भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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गुडूच्यादिवर्गः ४९५ काला अडूसा (नील निर्गुण्डी), जस्टिसिआ जेण्डारुसा (Justicia gendarùssa) इनका वर्णन किया है। केरल देश में अडूसा का अन्य छोटा भेद अधाटोडा बेड्डोमी सी० बी० क्ला० (Adhatoda beddomei C. B. Clarke) का अधिक व्यवहार किया जाता है क्योंकि वह अधिक गुणकारी होता है ऐसा कोट्टयम से प्रकाशित ‘आयुर्वेदिक फ्लोरा मेडिका’ में लिखा हुआ है। उसके पुष्प बिलकुल श्वेत होते हैं। ३४. अडूसा हिं०-अडूसा, अडूस, अरुस, बाकस, बिसोंटा, रूसा, अरुशा। बं.-बासक, बाकस। म०-अडुलसा। मा०- अडुसो। गु०-अरडुसो (सी)। क०-आडुसोगे। ते०- आडा सारं, अडुसरमु। मल०-वलिय आटलोटकम्। ता०-अटतोटै। पं०-भेकर। फा०-वाँसा, ख्वाजा। अ०-हशीशतुस्सुआल। अं०-Malabar nut (मलाबारनट)। ले०-Adhatoda vasica, Nees. (अधाटोडा वासिका नीज)। Fam. Acanthaceae (एकैन्थ्येसी)। यह भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में एवं हिमालय के निचले भागों में ४००० फीट की ऊँचाई तक उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-सदाहरित, झाड़ीदार, दुर्गन्धयुक्त, ३-८ फीट ऊँचा एवं प्रायः समूहबद्ध होकर लगता है। काण्ड की गाँठें फूली हुई रहती हैं। पत्ते-५-८ इञ्च लम्बे, १॥-२॥ इञ्च चौड़े, भालाकार, या अंडाकार, दोनों सिरों पर नोकीले, अखण्ड, अत्यन्त सूक्ष्म मृदुरोमश, विशेषकर नये पत्ते एवं १/२-१ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत, विनाल, द्वयोष्ठी एवं १.३ इञ्च लम्बे होते हैं तथा १-३ इञ्च लम्बी मञ्जरियों में पाये जाते हैं जो उपशाखाओं के अग्र पर प्रायः समूहबद्ध रहती हैं। पुष्पों पर २ टेढ़ी बैंगनी धारियाँ होती हैं। इसमें बड़े-बड़े कोणपुष्पक और वृन्तपत्र भी रहते हैं। फली-पौन इञ्च लम्बी, तिहाई इञ्च चौड़ी, मुद्रराकार, लम्बाई में धारीदार मृदुरोमश एवं ४ छोटे बीजों से युक्त होती. है। इसके पत्तों से एक प्रकार का पीला रंग निकलता है। इसके पत्र, पुष्प एवं मूलत्वक् का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। मूलत्वक् पुराने क्षुप की लेनी चाहिये। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक कडुवा खेदार क्षाराभ वॅसिसिन (Vasicine, C₁₁ H₁₂ N₂ O) करीब .२५%, अधाटोडिक एसिड, उड़नशील तैल, वसा, राल, शर्करा, गोंद एवं पीत रंजक द्रव्य में पाये जाते हैं। मूलत्वक् में भी क्षाराभ की करीब इतनी ही मात्रा होती है। यह क्षाराभ मद्यसार में घुलनशील, शीत जल में अल्प एवं उष्ण जल में अधिक घुलनशील होता है। यह क्षाराभ हरमल (Peganum harmala) में पाये जाने वाले पेगॅनीन (Peganine) के सदृश होता है। गुण और प्रयोग-अडूसा उत्तेजक, कफनिःसारक, शीतवीर्य, उद्वेष्टननिरोधी, स्वर्य, कृमिघ्न, कुष्ठहर, रक्तपित्तघ्न, श्वासहर, कासहर एवं क्षयघ्न है। इसके पुष्प तिक्त, कटु, ज्वरघ्न, मूत्रजनन, उद्वेष्टननिरोधी एवं शीतल हैं। इसकी मूलत्वक् ज्वरघ्न, मूत्रजनन, कफनिःसारक, नियतकालिक ज्वरहर, कृमिघ्न एवं कोथप्रशमन है। उद्वेष्टननिरोधी गुण मूल एवं पत्र की अपेक्षा पुष्पों में एवं कफनिःसारक गुण पत्तों की अपेक्षा मूल में अधिक रहता है। पत्र स्वेदजनन है। इसका प्रधान गुण कफ को पतला करना एवं आसानी से बाहर निकालना है। अधिक मात्रा में इससे वमन एवं विरेचन होता है। इसमें के क्षाराभ वासिसिन को जानवरों में शिरान्तर्गत सूचिकाभरण से देखा गया कि रक्तसंवहन एवं महास्रोत पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। इससे श्वासनलिकाओं में अल्प किन्तु स्थायी विस्फार होता है.जो ॲट्रोपीन साथ में देने से अधिक हो जाता है। इसमें का कफनिःसारक गुण सम्भवतः मुख्यतया इसमें के उड़नशील तैल के कारण है। इसके पत्ते निम्न श्रेणी के जलाश्रयी जीव, बुरा, पराश्रयी जीवाणु, मच्छर, मक्खी एवं गोजर आदि के लिये विषैले माने जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA