भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमद्भावमिश्रप्रणीतः भावप्रकाशः 'विद्योतिनी' हिन्दीव्याख्योपेतः [ पूर्वखण्डम् ] अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् गजमुखममरप्रवरं सिद्धिकरं विघ्नहर्त्तारम्। गुरुमवगमनयनप्रदमिष्टकरीमिष्टदेवतां वन्दे ।।१।। श्रीमद्गुरोर्गुरुपदं बहुशोऽभिवन्द्यायुर्वेदमाप्तुमनसोऽद्य शिशोर्हृदीमाम्। 'भावप्रकाश'गतभावविभावनार्थं विद्योतिनीं ननु तनोत्यतनुं मुदाऽयम् ।। देवताओं में सर्वश्रेष्ठ, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, इन आठ सिद्धियों के देनेवाले और विघ्नों को दूर करनेवाले तथा हाथी के समान जिनका मुख है, ऐसे श्री गणेशजी और ज्ञानरूपी नेत्रों को देनेवाले श्रीगुरुदेव तथा अभीष्ट सिद्ध करनेवाले श्री इष्टदेव को मैं प्रणाम करता हूँ ।।१।। कवेरुक्तिः- आयुर्वेदागमनं क्रमेण येनाभवद्भूमौ। प्रथमं लिखामि तमहं नानातन्त्राणि संदृश्य ।।२।। जिस क्रमसे पृथ्वी पर आयुर्वेद अर्थात् वैद्यकशास्त्र का अवतरण हुआ, सबसे पहिले उसी (क्रम) को मैं अनेक महर्षिप्रणीत तन्त्रों (ग्रन्थों) को देखकर लिख रहा हूँ ।।२।। अथायुर्वेदस्य लक्षणमाह- आयुर्हिताहितं व्याधेर्निदानं शमनं तथा। विद्यते यत्र विद्वद्भिः स आयुर्वेद उच्यते ।।३।। आयुर्वेद का लक्षण—जिस शास्त्र में आयुष्य के लिये हितकारक और अहितकारक पदार्थों का उल्लेख हो और रोगों के निदान अर्थात् उत्पन्न होने का प्रधान कारण और उनकी शान्ति का उपाय अर्थात् चिकित्सा का वर्णन किया गया हो उसे विद्वान् लोग आयुर्वेद कहते हैं ।।३।। अथायुर्वेदस्य निरुक्तिमाह- अनेन पुरुषो यस्मादायुर्विन्दति वेत्ति च। तस्मान्मुनिवरैरेष आयुर्वेद इति स्मृतः ।।४।। आयुर्वेद की निरुक्ति—इस शास्त्र के द्वारा प्राणिमात्र को दीर्घायुष्यत्व की प्राप्ति तथा आयुर्विज्ञान विषयक सभी ४ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA