भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५०३ सुगंधयुक्त फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल-करीब १/२ इञ्च खिरनी के समान लम्बाई लिये गोल होते हैं जिसमें एक- एक बीज होते हैं। बीजों को निम्बोली कहते हैं। इसकी छाल से एक स्वच्छ, चमकीला अम्बर के वर्ण का गोंद निकलता है। इसकी छाल करीब १० मि० मि० मोटी, बाहर से भूरे-धूसर वर्ण की, खुरदरी शल्कसम एवं फटी हुई तथा अन्दर से पीताभ, परतदार एवं मोटे रेशों से युक्त होती है। इसकी छाल, मूलत्वक्, पत्र, गोंद, फल, बीज, पुष्प, ताड़ी एवं तैल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके काण्डत्वक् में एक कडुवा पदार्थ मार्गोसीन (Margosine), निम्बिडिन (Nimbidin, 0,5%), निम्बिन (Nimbin, C₂₈ H₄₀ O₈, 0.03%), निम्बिनिन् (Nimbinin C₂₇ H₃₀ O₉), निम्बोस्टेरोल् एवं पुष्पों में पाये जाने वाले उड़नशील तैल की तरह एक उड़नशील तैल ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें करीब ६% टैनिन भी रहता है। इसके बाह्यत्वक् में टैनिन अधिक रहता है तथा अन्तस्त्वक में कडुवे पदार्थ पाये जाते हैं। इसके अन्तस्त्वक् का क्वाथ बनाना चाहिये। इसके पत्तों में भी कडुवा पदार्थ रहता है जो छाल की अपेक्षा कम मात्रा में होते हुए भी जल में अधिक मात्रा में एवं जल्दी घुलता है। इसके बीजों में ३१% तक एक तेल रहता है जो गहरे पीले रंग का, कडुवा, तीता एवं दुर्गन्धयुक्त होता है। इसमें करीब २% कडुवे पदार्थ रहते हैं जिनमें निम्बिन, निम्बिनिन, निम्बिडिन एवं तैल में घुलनशील एक द्रव निम्बिडोल (Nimbidol, 0,6%) ये पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इस तैल में ओलिक एसिड (Oleic acid, 49-61.9%), लिनोलिक् एसिड (Linoleic acid, 2.12-15%), पामिटिक् एसिड् (Palmitic acid, 12.62-15%), स्टियरिक् एसिड् (Stearic acid, 14.4-21.3%), ॲरॅचिडिक् एसिड् (Arachidic acid, 1.3-1.8%) एवं लिग्नोसेरिक एसिड् (Lignoceric acid, 0.74%) ये रहते हैं। इस तैल के साबुन बनाने लायक भाग से बचे हुए हिस्से में निम्बोस्टेरॉल रहता है। इस तैल में 0.427% गंधक पाया जाता है। इसके तैल से अत्यन्त कडुवा एवं जल में घुलने वाला सोडियम् मार्गोसेट (Sodium margosate, B. C. P. W.) नामक एक लवण बनाया गया है। गुण और प्रयोग-इसके अन्दर की छाल शीतल, कडुवी, पौष्टिक, नियतकालिक-ज्वरप्रतिबन्धक, ग्राही त्वग्दोषहर, कृमिघ्न एवं रसायन है। सम्पूर्ण छाल अधिक ग्राही होती है। त्वचा पर निम्बत्वक् की क्रिया सोमल की तरह होती है। इसका ज्वरघ्न गुण सिंकोना की तरह है। इसकी मूलत्वक् कृमिघ्न (आन्त्रिक) मानी जाती है। इसके पत्ते शोधन, त्वचा के लिये उत्तेजक, त्वग्दोषहर, व्रणशोधक, व्रणरोपक, कृमिघ्न, प्रतिदूषक, यकृतोत्तेजक, कुष्ठहर एवं अधिक मात्रा में वामक होते हैं। इसका तेल उष्ण, वातहर, प्रतिदूषक, व्रणशोधक, व्रणरोपक, उत्तेजक, केश्य, कृमिघ्न, कुष्ठघ्न एवं रसायन है। निम्ब के सभी अङ्गों की अपेक्षा इसका तैल अधिक प्रभावशाली है। (१) नीम की छाल का चूर्ण मलेरिया के लिये बहुत लाभदायक है। शोथयुक्त ज्वर एवं विषमज्वर तथा ज्वर के पश्चात् दौर्बल्य दूर करने के लिये इसके चूर्ण या क्वाथ का उपयोग किया जाता है। क्विनीन आदि से जब लाभ नहीं होता तब इसका उपयोग करते हैं। ज्वर में इसके साथ धनियाँ, सोंठ, लौंग, दालचीनी या मिरिच, चिरायता तथा ग्राहीपन कम करने के लिये कुटकी का उपयोग किया जाता है। श्वेतप्रदर में बबूल की छाल एवं नीम की छाल का क्वाथ लाभदायक होता है। (२) इसके पत्तों का उपयोग त्वचा के विकार, व्रण, क्षत तथा कुष्ठ में किया जाता है। चर्मविकारों में इससे स्नान कराया जाता है। व्रण, पामा, कण्डू, छाजन, अरुंषिका, दूषितव्रण, पुराने व्रण एवं अन्य चर्मविकारों में इससे स्नान कराते हैं, इसके पत्तों को पीस कर बाँधते है या इससे सिद्ध घृत का मलहम आदि लगाते हैं। अर्श, बद, गाँठ एवं व्रणशोथ