भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् ३ वज्रिणोऽभूद् भुजस्तम्भः स दस्राभ्यां चिकित्सितः । सोमान्निपतितश्चन्द्रस्ताभ्यामेव सुखीकृतः ।।११।। जब इन्द्र की भुजा का स्तम्भन हो गया था तथा चन्द्रमा जब सोम्लोक से गिर पढ़े थे, तब इन्हीं अश्विनी-कुमारों ने (चिकित्सा करके) उन्हें सुखी किया था ।।११।। विशीर्णा दशनाः पूष्णो नेत्रे नष्टे भगस्य च । शशिनो राजयक्ष्माऽभूद्द्द्विभ्यां ते चिकित्सिताः ।।१२।। जब पूषा नामक सूर्य के दाँत टूट गये और भग नामक सूर्य के नेत्र फूट गये थे तथा चन्द्रमा को राजयक्ष्मा हो गया था, तब इन लोगों की भी चिकित्सा अश्विनी-कुमारों ने ही की थी ।।१२।। भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः । वीर्यवर्णस्वरोपेतः कृतोऽश्विभ्यां पुनर्युवा ।।१३।। भृगु महर्षि के गोत्र में उत्पन्न कामी च्यवन ऋषि जब वृद्ध होने से कुरूप हो गये थे, तब अश्विनी-कुमारों ने (चिकित्सा द्वारा) वीर्य, वर्ण ओर स्वर से युक्त करके फिर से उन्हें युवा कर दिया था ।।१३।। एतैश्चान्यैश्च बहुभिः कर्मभिर्भिषजां वरौ । बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां दिवौकसाम् ।।१४।। इन्हीं सब कार्यों एवं और-और भी बहुत से कार्यों के द्वारा वैद्यों में श्रेष्ठ ये दोनों अश्विनीकुमार इन्द्रादिक देवताओं के अत्यन्त पूज्य हुए ।।१४।। अथेन्द्रप्रादुर्भावः- संदृश्य दस्रयोरिन्द्रः कर्माण्येतानि यत्नवान् । आयुर्वेदं निरुद्वेगं तौ ययाचे शचीपतिः ।।१५।। इन्द्र से आयुर्वेद की उत्पत्ति-शची (इन्द्र की स्त्री) पति इन्द्र ने अश्विनी-कुमारों के पूर्वोक्त कार्यों को देखकर अतिशय यत्नशील होते हुए उन दोनों से निरुद्वेग होकर आयुर्वेद प्राप्त करने की प्रार्थना की ।।१५।। नासत्यौ सत्यसन्धेन शक्रेण किल याचितौ । आयुर्वेदं यथाऽधीतं ददतुः शतमन्यवे ।।१६।। तब सत्यसन्ध (दृढ़प्रतिज्ञ) इन्द्र के प्रार्थना करने पर अश्विनी-कुमारों ने जितना पढ़ा था, उतना सम्पूर्ण आयुर्वेद इन्द्र को पढ़ा दिया ।।१६।। नासत्याभ्यामधीत्यैव आयुर्वेदं शतक्रतुः । अध्यापयामास बहूनात्रेयप्रमुखान्मुनीन् ।।१७।। अश्विनी-कुमारों से आयुर्वेद पढ़कर इन्द्र ने भी आत्रेयादिक बहुत से मुनियों को पढ़ाया ।।१७।। अथात्रेयप्रादुर्भावः- एकदा जगदालोक्य गदाकुलभितस्ततः । चिन्तयामास भगवानात्रेयो मुनिपुङ्गवः ।।१८।। आत्रेय से आयुर्वेद की उत्पत्ति-एक समय मुनियों में श्रेष्ठ भगवान् आत्रेयजी इधर उधर (चारों तरफ) संसार के प्राणी को रोग से व्याकुल देखकर विचार करने लगे ।।१८।। किं करोमि क्व गच्छामि कथं लोका निरामयाः । भवन्ति साम्यानेतान्न शक्नोमि निरीक्षितुम् ।।१९।। मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? और किस उपाय से संसार के प्राणी रोग रहित हों ? मैं इन सबको इस तरह रोग से युक्त अब अधिक देखने के लिये समर्थ नहीं हूँ ।।१९।। दयालुरहमत्यर्थं स्वभावो दुरतिक्रमः । एतेषां दुःखतो दुःखं ममापि हृदयेऽधिकम् ।।२०।। क्योंकि मैं अत्यन्त दयालु स्वभाव का हूँ और स्वभाव दुरतिक्रम होता है अर्थात् स्वभाव को कोई कभी बदल नहीं सकता । अस्तु, इन सबों को दुःख होने से मेरे भी हृदय में दुःख हो रहा है ।।२०।।