भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 57

आयुर्वेदं पठिष्यामि नैरुज्याय शरीरिणाम्। इति निश्चित्य गतवानात्रेयस्त्रिदशालयम् ।। २१।। अतः इन प्राणियों के आरोग्यार्थ अब मैं आयुर्वेद पढूंगा। ऐसा निश्चय करके आत्रेय मुनि स्वर्गलोक (इन्द्रपुरी अमरावती) को गये ॥२१॥ तत्र मन्दिरमिन्द्रस्य गत्वा शक्रं ददर्श सः। सिंहासनसमासीनं स्तूयमानं सुरर्षिभिः ।।२२।। भासयन्तं दिशो भासा भास्करप्रतिभं त्विषा। आयुर्वेदमहाऽऽचार्यं शिरोधार्यं दिवौकसाम् ।।२३।। वहाँ इन्द्र के भवन में जाकर देवर्षि लोगों से स्तुति किये जाते, सिंहासन पर बैठे, सूर्य के समान अपने प्रकाश से दर्शों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, आयुर्वेद के महान् आचार्य और देवताओं के शिरोमणि इन्द्र भगवान् को उन्होंने देखा ॥२२-२३॥ शक्रस्तु तं निरीक्ष्यैव त्यक्तसिंहासनः स्थितः। तमग्रे पूजयामास भृशं भूरितपःकृशम् ।।२४।। कुशलं परिपप्रच्छ तथाऽऽगमनकारणम् । स मुनिर्वक्तुमारेभे निजागमनकारणम् ।।२५।। इन्द्र भगवान् भी उन आत्रेयमुनि को देखते ही सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और तपस्या करने से जिनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था, ऐसे उन (आत्रेयमुनि) का पहले भली भाँति पूजन किया, तत्पश्चात् कुशल तथा आने का कारण पूछा। तदनन्तर आत्रेय मुनि भी अपने आने का जो कारण था, उसे कहने लगे ॥२४-२५॥ देवराज ! न राजाऽसि दिव एव यतो भवान्। विधात्रा विहितो यत्नात्त्रिलोकीलोकपालकः ।।२६।। व्याधिभिर्व्यथिता लोकाः शोकाकुलितचेतसः । भूतले सन्ति सन्तापं तेषां हन्तुं कृपां कुरु ।।२७।। आत्रेय ने कहा—हे देवेन्द्र ! आप केवल स्वर्गलोक के ही राजा नहीं हैं, किन्तु विधाता ने आपको तीनों लोकों के लोगों का भी पालन करने के लिये राजा बनाया है। अतएव इस समय पृथ्वीतल में रोगों से पीड़ित तथा शोक से व्याकुल चित्तवाले जो प्राणी हैं, उन सबों का सन्ताप दूर करने की कृपा करें ॥२६-२७॥ आयुर्वेदोपदेशं मे कुरु कारुण्यतो नृणाम्। तथेत्युक्त्वा सहस्राक्षोऽध्यापयाभास तं मुनिम् ।।२८।। मुनीन्द्र इन्द्रतः साङ्गमायुर्वेदमधीत्य सः । अभिनन्द्य तमाशीर्भिराजगाम पुनर्महीम् ।।२९।। आत्रेय ने कहा—हे देवेन्द्र ! प्राणियों के कल्याण के लिये दया करके आप मुझे आयुर्वेद का उपदेश कीजिये। यह सुन इन्द्र ने 'तथास्तु' कहकर आत्रेय को आयुर्वेद पढ़ाया। तदनुसार मुनिश्रेष्ठ आत्रेयजी इन्द्र से शल्य-शालाक्य- कायचिकित्सा-भूतविद्या-कौमारतन्त्र-अगदतन्त्र-रसायनतन्त्र और वाजीकरणतन्त्र इन ८ अङ्गों के सहित आयुर्वेद का अध्ययन कर और उन (इन्द्र) का आशीर्वाद द्वारा अभिनन्दन करके फिर पृथिवी पर लौट आये ॥२८-२९॥ अथात्रेयो मुनिश्रेष्ठो भगवान् करुणाऽऽकरः । स्वनाम्ना संहितां चक्र नरवर्गानुकम्पया ।।३०।। ततोऽग्निवेशं भेडञ्च जातूकर्णं पराशरम्। क्षीरपाणिञ्च हारीतमायुर्वेदमपाठयत् ।।३१।। इसके बाद करुणा-निधान मुनिश्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने मनुष्य वर्ग पर कृपा करके अपने नाम से आत्रेयसंहिता नामक ग्रन्थ बनाया। और अग्निवेश-भेड-जातूकर्ण-पराशर-क्षीरपाणि और हारीत इन ६ ऋषियों को आयुर्वेद पढ़ाया ॥३०-३१॥ तन्त्रस्य कर्त्ता प्रथममग्निवेशोऽभवत्पुरा। ततो भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च ।।३२।। श्रावयामासुरात्रेयं मुनिवृन्देन वन्दितम्। श्रुत्वा च तानि तन्त्राणि हृष्टोऽभूदत्रिनन्दनः ।।३३।। यथावत्सूत्रितं दृष्ट्वा प्रहृष्टा मुनयोऽभवन्। दिवि देवर्षयो देवाः श्रुत्वा साध्विति चाब्रुवन् ।।३४।। प्राचीन समय में उन ६ ऋषियों में से प्रथम तन्त्र (ग्रन्थ) के कर्त्ता अग्निवेश हुए। उनके बाद भेडादिक ऋषियों ने