भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथ्यों का ज्ञान होने के कारण दूसरों की आयु का परिज्ञान होता है, इसी से मुनिश्रेष्ठों ने इसे ‘आयुर्वेद’ संज्ञा दी है। शरीरजीवयोर्योगो जीवनं तेनावच्छिन्नः काल आयुः, आयुर्वेदद्वारा आयुष्याणयनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि ज्ञात्वा तेषां सेवनत्यागाभ्यामारोग्येणायुविंदति, तेनैव हेतुना परस्याप्यायुर्वेत्ति च ।।४।। शरीर और जीव का जो संयोग है, उसे 'जीवन' कहते हैं और जितने समय तक वह संयोग बना रहता है, उतने समय का नाम आयु है। आयुर्वेद के द्वारा आयु के लिये हितकर तथा अहितकर द्रव्य, गुण और कर्मों को जानकर तथा उनके सेवन और त्याग द्वारा अर्थात् आयु के लिये हितकर द्रव्य-गुण-कर्मों का सेवन और अहितकर द्रव्य-गुण-कर्मों का परित्याग करने के द्वारा, आरोग्य लाभ करने से मनुष्य दीर्घायु लाभ कर सकता है, तथा उक्त कारणों से दूसरे की आयु को भी जानने में समर्थ हो सकता है ॥४॥ क्रममाह, तत्रादौ ब्राह्मणः प्रादुर्भावः- विधाताऽथर्वसर्वस्वमायुर्वेदं प्रकाशयन् । स्वनाम्ना संहिता चक्रे लक्षश्लोकमयीमृजुम् ।।५।। आयुर्वेद का उत्पत्ति क्रम—सबसे पहले ब्रह्माजी ने अथर्ववेद का सर्वस्व अर्थात् सारभूत जो आयुर्वेद है, उसका प्रकाश करते हुए, अपने नामकी अर्थात् 'ब्रह्मसंहिता' इस नामकी एक १ लाख श्लोक वाली एक सरल संहिता बनाई ॥५॥ ततः प्रजापतिं दक्षं दक्षं सकलकर्मसु । विधिर्धीनीरधिः साङ्गप्रायुर्वेदमुपादिशत् ।।६।। इसके बाद बुद्धि के समुद्र ब्रह्माजी ने सभी कार्यों के करने में निपुण दक्ष नामक प्रजापति को अङ्ग तथा उपाङ्गों के सहित यह (सम्पूर्ण) आयुर्वेद पढ़ाया ॥६॥ अथ दक्षप्रादुर्भावः- अथ दक्षः क्रियादक्षः स्वर्वैद्यौ वेदमआयुषः । वेदयामास विद्वांसौ सूर्यांशौ सुरसत्तमौ ।।७।। दक्षप्रजापति से आयुर्वेद की उत्पत्ति—इसके (ब्रह्माजी से आयुर्वेद प्राप्त करने के) बाद सब क्रियाओं में निपुण दक्ष नामक प्रजापति ने स्वर्ग के वैद्य, देवगणों में श्रेष्ठ, सूर्य के पुत्र और विद्वान् दोनों अश्विनी-कुमारों को आयुर्वेद सिखाया ॥७॥ अथाश्विनीसुतप्रादुर्भावः- दक्षादधीत्य दस्रौ वितनुतः संहितां स्वीयाम् । सकलचिकित्सकलोकप्रतिपत्तिविवृद्धये धन्याम् ।।८।। अश्विनी-कुमारों से आयुर्वेद की उत्पत्ति—दोनों अश्विनी-कुमारों ने दक्ष नामक प्रजापति से आयुर्वेद पढ़कर सभी चिकित्सक लोगों के ज्ञान की वृद्धि के लिए अपनी प्रशंसनीय संहिता (अश्विनीकुमारसंहिता) बनाई ॥८॥ स्वयम्भुवः शिरश्छिन्नं भैरवेण रुषाऽथ तत् । अश्विभ्यां संहितं तस्मात्तौ जातौ यज्ञभागिनौ ।।९।। इसके बाद जब क्रुद्ध होकर भैरवजी ने ब्रह्माजी का शिर काट डाला था, तब अश्विनीकुमारों ने उसे फिर से जोड़ दिया था। इस प्रकार उसी दिन से वे दोनों यज्ञ में भाग पाने के अधिकारी हुए ।। देवासुरणे देवा दन्त्यैर्यै सक्षताः कृताः । अक्षतास्ते कृताः सद्यो दस्राभ्यामद्भुतं महत् ।।१०।। जब देवता तथा दैत्यों का युद्ध हुआ, तब उसमें जिन देवताओं को दैत्यों ने घायल कर दिया था, उन सबों को अश्विनी-कुमारों ने तत्क्षण (चिकित्सा करके) क्षत (घाव) से रहित (चङ्गा) कर दिया, उस समय उन दोनों का वह कार्य अत्यन्त अद्भुत प्रतीत हुआ ॥१०॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA