भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१२ भावप्रकाशनिघण्टुः सहिजन के भेद, नाम तथा गुण-सहिजन के (१) श्याम सहिजन, (२) श्वेत सहिजन तथा (३) लाल सहिजन इस प्रकार से ३ भेद होते हैं। शोभाञ्जन, शिग्रु, तीक्ष्णगन्धक, अक्षीव और मोचक ये सब संस्कृत नाम सहजन के हैं। सहजन के बीज को 'श्वेतमरिच' कहते हैं। जो 'लाल सहजन' होता है उसे 'मधुशिग्रु' कहते हैं। शिग्रु अर्थात् श्याम सहजन-स्वाद तथा पाक में कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, मधुर, लघु अग्निदीपक, रोचक, रूक्ष, क्षार, तिक्तरसयुक्त, विदाहकारक, मलावरोधक, शुक्रजनक, हृदय को हितकर, पित्त रक्त को कुपित करने वाला, नेत्रों को हितकर, कफवात- नाशक एवं विद्रधि, शोथ, कृमि, मेदरोग, अपची, विष, प्लीहा, गुल्म, गलगण्ड और व्रण का नाशक होता है। इसी प्रकार से 'सफेद सहजन' के भी गुण हैं किन्तु वह विशेष करके दाहकारक तथा प्लीहा, विद्रधि, व्रण और पित्त-रक्त का नाशक होता है। मधुशिग्रु अर्थात् 'लाल सहजन' के भी पूर्वोक्त सभी गुण हैं किन्तु विशेष करके वह अग्निदीपक तथा सारक (दस्तावर) होता है। [१०५-१०८] अथ शिग्रुवल्कलपत्रस्वरसगुणानाह शिग्रुवल्कलपत्राणां स्वरसः परमार्त्तिहृत् ॥१०९॥ सहजन की छाल तथा पत्तों के स्वरस के गुण-सहजन की छाल तथा पत्तों का स्वरस असह्य पीड़ा को दूर करता है। [१०९] अथ शिग्रुबीजगुणानाह चक्षुष्यं शिग्रुजं बीजं तीक्ष्णोष्णं विषनाशनम् । अवृष्यं कफवातघ्नं तन्नस्येन शिरोऽर्त्तिनुत् ॥११०॥ सहजन के बीज-नेत्रों को हितकर, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, विषनाशक, अवृष्य और कफ वातनाशक होते हैं। सहजन के बीजों का चूर्ण करके नस्य लेने (सूंघने) से शिर की पीड़ा दूर होती है। इसके पुष्प तथा पुष्प-मधु के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुए हैं। [११०] ४९. सहिजना हिं०-सहिजना, सहिजन, सहजन, सहजना, सैजन, मुनगा। बं०-सजिना। म०-शेवगा, शेगटा। मा०- सहिजनो, सहिंजणो। क०-नुग्गे। ते०-मुनग। गु०-सेकटो, सरगवो। ता०-मोरुङ्गै, मुरिणकै। पं०-सोंहजना। मला०-मुरिण्णा। ब्राह्मी०-डोडलों बिन। यू०-सिनोह। फा०-सर्वकोही। अं०-Horse Radish Tree (हौर्स रेडिश ट्री); (ड्रम स्टिक् ट्री)। ले०-Moringa Pteridosperma Gratin (मोरिङ्गा टेरीगोस्पर्मा ग्रर्ट.)। Fam. Moringaceae (मोरिंगेसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में चेनाब से लेकर अवध तक जंगली रूप में तथा भारत के प्रायः सभी प्रांतों में एवं वर्मा में लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-साधारण वृक्षों के समान छोटा, २०-२५ फुट ऊँचा होता है। छाल-चिकनी, मोटी, कार्कयुक्त, भूरे रङ्ग की एवं लम्बाई में फटी हुई और लकड़ी कमजोर होती है। पत्ते-संयुक्त, प्रायः त्रिपक्षवत् तथा १-३ फीट क्वचिद् ५ फीट तक लम्बे होते हैं। पत्रक-अंडाकार, लट्वाकार, विपरीत एवं करीब १/२-३/४ इञ्च लम्बे होते हैं। कार्त्तिक महीने से वसन्त ऋतु के आरम्भ तक फूलों के गुच्छे टहनियों के अन्त में दिखाई पड़ते हैं। पुष्प-श्वेतवर्ण के तथा मधु की तरह गन्धवाले होते हैं। फलियाँ-गोल, त्रिकोणाकार, अंगुलिप्रमाण मोटी, ९-२० इञ्च लम्बी, बीजों के बीच-बीच में पतली एवं बड़ी-बड़ी खड़ी ९ रेखाओं से युक्त होती हैं। उनमें सफेद, सपक्ष, त्रिकोणाकार तथा लगभग १ इञ्च लम्बे बीज होते हैं। बीजों को सफेद मरिच भी कहते हैं। इससे गोंद भी निकलता है जो पहले दुधिया रहता है किन्तु बाद में वायु का सम्पर्क होने पर ऊपर से गुलाबी या लाल हो जाता है। इसकी कच्ची सेमों का साग और अचार बनाते हैं। इसकी छाल के रेशों से कागज, चटाई, डोरी आदि बनाते हैं। जानवर-विशेषकर ऊँट-इसकी टहनियों को खाते हैं।