भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे है। अतः उन रोगों को दूर करने के लिये आप सब योग्य विद्वानों को कोई उपाय सोचना चाहिये। इस प्रकार सभा में कह कर उन लोगों ने भरद्वाज मुनि से कहा—हे भगवन् ! आप इस कार्य को करने के योग्य हैं। अतः इन्द्र से आप ही आयुर्वेद पाने के लिये प्रार्थना करें। फिर इन्द्र से प्राप्त किया हुआ जो आयुर्वेद होगा, उसे हम लोग क्रम से पढ़कर रोगसम्बन्धी भय से मुक्त हो जावेंगे ॥ ४५-४६॥ इत्थं स मुनिभिर्योर्ग्यैः प्रार्थितो विनयान्वितैः । भरद्वाजोमुनिश्रेष्ठो जगाम त्रिदशालयम् ।।४७।। तत्रेन्द्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् । दृष्टवान् वृत्रहन्तारं दीप्यमानभिवानलम् ।।४८।। दृष्ट्वैव स मुनि प्राह भगवान् मघवा मुदा । धर्मज्ञ ! स्वागतं तेऽथ मुनिं तं समपूजयत् ।।४९।। इस प्रकार जब विनय से युक्त हो श्रेष्ठ मुनिवरों ने प्रार्थना की, तब मुनियों में श्रेष्ठ भरद्वाजजी स्वर्गलोक को गये। वहाँ इन्द्र के भवन में पहुँच कर उन्होंने प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशमान, देवर्षिगणों के मध्य में स्थित, वृत्रासुर को मारनेवाले इन्द्र को देखा। भरद्वाज मुनि को देखते ही भगवान् इन्द्र ने प्रसन्नता के साथ कहा—हे धर्म के जाननेवाले मुने ! आपका स्वागत है। इसके बाद उन भरद्वाज मुनि का विधिपूर्वक पूजन किया ॥४७-४९॥ सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् । वचनं सम्यक् श्रावयामास तत्त्वतः ।।५०।। व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयङ्कराः । तेषां प्रशमनोपायं यथावद्वक्तुमर्हसि ।।५१।। अपाठयन् मुनि साङ्गमायुर्वेदं शतक्रतुः । जीवेद्धर्षसहस्राणि देही नीरुङ्निशम्य यम् ।।५२।। तदनन्तर उन भरद्वाज मुनि ने भी समीप जाकर जयशब्द युक्त आशीर्वादों से इन्द्र का अभिनन्दन करके ऋषियों के कहे हुये वचनों को यथार्थ रूप से भली-भाँति कह सुनाया और कहा कि हे देवेन्द्र ! इस समय संसार में सब प्राणियों के लिये भयङ्कर अनेक रोग उत्पन्न हुये हैं। उनके दूर करने का उपाय जिस तरह से हो, उस तरह से कहिये अर्थात् मुझे आयुर्वेद पढ़ाइये। भरद्वाज के इस वचन के सुनने के बाद इन्द्र ने मुनि को अङ्गों के सहित उस आयुर्वेद को पढ़ाया, जिसे सुनकर प्राणी रोग से रहित होकर हजारों वर्षों तक जी सकें ॥५०-५२॥ सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामुनिः । यथावदचिरात्सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ।।५३।। तेनायुःसुचिरं लेभे भरद्वाजो निरामयम् । अन्यानपि मुनींश्चक्रे नीरजः सुचिरायुषः ।।५४।। महामुनि भरद्वाजजी ने तन्मनस्क होकर जिसके पार का अन्त नहीं है तथा जिसके हेतु-लिङ्ग और औषधरूपी तीन स्कन्ध हैं, ऐसे आयुर्वेद को जैसा का तैसा थोड़े ही दिनों में पूर्णरूपेण (इन्द्र से) समझ लिया और उसी से रोगरहित होकर दीर्घ आयु को प्राप्त किया तथा दूसरे मुनियों को भी रोग से रहित दीर्घ आयुवाला बना दिया ॥५३-५४॥ तत्तन्त्रजनितज्ञानचक्षुषा ऋषयोऽखिलाः । गुणान्द्रव्याणि कर्माणि दृष्ट्वा तद्विधिमाश्रितः ।।५५।। आरोग्यं लेभिरे दीर्घमायुश्च सुखसंयुतम् । आयुर्वेदोक्तविधिनाऽन्येऽपि स्युर्मुुनयो यथा ।।५६।। तदनन्तर भरद्वाज मुनि के बनाये हुये तन्त्र (ग्रन्थ) से उत्पन्न ज्ञानरूपी नेत्रों के द्वारा सम्पूर्ण ऋषियों ने भी गुण-द्रव्य और कर्मों को देखकर तथा उस तन्त्र में कही हुई विधियों का आश्रय लेकर आरोग्य तथा सुख से युक्त दीर्घ आयु प्राप्त किया और उसी तरह अन्यान्य मुनियों ने भी आयुर्वेद में कही हुई विधियों के द्वारा आरोग्यता तथा सुख से युक्त दीर्घ आयु पायी ॥५५-५६॥ अथ चरकप्रादुर्भावः- यदा मत्स्यावतारेण हरिणा वेद उद्धृतः । तदा शेषश्च तत्रैव वेदं साङ्गमवाप्तवान् ।।५७।। अथर्वान्तर्गतं सम्यगायुर्वेदं च लब्धवान् । एकदा स महीवृत्तं द्रष्टुंचर इवागतः ।।५८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA

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