भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९६ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) कफविकारों में इसका बहुत प्रयोग करते हैं। नवीन श्वसनीशोथ में इससे आराम मिलता है विशेषकर जब कफ गाढ़ा तथा चिपचिपा होता है। जीर्ण श्वसनीशोथ में इससे खाँसी में आराम मिलता है तथा कफ ढीला होकर आसानी से बाहर निकल जाता है। कफयुक्त प्रलेपक ज्वर में इसका बहुत उपयोग करते हैं। इनमें इसके पुटपाक करके निकाले स्वरस को १/२-१ १/२ तो० की मात्रा में आर्द्रक स्वरस या छोटी पीपल, कुछ सैंधव एवं मधु के साथ देते हैं। श्वास, कास एवं रक्तपित्त में अडूसा, द्राक्षा एवं हर्रा इनका क्वाथ मधु एवं शर्करा के साथ उपयोगी है। नये श्वसनीशोथ में कण्टकारी, जवासा, नागरमोथा, सोंठ एवं अडूसा इनका क्वाथ उपयोगी है। बच्चों के कफविकारों में इसके स्वरस के साथ टंकण देते हैं। वासावलेह का भी अच्छा उपयोग होता है। (२) राजयक्ष्मा में हाथ-पैर आदि में जलन, ज्वर एवं ऊर्ध्वग रक्तपित्त होने पर वासाघृत (च० चि० अ० ८) का उपयोग किया जाता है। इसमें पत्रस्वरस, वंशलोचन, तालीसपत्र, कोहड़े का रस एवं मधु भी दिया जाता है। नवीन प्रयोगों से देखा गया है कि राजयक्ष्मा में इसका कोई प्रभाव नहीं है। केवल इससे वातनाडियों पर शामक प्रभाव के कारण एवं कफ के पतला होने से खाँसी में आराम मिलता है। (३) तमकश्वास में इसके पत्तों का धूम्रपान लाभदायक है। इसके साथ धतूरे के पत्र का उपयोग करने से जल्दी गुण होता है। इसका आंतरिक प्रयोग भी किया जाता है। इससे सिद्ध घृत का प्रयोग करते हैं। यह तमकश्वास के आवेग को बन्द करने में समर्थ नहीं है। (४) रक्तपित्त में इसका स्वरस मधु के साथ देते हैं। इसके फूलों के गुलकंद तथा पत्र चूर्ण का भी उपयोग किया जाता है। वासाघृत (च० चि० अ० ४) मधु के साथ सेवन करने से रक्तपित्त जल्दी रुकता है। (५) मलेरिया में इसके पत्तों के चूर्ण या मूलत्वक्चूर्ण का उपयोग करते हैं। (६) आध्मान, अतिसार एवं प्रवाहिका में इसका स्वरस दिया जाता है। इससे आंत्रस्थ जीवाणुओं का नाश होता है एवं अन्न का सड़न रुकता है। (७) आमवातिक संधिशोथ, शोथ एवं नाड़ीशूल आदि में पत्तों का पोल्टिस लगाया जाता है। (८) त्वचा के रोगों में इसका रस पिलाते हैं तथा इसके पत्तों का लेप एवं क्वाथ से स्नान आदि कराते हैं। (९) जंतुघ्न होने के कारण इसके पत्तों को जल में रखने पर जल खराब नहीं होता। इसके पत्तों में फल बाँध कर रखने से फल सड़ता नहीं। इसका मद्यसारीय अर्क मक्खी, पिस्सू एवं मच्छर आदि के लिये घातक होता है। खेत में इसके पत्तों का खाद देने से इनमें रोग नहीं होते। ऊनी कपड़ों में इसके पत्ते रखने से कीड़े नहीं लगते। मात्रा-पत्रचूर्ण १-२ माशा, स्वरस १/२-१ १/२ तोला, मूलत्वक् ४ र०-१ माशा, पुष्प ५-१० र० क्वाथ १- २ तो०। ३५. रक्तपुष्प अडूसा ले०-Justicia picta Linn. (जस्टिसिआ पिक्टा लिन.)। Fam. Acan-thaceae (एकैन्थ्येसी)। यह बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसके क्षुप बड़े होते हैं। इसके पत्ते दीर्घवृत्ताकार, ३-८ इञ्च बड़े, गहरे रंग के एवं इन पर सफेद छींटे रहते हैं। इसके काण्ड की गाँठें फूली हुई और रक्ताभ होती है। इसमें गहरे लाल वर्ण के पुष्प आते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण अडूसा के समान ही होते हैं किन्तु इसमें स्नेहन एवं शोथघ्न ये गुण अधिक हैं। बच्चों के गले में जब कफ से घुरघुराहट होती है तब इसके पत्तों का पुटपाक करके निकाला स्वरस एवं टंकणक्षार देते