भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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तत्र लोकानादैर्ग्यस्तान्व्यथया परिपीडितान् । स्थलेषु बहुषुव्यग्रान् म्रियमाणांश्च दृष्टवान् ।।५९।। तान्दृष्ट्वाऽतिदयायुक्तास्तेषां दुःखेन दुःखितः । अनन्तश्चिन्तयामास रोगोपशमकारणम् ।।६०।। सञ्चिन्त्य स स्वयं तत्र मुनेः पुत्रो बभूव ह । प्रसिद्धस्य विशुद्धस्य वेदवेदाङ्गवेदिनः ।।६१।। चरक से आयुर्वेद की उत्पत्ति-जिस समय मत्स्यावतार द्वारा भगवान् विष्णु ने वेदों का उद्धार किया था। उस समय शेष भगवान् ने उसी स्थान पर अङ्गों के सहित वेदों को प्राप्त किया और अथर्ववेद के अन्तर्गत जो आयुर्वेद था, उसे भी भली-भाँति से प्राप्त किया। एक समय वही शेषजी चर (जासूस) की भाँति छिपे तौर से भूलोक (संसार) का वृत्तान्त जानने के लिये पृथिवी पर आये और यहाँ उन्होंने बहुत से स्थानों पर लोगों को रोगों से ग्रस्त एवं व्यथा से अत्यन्त पीड़ित तथा व्यग्र एवं मरते हुये देखा। उन लोगों को देखकर वे अत्यन्त दया से युक्त हो उन सबों के दुःख से दुःखित होते हुये रोगों से निवृत्त होने का उपाय सोचने लगे। इस भाँति सोच-विचार कर स्वयं शेष भगवान् इसी भूलोक में वेद और वेद के व्याकरणादि छः अङ्गों के जाननेवाले 'विशुद्ध' नामक प्रसिद्ध मुनि के पुत्र हुए ।।५७-६१।। यतश्चर इवायातो न ज्ञातः केनचिद्यतः । तस्माच्चरकनाम्नाऽसौ ख्यातश्च क्षितिमण्डले ।।६२।। स भाति चरकाचार्यो देवाक्षार्यो यथा दिवि । सहस्त्रवदनस्यांशो येन ध्वंसो रुजां कृतः ।।६३।। आत्रेयस्य मुनेः शिष्या अग्निवेशादयोऽभवन् । मुनयो बहवस्तैश्च कृतं तन्त्रं स्वकं स्वकम् ।।६४।। तेषां तन्त्राणि संस्कृत्य समाहृत्य विपश्चिता । चरकेणात्मनो नाम्ना ग्रन्थोऽयं चरकः कृतः ।।६५।। यतः शेष भगवान् चर की भाँति छिप कर आये और किसी ने उनको नहीं पहचाना। अतः वे 'चरक' नाम से भूमण्डल में विख्यात हुए जिन्होंने रोगों का नाश कर दिया वे शेषजी के अंश चरकाचार्य स्वर्ग में देवताओं के आचार्य बृहस्पति के समान संसार में सुशोभित हुए। पूर्वोक्त आत्रेय महर्षि के शिष्य अग्निवेशादि मुनिवरों ने अपने-अपने जिन- जिन तन्त्रों की रचना की थी उन सभी का प्रतिसंस्कार तथा सङ्ग्रह करके आचार्य चरक ने अपने नाम से 'चरक' ग्रन्थ बनाया ।।६२-६५।। अथ धन्वन्तरिप्रादुर्भावः- एकदा देवराजस्य दृष्टिनिपतिता भुवि । तत्र तेन नरा दृष्टा व्याधिभिर्भृशपीडिताः ।।६६।। तान्दृष्ट्वा हृदयं तस्य दयया परिपीडितम् । दयाऽऽर्द्रहृदयः शक्रो धन्वन्तरिमुवाच ह ।।६७।। धन्वन्तरे! सुरश्रेष्ठ! भगवन् ! किञ्चिदुच्यते । योग्यो भवसि भूतानामुपकारपरो भव ।।६८।। उपकाराय लोकानांकेन किं न कृतं पुरा । त्रैलोक्याधिपतिर्विष्णुरभून्मत्स्यादिरूपवान् ।।६९।। तस्मात्त्वं पृथिवीं याहि काशीमध्ये नृपो भव । प्रतीकाराय रोगाणामायुर्वेदं प्रकाशय ।।७०।। इत्युक्त्वा सुरशार्दूलाः सर्वभूतहितेप्सया । समस्तमायुषो वेदं धन्वन्तरिमुपादिशत् ।।७१।। धन्वन्तरि से आयुर्वेद की उत्पत्ति-एक समय देवताओं के राजा इन्द्र की दृष्टि भूलोक पर पड़ी तो उन्होंने मनुष्यों को रोगों से अत्यन्त पीड़ित देखा। यह देख उनका हृदय दया से अत्यन्त पीड़ा युक्त हो गया और उन्होंने धन्वन्तरि से कहा-हे देवताओं में श्रेष्ठ, भगवान् धन्वन्तरि ! मैं आप से कुछ कहता हूँ। क्योंकि उसके योग्य आप ही हैं। आप प्राणियों के उपकार करने में तत्पर हों। पहले समय में लोगों के उपकार के लिये किसने क्या नहीं किया, यहाँ तक कि त्रिलोकी के स्वामी विष्णु भगवान् ने भी (परोपकार के लिये) मछली आदि का रूप धारण किया था। इसलिये आप पृथ्वीतल पर जावें और काशीपुरी में वहाँ के राजा होवें एवं रोगों को दूर करने के लिये आयुर्वेद का प्रकाश करें। ऐसा कह कर देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् इन्द्र ने सकल प्राणियों को कल्याण प्राप्त कराने की इच्छा से धन्वन्तरि को समस्त आयुर्वेद सिखा दिया ।।६६-७१।।