भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ४९७ हैं। इसको मधु एवं छोटी पीपल के साथ भी दिया जाता है। दुग्ध के कारण स्तन में शोथ होने पर या अन्य स्थान में शोथ होने पर इसके पत्तों को नारियल के रस में पीसकर बाँधने से सूजन कम होती है। मात्रा—बच्चों में १०-२० बूँद स्वरस मधु एवं छोटी पीपल के साथ। ३६. काला अडूसा सं०-नीलनिर्गुण्डी ? हिं०-काला अडूसा, नील निर्गुण्डी। बं०-जगतमदन, मामलक। म०-काला अडूलसा, कालोशंबालू। बंब०-वाकस। ता०, मल०-करुनोचचि। ते०-नल्लनोचिलि। ले०-Justicia gendarussa Burm. (जस्टिसिआ जेण्डारुसा बर्म)। Fam. Acanthaceae (एकैन्थेसी)। इसके क्षुप बागों में रास्ते के किनारों पर लगाये जाते हैं। इसके क्षुप-२-४ फी ऊँचे होते हैं। काण्ड-कभी-कभी धारीदार होते हैं। पत्ते-३-५ इञ्च लम्बे, पासवत् या रेखाकार प्रासवत्, चिकने एवं १/४ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बरसात में श्वेतवर्ण के पुष्प अवृन्त काण्डज क्रम में निकले रहते हैं। पुष्पों के अन्दर जामुनी रंग के चिह्न रहते हैं। बीजकोष १/२ इञ्च, सूक्ष्म, लोमयुक्त तथा ४ बीजों से युक्त होता है। इसके पत्तों में मनोहर गन्ध आती है। इसके पत्तों का स्वरस चिकित्सा में उपयोग में लाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, ज्वरघ्न, कफनिःसारक, वामक एवं रेचन है। यह वनस्पति अत्यन्त तीव्र होती है इसलिये बाल एवं वृद्ध में इसका उपयोग नहीं करना चाहिये। इससे वमन एवं विरेचन होने लगता है। इसके प्रयोग के समय चावल की माँड़ घृत डालकर देनी चाहिये। (१) फुफ्फुस के विकारों में इसका प्रयोग करते हैं। तीव्र कफविकारों में इसके २-४ पत्ते एवं अपामार्ग की राख १/८ तो०, एक तोला मधु के साथ देते हैं। न्युमोनिया (Pneumonia) में चार पत्तों का रस, सहेजन की छाल का रस एवं सामुद्र नमक मधु के साथ देते हैं। (२) ज्वर एवं आमवात में इससे पसीना निकलता है। आमवात में इसके पत्तों के क्वाथ से सेकने से आराम मिलता है। (३) इसका रस सरसों के तेल के साथ पिलाने से वमन होता है। (४) इसके रस को तैल में मिलाकर गाँठों पर लगाया जाता है। अथ पर्पटः (पित्तपापड़ा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पर्पटो वरतिक्तश्च स्मृतः पर्पटकश्च सः। कथितः पांशुपर्यायस्तथा कवचनामकः ।।९१।। पर्पटो हन्ति पित्तास्रभ्रमतृष्णाकफज्वरान् । संग्राही शीतलस्तिक्तो दाहनुद्वातलो लघुः ।।९२।। पित्तपापड़ा के नाम तथा गुण-पर्पट, वरतिक्त, पर्पटक, पांशुपर्याय ('पांशु' वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) एवं कवचनामक ('कवच'वाची सभी शब्द इसके पर्यायवाचक हैं) ये सब संस्कृत नाम 'पित्तपापड़ा' के हैं। पित्तपापड़ा-संग्राही, शीतवीर्य, तिक्तरसयुक्त, दाह को दूर करने वाला, वातकारक और लघु होता है एवं यह पित्त, रक्तदोष, भ्रमरोग, तृषा, कफ और ज्वर इन सबों को नष्ट करता है। [९१-९२] नोट-पित्तपापड़ा के नाम से विभिन्न प्रान्तों में भिन्न-भिन्न वर्गों की वनस्पतियों का एवं उनके उपभेदों का उपयोग किया जाता है इस कारण इसके लेटिन नामों में पर्याप्त विभिन्नता पाई जाती है। जिन द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है उनमें उपर्युक्त शास्त्रीय गुणों में से कुछ-न-कुछ पाये जाते हैं। अन्य निघण्टुओं में भी उपर्युक्त प्रकार के ही गुण लिखे हैं। चरक मे तृष्णानिग्रहण गण में इसका पाठ है एवं रक्तपित्त, ज्वर, कुष्ठ, संग्रहणी, पांडु एवं अतिसार आदि में इसका उपयोग किया गया है। ३५ भाव.I