भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अधीत्य चायुषो वेदमिन्द्राद्धन्वन्तरिः पुरा। आगत्य पृथिवीं काश्यां जातो बाहुजवेश्मनि ।।७२।। नाम्ना तु सोऽभवत्ख्यातो दिवोदास इति क्षितौ। बाल एव विरक्तोऽभूच्चचार सुमहत्तपः ।।७३।। यत्नेन महता ब्रह्मा तं काश्यामकृन्नृपम्। ततो धन्वन्तरिलोकेः काशिराजोऽभिधीयते ।।७४।। हिताया देहिनां स्वीया संहिता विहिताऽमुना। अथ विद्यार्थिनो लोकान्संहितां तामपाठयत् ।।७५।। इस प्रकार इन्द्र भगवान् से आयुर्वेद का अध्ययन करके धन्वन्तरि पृथ्वीतल पर काशीपुरी में क्षत्रिय के घर में उत्पन्न हुये और 'दिवोदास' इस नाम से भूमण्डल में विख्यात हुये। वे लड़कपन से ही वैराग्य धारण कर बहुत बड़ा तप करने लगे। उसके बाद बड़े-बड़े यत्नों से (किसी भाँति) ब्रह्मा ने उन्हें काशीपुरी का राजा बनाया। उसी दिन से लोक धन्वन्तरि को काशी का राजा कहने लगे। इन्होंने प्राणियों के हित के लिये अपने नाम से धन्वन्तरि नामक संहिता बनाई और विद्यार्थी लोगों को वही संहिता पढ़ाई ॥७२-७५॥ अथ सुश्रुतप्रादुर्भावः- अथ ज्ञानदृशा विश्वामित्रप्रभृतयोऽविदन्। अयं धन्वन्तरिः काश्यां काशिराजोऽयमुच्यते ।।७६।। विश्वामित्रो मुनिस्तेषु पुत्रं सुश्रुतमुक्तवान्। वत्स ! वाराणसीं गच्छ त्वं विश्वेश्वरवल्लभाम् ।।७७।। तत्र नाम्ना दिवोदासः काशिराजोऽस्ति बाहुजः। स हि धन्वन्तरिः साक्षादायूर्वेदविदां वरः ।।७८।। आयुर्वेदं पठस्व त्वं लोकोपकृतिहेतवे। सर्वप्राणिदया तीर्थमुपकारो महामखः ।।७९।। पितुर्वचनमाकर्ण्य सुश्रुतः काशिकां गतः। तेन सार्द्धं समध्येतुं मुनिसूनुशतं ययौ ।।८०।। सुश्रुत से आयुर्वेद की उत्पत्ति-जब विश्वामित्र आदि ऋषियों ने अपनी-अपनी ज्ञानदृष्टि से देखा कि ये तो साक्षात् धन्वन्तरि हैं और ये काशीपुरा में 'काशिराज' नाम से कहे जाते हैं। तब विश्वामित्र ने सुश्रुत नामक पुत्र से कहा-हे वत्स ! तुम विश्वनाथजी की प्यारी वाराणसी (बनारस) जाओ। वहाँ पर 'दिवोदास' नाम से प्रसिद्ध जो क्षत्रिय काशी के राजा हैं, वे आयुर्वेद के जाननेवालों में श्रेष्ठ साक्षात् धन्वन्तरि हैं। अतः लोगों के उपकार के निमित्त तुम (उनसे) आयुर्वेद पढ़ो। क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों पर दया रखना ही तीर्थ है और उपकार करना ही बहुत भारी यज्ञ है। इस भाँति पिता का वचन सुन कर 'सुश्रुत' और उनके साथ पढ़ने के लिए और भी मुनियों के १०० पुत्र काशी गये ॥७६-८०॥ अथ धन्वन्तरिं सर्वे वानप्रस्थाश्रमे स्थितम्। भगवन्तं सुरश्रेष्ठं मुनिभिर्बहुभिः स्तुतम् ।।८१।। काशिराजं दिवोदासं तेऽपश्यन्विनयान्विताः। स्वागतं च तदा चाह दिवोदासो यशोधनः ।।८२।। कुशलं परिपप्रच्छ तथाऽऽगमनकारणम्। ततस्ते सुश्रुतद्वारा कथयामासुरुत्तरम् ।।८३।। भगवन्मानवाद्दृष्ट्वाव्याधिभिः परिपीडितान्। क्रन्दतो म्रियमाणांश्च जाताऽस्माकं हृदिव्यथा ।।८४।। आमयानां शमोपायं विज्ञातुं वयमागताः। आयुर्वेदं भवानस्मानध्यापयतु यत्नतः ।।८५।। (काशी में) विनय से युक्त होते हुए उन सबों ने जिनकी स्तुति बहुत से मुनि लोग कर रहे थे, ऐसे देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् धन्वन्तरि को वानप्रस्थाश्रम में स्थित काशिराज दिवोदास के रूप में वर्त्तमान देखा। यशोधन (यश को ही धन मानने वाले) राजा दिवोदास ने उन सबों का स्वागत किया और कुशल तथा आने का कारण भी पूछा। उसके बाद उन सब मुनि के पुत्रों ने सुश्रुत के द्वारा उत्तर के रूप में यह कहा कि—हे भगवन् ! रोगों से अत्यन्त पीड़ित अतएव क्रन्दन करते तथा मृत्यु को प्राप्त होते हुए मनुष्यों को देख कर हम लोगों के हृदय में व्यथा उत्पन्न हुई और उन लोगों के रोगों के शान्त होने का उपाय जानने के लिये हम सब यहाँ आये हैं। अतः आप यत्नपूर्वक हम लोगों को आयुर्वेद का अध्ययन करावें ॥८१-८५॥