भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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भी अपने-अपने नामसे एक-एक तन्त्र बनाया और उन बनाये हुये अपने-अपने तन्त्रों को मुनिवृन्द से वन्दित महर्षि आत्रेयजी को सुनाया। उन तन्त्रों को सुन कर अत्रि महर्षि के पुत्र (आत्रेय) अत्यन्त प्रसन्न हुये और जैसे चाहिए वैसे बने हुये अपने- अपने तन्त्रों को देखकर तन्त्रकर्ता अग्निवेशादि ऋषिवृन्द भी अत्यन्त हर्षित हुए और स्वर्ग में देवर्षि तथा देवता लोगों ने भी उन तन्त्रों को सुनकर साधु-साधु अर्थात् 'बहुत अच्छा हुआ-बहुत अच्छा हुआ' ऐसा कहा ॥३२-३४॥ अथ भरद्वाजप्रादुर्भावः- एकदा हिमवत्पार्श्वे दैवादागत्य सङ्गताः । मुनयो बहवस्तेषां नामभिः कथयाम्यहम् ।।३५।। भरद्वाजो मुनिवरः प्रथमं समुपागतः । ततोऽङ्गिरास्ततो गर्गो मरीचिर्भृगुभार्गवौ ।।३६।। पुलस्त्योऽगस्तिरसतो वसिष्ठः सपराशरः । हारीतो गौतमः सांख्यो मैत्रेयश्च्यवनोऽपि च ।।३७।। जमदग्निश्च गार्ग्यश्च कश्यपः काश्यपोऽपि च