भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४० भावप्रकाशनिघण्टुः ६९. अतिबला (कंघी) हिं०-कंघी, ककही, ककहिया, कंगही । बं०-पेटारी । म०-मुद्रा, मुद्रिका, करंडी, पेटारी । पं०-पीली बूटी, अतिखिरते । गु०-खपाट, कांसकी, डावली । मा०-डावी । क०-श्रीमद्रिगिडा । ते०-तुतुरुबेंड । सिन्ध०-सिम्बुल । सन्ता०-मिरूबहा । ता०-तुत्ति । फा०-दरख्ते शाहनाह । अ०-मश्तुलगूल । अं०-ndian Mallow (इण्डियन् मॅलो) । ले०-Abutilon indicum (Linn.) Sw. (एब्युटिलोन् इण्डिकम् (लिन.) स्व.) । Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । यह वनौषधि प्रायः गरम प्रान्तों में अधिक पाई जाती है । इसका क्षुप-झाड़दार, दो से ढाई हाथ ऊँचा और पुराना होने पर ४-५ हाथ तक ऊँचा देखा जाता है । इस पर मृदु श्वेताभ मखमली रोमावरण होता है । पत्ते-एकांतर, ³/₄- १ इञ्च लम्बे, गिलोय के पत्तों के आकार वाले, दन्तुर, मृदुरोमश तथा लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । फूल-पीले नारङ्गी रङ्ग के प्रायः सन्ध्याकाल में खिलते हैं । फल-चक्राकार गोल कंघी की तरह होते हैं । इनसे प्रायः बालक छापा किया करते हैं । बीज-बरियारे के बीजों से कुछ बड़े होते हैं । इन्हें भी बीजबंद कहा जाता है । इसकी एक दूसरी जाति होती है जिसे हिं०-बड़ी कंघी, ले०-Abutilon hirtum G. Don. (एब्युटिलोन् हिट्म् जी. डॉन्.) कहते हैं । इसमें मृदुरोमावरण के अतिरिक्त चिपचिपे रोम तथा शाखाओं और पुष्पडंडों पर लम्बे मुलायम रोयें भी होते हैं । इसका भी अतिबला के नाम से प्रयोग किया जा सकता है । रासायनिक संगठन- इसके पत्तों में लुआब बहुत होता है जो उष्ण जल में आ जाता है । पत्तों की राख १६% होती है जिसमें क्षारीय सल्फेट, क्लोराइड, मॅग्नेशियम् फास्फेट तथा कॅल्शियम कार्बोनेट आदि लवण होते हैं । गुण और प्रयोग-इसकी जड़ वातहर, रसायन, मूत्रजनन; बीज स्नेहन, मृदुरेचन, वाजीकर, कासहर; छाल मूत्रजनन एवं पत्र स्नेहन, वेदनाहर हैं । (१) सोजाक, मूत्रकृच्छ्र एवं बस्तिविकार आदि में इसके पत्तों का क्वाथ या बीजों का प्रयोग बहुत लाभदायक होता है । मूत्रकृच्छ्र तथा रक्तमूत्र में मूल का क्वाथ लाभदायक है । प्रमेह में पेशाब साफ होने के लिये दूध एवं शर्करा के साथ इसकी छाल देते हैं । (२) मसूढ़े ढीले हों तथा दाँत में दर्द हो तो इसके पत्ते के क्वाथ से कुल्ला कराते हैं । वेदनायुक्त स्थान पर इससे सेंकते हैं । व्रण तथा फोड़े आदि पर इसके पुष्प तथा पत्तों का लेप किया जाता है । (३) ज्वर में दाहशान्ति के लिये इसके पत्ते तथा मूल का क्वाथ दिया जाता है । (४) रक्तप्रदरं में इसकी जड़ का चूर्ण शर्करा एवं मधु के साथ दिया जाता है । (५) इसके बीज नपुंसकता, अर्श, सोजाक तथा बस्तिविकारों में दिये जाते हैं । (६) पित्तातिसार में पत्रस्वरस में घृत मिलाकर खिलाते हैं । (७) गुदा पर इसके बीजों के धूप से सूत्र-कृमि नष्ट होते हैं । मात्रा-मूल ६ माशा-१ तोला; बीज ४-८ माशा । ७०. नागबला-१ सं०-भूमिबला, नागबला, विश्वदेवा । हिं०-फरीदबूटी ? म०-भुईबल, मुईचिकणा । गु०-भोंयबल । बं०- जोंका । ता०-पलुपुन्दु । ते०-गायपूआकु । ले०-Sida vero-nicaefolia Lam. (सिडा ह्वेरोनिसीफोलिआ लॅम्.) Syn-Sida humilis Cav. (सिडा ह्युमिलिस् कॅह.) । Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA