भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५४१ यह प्रायः सब प्रान्तों में पाई जाती है। इसका क्षुप (प्रसर)—बहुवर्षायु, रोमश, लम्बी शाखाओं से युक्त तथा जमीन पर अथवा झाड़ियों पर फैला हुआ होता है। भूमि पर सर्प की तरह टेढ़े-मेढ़े यह फैला होने के कारण इसे नागबला कहते हैं। पत्ते—१/२-१ इञ्च लम्बे, प्रायः लट्वाकार, हृद्वत्, दन्तुर, रोमश तथा लम्बाग्र होते हैं। पुष्प—पीले रंग के छोटे अनेक पुष्प आते हैं। गुण और प्रयोग—गर्भिणी अतिसार में इसके पत्तों का फाण्ट देते हैं। मूत्र-कृच्छ्र में पुष्प तथा कोमल-फल चीनी के साथ देते हैं। क्षत तथा ठोकर लगने पर पत्तों को पीसकर बाँधते हैं। नागबला की जड़—यह बहुत उत्तम रसायन, पुष्टिदायक, आयुवर्धक मानी गयी है। राजयक्ष्मा तथा क्षतक्षय आदि में यह बहुत लाभदायक मानी जाती है। रसायन के लिये इसकी जड़ की छाल १/२-१ तोले दूध में पीसकर अथवा घृत एवं मधु के साथ इसका चूर्ण-सेवन का विधान है। पथ्या में घृत दुग्धयुक्त रक्तशालि अथवा साठी चावल का भात खाये (च० चि० अ० १)। इसी प्रकार प्रतिदिन १/२ तोले से बढ़ाकर ४ तोले तक की मात्रा में इसका चूर्ण दूध के साथ खाये तथा आहार में दूध ही पीये। क्षतक्षयी के लिये इस प्रकार एक महीने प्रयोग से पुष्टि, आयु, बल तथा आरोग्य की वृद्धि होती है (च० चि० अ० ११)। राजयक्ष्मा में दूध के साथ नागबला का चूर्ण सेवन करने से लाभ होता है (सु० उ० अ० ४१)। शोढल ने घृत एवं मधु के साथ क्षय के लिये इसका प्रयोग लिखा है। हृद्रोग, कास तथा श्वास में भी दूध के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है (चक्र)। उपर्युक्त गुण जिसमें मिलें वही शास्त्रीय नागबला हो सकती है। मात्रा—मूल १/२ से १ तो०। ७१. नागबला—२ (गुलसकरी ?) सं०—कण्टकिनीबला। हिं०—गुलशकरी, जङ्गली मेथी। बं०—गोरक्षचाकुले, बोन मेथी। म०—नागबला। मा०—गङ्गेरण। पं०—गङ्गेरण, गङ्गेरन। गु०—कांटालोबल। फा०—शनबलिदेवरी। अ०—शमलोदेदस्ती। ले०— Sida spinosa Linn. (सिडा स्पाइनोसा लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। यह इस देश के अधिक उष्ण भागों में पश्चिमोत्तर प्रदेश से दक्षिण तक पाई जाती है। इसका क्षुप—अनेक शाखाओं से युक्त, स्वावलम्बी तथा श्वेताभ वर्ण का होता है। शाखाएँ—पतली, खुरदरी एवं किञ्चित् सूक्ष्म रोवेंदार होती हैं। पत्ते—१-१ १/२ इञ्च लम्बे, अंडाकार, कुछ नुकीले, दन्तुर और मोटे होते हैं। पत्तों के नीचे सन्धि पर प्रायः तीक्ष्ण काँटे होते हैं। फूल—आध इञ्च के घेरे में गोलाकार, ५ पंखड़ियों से युक्त सफेद रङ्ग के आते हैं। फल—पाँच पंखड़ीवाले होते हैं तथा सूखने पर ५ भाग हो जाते हैं। बीज—५-९ बीज होते हैं। कुछ विद्वानों ने इसके दो भेद माने हैं जिसमें श्वेतपुष्प के क्षुप को सि० अॅल्बा (S. alba) तथा पीतपुष्प वाले को सि० ऑल्निफोलिआ (S. alnifolia) लिखा है। इसकी जड़ तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके पत्र स्नेहन तथा मूत्रजनन हैं। इसकी जड़ बल्य तथा ज्वरघ्न है। विषम ज्वर में मूलत्वक तथा सोंठ का क्वाथ पिलाते हैं। मूत्रकृच्छ्र, सोजाक तथा मूत्रेन्द्रिय के अन्य विकारों में इसके पत्तों का उपयोग किया जाता है। मात्रा—६ माशा-१ तोला। ७२. नागबला ३ (गुलसकरी, गांगेरुकी) सं०—गुडशर्करा। हिं०—गुलसकरी, कुकुरांड, कुकुरबिचा। संता०—सेतकट, सेताण्डीर। बिहा०—सेतारेपडी, सेतापेटू, सेताजरका। म०—गोवाली। ले०—Grewia hirsuta, Vanb. (ग्रेविआ हिर्सुटा, व्हेन्ब)। Fam. Tiliaceae (टिलिएसी)। यह उत्तर पश्चिम भारत, नेपाल तथा कोंकण में पाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA