णन किया गया है। ९१. विदारीकन्द (१) हिं० - विदारीकन्द, विलाईकन्द, भुइकुम्हड़ा, सुराल, पाताल कोहड़ा। म० - बेंदर, घोडवेल। गु० - खाखर बेल, फगियो, फगड़ानो वेली, विदारी। बं० - शिमीय। ते० - दारी, नेल्लगुम्मुडु। मा० - गोरवेल। ले० - Pueraria tuberosa DC. (प्युरॅरिआ ट्युबरोजा डीसी.)। Fam. Leguminosae (लेम्युमिनोसी)। 'यह कोंकण के पहाड़ों पर, दक्षिण, कनारा, पश्चिम-हिमालय, शिमला, कुमाऊ, नेपाल, विन्ध्याचल, उड़ीसा और छोटा नागपुर में उत्पन्न होता है और बिहार में भी कहीं-कहीं पाया जाता है। यह नदी-नालों के करारों में अधिक पाया जाता है। यह अत्यन्त विस्तार में फैलने वाली लता जाति की वनस्पति अचिरस्थायी होती है। इसका कांड पोला-सा होता है। छाल - भूरे रंग की आध इञ्च मोटी होती है। लकड़ी - छिद्रयुक्त कोमल होती है। पत्ते - पलाश के समान पक्षाकार त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक - ४-६ इञ्च लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े, अग्र्य पत्रक तिर्यगायताकार और पार्श्वपत्रक तिरछे लट्वाकार तथा अधरतल पर श्वेत तलशायी रेशमतुल्य सघन रोओं से युक्त होते हैं। पुष्प - ६-१८ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। पुष्प नीले या नीलरक्त रंग के सुन्दर दिखलाई देते हैं। फलियाँ - २-३ इञ्च तक लम्बी, चिपटी, बीजों के बीच दबी हुई और खाकी रंग के रोवों से भरी रहती हैं। प्रत्येक फली में २-६ तक बीज रहते हैं। प्रायः पत्तों के गिरने पर नवीन पत्तों के निकलने के प्रथम ही फूल आते हैं। जमीन के नीचे इसमें प्रायः कई कन्द रहते हैं, जो कांड से दृढ़मूल शाखा के द्वारा जुड़े रहते हैं और नीचे भी मूल शाखा पुनः निकली रहती है। इन्हीं को विदारीकन्द कहते हैं। यह गोल कुम्हड़े के आकार के भूरे रंग का एवं लम्बाई में २ फीट तक तथा घेरे में २।। फीट तक बड़ा होता है। पुराना कन्द २० सेर से भी अधिक वजन का देखने में आता है, किन्तु छोटे कन्द की अपेक्षा बड़े कन्द हीनवीर्य समझे जाते हैं। छोटे कन्द उखाड़ने के बाद कुछ दिनों तक बिगड़ते नहीं हैं परन्तु बड़े कन्द बहुत जल्द सड़-गल जाते हैं। छोटे-छोटे कन्दों के पतले-पतले कतरे कर सुखाने से व दूध के समान श्वेत दिखाई पड़ते हैं तथा विदारीकन्द नाम से बाजार में बिकते हैं। बड़े कन्द की अपेक्षा छोटे कन्द का स्वाद अच्छा और मीठा होता है। छोटे-छोटे मुलायम और नवीन कन्द हरिद्वार आदि की सब्जीमण्डियों में 'सराल' के नाम से बिकते हैं। कन्दों में कुछ-कुछ मुलेठी का स्वाद आता है इसलिये विदारी को 'स्वादुकन्दा', 'इक्षुविदारी' आदि नाम दिया गया है। ये लताएँ घोड़ों को बहुत प्रिय होती हैं जिससे इन्हें 'गजवाजिप्रिया' 'घोड़ेबेल' कहा गया है। गुण और प्रयोग - यह स्तन्यजनन, मूत्रजनन तथा पौष्टिक है। शोथ पर पीस कर इसे बाँधते हैं। बल एवं दुग्धवृद्धि के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। अधिक मात्रा से इससे वमन होता है। मात्रा - १/४ - १/२ तोला। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५५७ ९२. विदारीकन्द (२) क्षीरविदारी हिं०-बिलाईकन्द, विदारीकन्द, भुइकुम्हड़ा। बं०-भुइ कुमड़ा। म०-भुईकोहला। गु०-विदारीकन्द। क०- नेलकुम्बल। ते०-मत्तपलतिगा, नेल्लगुम्मुडु। मल०-मोतलकंद। ता०-फलमोदिक। ले०-Ipomoea digitata Linn. (आइपोमिया डिजिटॅटा लिन.)। Fam. Convolvulaceae (कॉन्वॉल्व्युलेसी)। यह भारतवर्ष के उष्ण कटिबंध में विशेषकर आर्द्र प्रदेशों जैसे बंगाल, आसाम आदि में पाया जाता है। यह लता जाति की वनस्पति झाड़दार और विस्तार में फैलने वाली होती है। पत्ते-३-७ इञ्च के घेरे में हाथ के पंजे के समान ५-७ भागों में विभक्त रहते हैं। फूल-नलिकाकार, चौथाई इञ्च गोल ऊपर का भाग १॥ इञ्च से २॥ इञ्च के घेरे में होता है और यह बैंगनी रंग का दिखाई पड़ता है। फल-चार छिलके वाले गोलाकार छोटे-छोटे होते हैं और वे झूमकों में आते हैं। उनके भीतर एक प्रकार की पर्तदार रूई से ढँके हुये त्रिकोणाकार अर्द्धगोल बीज रहते हैं। बीजों के रोपण करने से लता उत्पन्न होती है। इसके नीचे जो बन्द बैठता है वह रतालू के आकार का होता है इसका वजन एक सेर से अधिक नहीं होता। कन्द बाहर से भूरे रंग का तथा खुरदरा होता है। काटने पर अन्दर से यह श्वेत रंग का दिखाई देता है तथा उसमें से बहुत क्षीर निकलता है। इसकी सुखाई हुई कचरी बहुत हलकी रहती है तथा उसमें मंडल दिखलाई देते हैं। इसका स्वाद पिष्टमय, कुछ कसैला एवं कडुवा सा होता है। रासायनिक संगठन-इसके कन्द में पिष्टमय पदार्थ अधिक होता है। इसके अतिरिक्त १०% शर्करा एवं अत्यन्त अल्प प्रमाण में जालप में पायी जाने वाली आनुलोमिक राल होती है। गुण और प्रयोग-यह अनुलोमक, पित्तसारक, स्तन्यजनक, स्नेहक तथा उत्तम पौष्टिक है। इससे भूख लगती है, अन्न पचता है, शौच साफ होता है, शरीर का वर्ण सुधरता है एवं वजन बढ़ता है। काडलीव्हर तैल से अधिक अच्छा इससे कार्य होता है। किसी भी कारण से शिथिलता आयी हो और वजन कम हुआ हो तो इसके चूर्ण को घृत में भूनकर दूध एवं शर्करा के साथ पेया बनाकर देने से बहुत जल्दी वजन बढ़ता है। यकृत् एवं प्लीहावृद्धि में इसका चूर्ण देने से पित्तस्राव ठीक होकर शौच साफ होता है। दुग्धवृद्धि के लिये द्राक्षासव के साथ इसे देते हैं। मात्रा-कन्द चूर्ण १/४-१/२ तोला। अथ मुशलीकन्दः। तस्य लक्षणगुणानाह तालमूली तु विद्वद्भिर्मुशली परिकीर्त्तिता। मुशली मधुरा वृष्या वीर्योष्णा बृंहणी गुरुः। तिक्ता रसायनी हन्ति गुदजान्यानिलं तथा ॥१८३॥ काली मूसली के नाम तथा गुण-विद्वान् लोग 'तालमूली' ही को 'मुशली' कहते हैं, अर्थात् तालमूली, मुशली ये दोनों नाम 'काली मूसली' के हैं। काली मूसली-मधुर तथा तिक्त रस युक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), उष्णवीर्य, बृंहण (रक्तादिधातुवर्धक), गुरुपाकी, रसायन एवम् अर्श (बवासीर) तथा वात का नाशक होता है।।१८३] मुसली दो प्रकार की होती है। काली एवं सफेद। काली मुसली का लेटिन नाम कर्बुलिगो ओर्किओइडिस् (Curculigo orchioides) एवं सफेद मुसली का एस्पेरगस् एडस्केण्डेन्स् ((Asparagus adscendens) है। जो दो विभिन्न वर्गों की है। कुछ लोग क्लोरोफाइटम् एरूण्डिनेसिअम् (Chlorophytum arundinaceum) को सफेद मुसली मानते हैं। यहाँ पर इनका अलग-अलग वर्णन किया गया है। ९३. काली मूसली हिं०-स्याह मूसली, काली मूशली। म०, गु०-काली मूसली। बं०-तालमूली। क०-नेलताल। ते०- नेल तडि गड्डुा। ता०-निलधनैका। पं०-स्याह मूसली। मा०-काली मूसली। फा०-मुशली स्याह। अ०-
५५८ भावप्रकाशनिघण्टुः मुसली अबियज। ले०-Curculigo orchioides Gaertn. (कर्क्युलिगो ऑर्किओइडिस् गार्टे)। Fam. Amaryllidaceae (अॅमेरिलिडेसी)। यह बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, दक्षिण देश के बाँस के वनों में तथा हिमालय में यमुना से खासिया पहाड़ तक प्रायः सर्वत्र उत्पन्न होती है। काली मूसली-तृणजातीय वनौषधि, वर्षा ऋतु में घास अथवा दूसरे वृक्षों की छाया में देखने में आती है। ४- ५ पत्ते वाले खजूर के वृक्ष की तरह इसका नवीन क्षुप होता है। मूलस्तम्भ सीधा और मोटा होता है। पुरानी चक्राकार पत्र सन्धियों के कारण यह ताल वृक्ष के स्कन्ध जैसा दिखलाई देता है। इसकी ग्रन्थियों से सूत्राकार परन्तु मांसल उपमूल निकलते रहते हैं और शीर्ष से लगभग ३ या ४ पत्ते भूमि के ऊपर निकलते रहते हैं। इसके पत्ते-बिना डंठल के खजूर के पत्तों से कुछ पतले, सकरे और प्रासवत् होते हैं। इसकी लम्बाई ६ से १८ इञ्च तक और चौड़ाई १-१।। इञ्च तक होती है। पुष्पदण्ड-छोटा, बीच से निकला हुआ, ऊपर की ओर क्रमशः मोटा (Clavate) और कुछ चिपटा होता है। इसके फूल-नलिकाकार पीले रंग के दो कतारों में होते हैं। फल-¹/२ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार होते हैं। बीज- काले और चमकीले होते हैं। इसके मूलस्तम्भ का चिकित्सा में व्यवहार होता है। यह बाहर से काले भूरे रंग का तथा अन्दर से श्वेत होता है। दो वर्ष पुराने क्षुप का कन्द प्रयोग में लाना चाहिये। इसका स्वाद कुछ कडुवा तथा लबाबदार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें तैलीय द्रव्य १ ¹/४%, राल तथा कषाय द्रव्य ४%, गोंद २०%, पिष्टमय पदार्थ ४३%, सीठी १४% एवं जल ४ ¹/४% रहता है। सूखे कन्द से ८ ¹/२% राख मिलती है जिसमें कॅल्शियम ऑक्सॅलेट (Calcium oxalate) रहता है। गुण और प्रयोग-काली मुसली स्नेहन, मूत्रजनन, बल्य तथा कुछ वृष्य है। मूत्रमार्ग पर इसकी विशेष क्रिया होती है। अर्श, कामला, श्वास, अतिसार तथा शूल में इसका उपयोग किया जाता है। त्रावणकोर की तरफ दूध के साथ इसकी पेया बनाकर सोजाक, मूत्रकृच्छ्र तथा अस्यार्तव में बहुत प्रयोग करते हैं। रोगयुक्तावस्था में इसका सेवन किया जाता है। अनेक वृष्य पाकों में इसका उपयोग किया गया है। जंगली लोग चोट तथा अस्थिभङ्ग पर इसका बाह्य प्रयोग करते हैं। मात्रा-कन्द ¹/४-¹/२ तो०। ९४. सफेद मूसली (१) सं०-श्वेत मुशली, मुसली। हिं०-सफेद मुशली, खैरूव। म०-सफेद मुसली, पाटली मुसली। गु०-धोली मुसली। ता०-तन्निराविट्टर्ग। ते०-सल्लोगड्डा। मल०-शेडिबेली। अ, फा०-शाकाकुले हिन्दी। ले०-Asparagus adscendens Roxb. (एस्पेरेगस् एड्स्केन्डेन्स् राक्स.)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। यह पश्चिम हिमालय, पञ्जाब, गुजरात, रतलाम, बम्बई, रुहेलखण्ड, अवध तथा मध्य भारत में पाया जाता है। उत्तम सफेद मुसली रतलाम से आती है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा काँटेदार होता है। शाखाएँ-झुकी हुई, आरोहणशील, धूसरवर्ण की नालीदार और कोणयुक्त होती हैं। प्रधान कांड-लम्बा, ऊँचा, मोटा, गोल और चिकना होता है। काँटे-आधे से पौन इञ्च लम्बे, सीधे और मोटे होते हैं। पत्राभास काण्ड-आधे से दो इञ्च लम्बे, केशाकार, गोल ६-२० की संख्या में एक साथ गुच्छबद्ध रहते हैं।