भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तथ्यों का ज्ञान होने के कारण दूसरों की आयु का परिज्ञान होता है, इसी से मुनिश्रेष्ठों ने इसे ‘आयुर्वेद’ संज्ञा दी है। शरीरजीवयोर्योगो जीवनं तेनावच्छिन्नः काल आयुः, आयुर्वेदद्वारा आयुष्याणयनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि ज्ञात्वा तेषां सेवनत्यागाभ्यामारोग्येणायुविंदति, तेनैव हेतुना परस्याप्यायुर्वेत्ति च ।।४।। शरीर और जीव का जो संयोग है, उसे 'जीवन' कहते हैं और जितने समय तक वह संयोग बना रहता है, उतने समय का नाम आयु है। आयुर्वेद के द्वारा आयु के लिये हितकर तथा अहितकर द्रव्य, गुण और कर्मों को जानकर तथा उनके सेवन और त्याग द्वारा अर्थात् आयु के लिये हितकर द्रव्य-गुण-कर्मों का सेवन और अहितकर द्रव्य-गुण-कर्मों का परित्याग करने के द्वारा, आरोग्य लाभ करने से मनुष्य दीर्घायु लाभ कर सकता है, तथा उक्त कारणों से दूसरे की आयु को भी जानने में समर्थ हो सकता है ॥४॥ क्रममाह, तत्रादौ ब्राह्मणः प्रादुर्भावः- विधाताऽथर्वसर्वस्वमायुर्वेदं प्रकाशयन् । स्वनाम्ना संहिता चक्रे लक्षश्लोकमयीमृजुम् ।।५।। आयुर्वेद का उत्पत्ति क्रम—सबसे पहले ब्रह्माजी ने अथर्ववेद का सर्वस्व अर्थात् सारभूत जो आयुर्वेद है, उसका प्रकाश करते हुए, अपने नामकी अर्थात् 'ब्रह्मसंहिता' इस नामकी एक १ लाख श्लोक वाली एक सरल संहिता बनाई ॥५॥ ततः प्रजापतिं दक्षं दक्षं सकलकर्मसु । विधिर्धीनीरधिः साङ्गप्रायुर्वेदमुपादिशत् ।।६।। इसके बाद बुद्धि के समुद्र ब्रह्माजी ने सभी कार्यों के करने में निपुण दक्ष नामक प्रजापति को अङ्ग तथा उपाङ्गों के सहित यह (सम्पूर्ण) आयुर्वेद पढ़ाया ॥६॥ अथ दक्षप्रादुर्भावः- अथ दक्षः क्रियादक्षः स्वर्वैद्यौ वेदमआयुषः । वेदयामास विद्वांसौ सूर्यांशौ सुरसत्तमौ ।।७।। दक्षप्रजापति से आयुर्वेद की उत्पत्ति—इसके (ब्रह्माजी से आयुर्वेद प्राप्त करने के) बाद सब क्रियाओं में निपुण दक्ष नामक प्रजापति ने स्वर्ग के वैद्य, देवगणों में श्रेष्ठ, सूर्य के पुत्र और विद्वान् दोनों अश्विनी-कुमारों को आयुर्वेद सिखाया ॥७॥ अथाश्विनीसुतप्रादुर्भावः- दक्षादधीत्य दस्रौ वितनुतः संहितां स्वीयाम् । सकलचिकित्सकलोकप्रतिपत्तिविवृद्धये धन्याम् ।।८।। अश्विनी-कुमारों से आयुर्वेद की उत्पत्ति—दोनों अश्विनी-कुमारों ने दक्ष नामक प्रजापति से आयुर्वेद पढ़कर सभी चिकित्सक लोगों के ज्ञान की वृद्धि के लिए अपनी प्रशंसनीय संहिता (अश्विनीकुमारसंहिता) बनाई ॥८॥ स्वयम्भुवः शिरश्छिन्नं भैरवेण रुषाऽथ तत् । अश्विभ्यां संहितं तस्मात्तौ जातौ यज्ञभागिनौ ।।९।। इसके बाद जब क्रुद्ध होकर भैरवजी ने ब्रह्माजी का शिर काट डाला था, तब अश्विनीकुमारों ने उसे फिर से जोड़ दिया था। इस प्रकार उसी दिन से वे दोनों यज्ञ में भाग पाने के अधिकारी हुए ।। देवासुरणे देवा दन्त्यैर्यै सक्षताः कृताः । अक्षतास्ते कृताः सद्यो दस्राभ्यामद्भुतं महत् ।।१०।। जब देवता तथा दैत्यों का युद्ध हुआ, तब उसमें जिन देवताओं को दैत्यों ने घायल कर दिया था, उन सबों को अश्विनी-कुमारों ने तत्क्षण (चिकित्सा करके) क्षत (घाव) से रहित (चङ्गा) कर दिया, उस समय उन दोनों का वह कार्य अत्यन्त अद्भुत प्रतीत हुआ ॥१०॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् ३ वज्रिणोऽभूद् भुजस्तम्भः स दस्राभ्यां चिकित्सितः । सोमान्निपतितश्चन्द्रस्ताभ्यामेव सुखीकृतः ।।११।। जब इन्द्र की भुजा का स्तम्भन हो गया था तथा चन्द्रमा जब सोम्लोक से गिर पढ़े थे, तब इन्हीं अश्विनी-कुमारों ने (चिकित्सा करके) उन्हें सुखी किया था ।।११।। विशीर्णा दशनाः पूष्णो नेत्रे नष्टे भगस्य च । शशिनो राजयक्ष्माऽभूद्द्द्विभ्यां ते चिकित्सिताः ।।१२।। जब पूषा नामक सूर्य के दाँत टूट गये और भग नामक सूर्य के नेत्र फूट गये थे तथा चन्द्रमा को राजयक्ष्मा हो गया था, तब इन लोगों की भी चिकित्सा अश्विनी-कुमारों ने ही की थी ।।१२।। भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्धः सन् विकृतिं गतः । वीर्यवर्णस्वरोपेतः कृतोऽश्विभ्यां पुनर्युवा ।।१३।। भृगु महर्षि के गोत्र में उत्पन्न कामी च्यवन ऋषि जब वृद्ध होने से कुरूप हो गये थे, तब अश्विनी-कुमारों ने (चिकित्सा द्वारा) वीर्य, वर्ण ओर स्वर से युक्त करके फिर से उन्हें युवा कर दिया था ।।१३।। एतैश्चान्यैश्च बहुभिः कर्मभिर्भिषजां वरौ । बभूवतुर्भृशं पूज्याविन्द्रादीनां दिवौकसाम् ।।१४।। इन्हीं सब कार्यों एवं और-और भी बहुत से कार्यों के द्वारा वैद्यों में श्रेष्ठ ये दोनों अश्विनीकुमार इन्द्रादिक देवताओं के अत्यन्त पूज्य हुए ।।१४।। अथेन्द्रप्रादुर्भावः- संदृश्य दस्रयोरिन्द्रः कर्माण्येतानि यत्नवान् । आयुर्वेदं निरुद्वेगं तौ ययाचे शचीपतिः ।।१५।। इन्द्र से आयुर्वेद की उत्पत्ति-शची (इन्द्र की स्त्री) पति इन्द्र ने अश्विनी-कुमारों के पूर्वोक्त कार्यों को देखकर अतिशय यत्नशील होते हुए उन दोनों से निरुद्वेग होकर आयुर्वेद प्राप्त करने की प्रार्थना की ।।१५।। नासत्यौ सत्यसन्धेन शक्रेण किल याचितौ । आयुर्वेदं यथाऽधीतं ददतुः शतमन्यवे ।।१६।। तब सत्यसन्ध (दृढ़प्रतिज्ञ) इन्द्र के प्रार्थना करने पर अश्विनी-कुमारों ने जितना पढ़ा था, उतना सम्पूर्ण आयुर्वेद इन्द्र को पढ़ा दिया ।।१६।। नासत्याभ्यामधीत्यैव आयुर्वेदं शतक्रतुः । अध्यापयामास बहूनात्रेयप्रमुखान्मुनीन् ।।१७।। अश्विनी-कुमारों से आयुर्वेद पढ़कर इन्द्र ने भी आत्रेयादिक बहुत से मुनियों को पढ़ाया ।।१७।। अथात्रेयप्रादुर्भावः- एकदा जगदालोक्य गदाकुलभितस्ततः । चिन्तयामास भगवानात्रेयो मुनिपुङ्गवः ।।१८।। आत्रेय से आयुर्वेद की उत्पत्ति-एक समय मुनियों में श्रेष्ठ भगवान् आत्रेयजी इधर उधर (चारों तरफ) संसार के प्राणी को रोग से व्याकुल देखकर विचार करने लगे ।।१८।। किं करोमि क्व गच्छामि कथं लोका निरामयाः । भवन्ति साम्यानेतान्न शक्नोमि निरीक्षितुम् ।।१९।। मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? और किस उपाय से संसार के प्राणी रोग रहित हों ? मैं इन सबको इस तरह रोग से युक्त अब अधिक देखने के लिये समर्थ नहीं हूँ ।।१९।। दयालुरहमत्यर्थं स्वभावो दुरतिक्रमः । एतेषां दुःखतो दुःखं ममापि हृदयेऽधिकम् ।।२०।। क्योंकि मैं अत्यन्त दयालु स्वभाव का हूँ और स्वभाव दुरतिक्रम होता है अर्थात् स्वभाव को कोई कभी बदल नहीं सकता । अस्तु, इन सबों को दुःख होने से मेरे भी हृदय में दुःख हो रहा है ।।२०।।
आयुर्वेदं पठिष्यामि नैरुज्याय शरीरिणाम्। इति निश्चित्य गतवानात्रेयस्त्रिदशालयम् ।। २१।। अतः इन प्राणियों के आरोग्यार्थ अब मैं आयुर्वेद पढूंगा। ऐसा निश्चय करके आत्रेय मुनि स्वर्गलोक (इन्द्रपुरी अमरावती) को गये ॥२१॥ तत्र मन्दिरमिन्द्रस्य गत्वा शक्रं ददर्श सः। सिंहासनसमासीनं स्तूयमानं सुरर्षिभिः ।।२२।। भासयन्तं दिशो भासा भास्करप्रतिभं त्विषा। आयुर्वेदमहाऽऽचार्यं शिरोधार्यं दिवौकसाम् ।।२३।। वहाँ इन्द्र के भवन में जाकर देवर्षि लोगों से स्तुति किये जाते, सिंहासन पर बैठे, सूर्य के समान अपने प्रकाश से दर्शों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, आयुर्वेद के महान् आचार्य और देवताओं के शिरोमणि इन्द्र भगवान् को उन्होंने देखा ॥२२-२३॥ शक्रस्तु तं निरीक्ष्यैव त्यक्तसिंहासनः स्थितः। तमग्रे पूजयामास भृशं भूरितपःकृशम् ।।२४।। कुशलं परिपप्रच्छ तथाऽऽगमनकारणम् । स मुनिर्वक्तुमारेभे निजागमनकारणम् ।।२५।। इन्द्र भगवान् भी उन आत्रेयमुनि को देखते ही सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और तपस्या करने से जिनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था, ऐसे उन (आत्रेयमुनि) का पहले भली भाँति पूजन किया, तत्पश्चात् कुशल तथा आने का कारण पूछा। तदनन्तर आत्रेय मुनि भी अपने आने का जो कारण था, उसे कहने लगे ॥२४-२५॥ देवराज ! न राजाऽसि दिव एव यतो भवान्। विधात्रा विहितो यत्नात्त्रिलोकीलोकपालकः ।।२६।। व्याधिभिर्व्यथिता लोकाः शोकाकुलितचेतसः । भूतले सन्ति सन्तापं तेषां हन्तुं कृपां कुरु ।।२७।। आत्रेय ने कहा—हे देवेन्द्र ! आप केवल स्वर्गलोक के ही राजा नहीं हैं, किन्तु विधाता ने आपको तीनों लोकों के लोगों का भी पालन करने के लिये राजा बनाया है। अतएव इस समय पृथ्वीतल में रोगों से पीड़ित तथा शोक से व्याकुल चित्तवाले जो प्राणी हैं, उन सबों का सन्ताप दूर करने की कृपा करें ॥२६-२७॥ आयुर्वेदोपदेशं मे कुरु कारुण्यतो नृणाम्। तथेत्युक्त्वा सहस्राक्षोऽध्यापयाभास तं मुनिम् ।।२८।। मुनीन्द्र इन्द्रतः साङ्गमायुर्वेदमधीत्य सः । अभिनन्द्य तमाशीर्भिराजगाम पुनर्महीम् ।।२९।। आत्रेय ने कहा—हे देवेन्द्र ! प्राणियों के कल्याण के लिये दया करके आप मुझे आयुर्वेद का उपदेश कीजिये। यह सुन इन्द्र ने 'तथास्तु' कहकर आत्रेय को आयुर्वेद पढ़ाया। तदनुसार मुनिश्रेष्ठ आत्रेयजी इन्द्र से शल्य-शालाक्य- कायचिकित्सा-भूतविद्या-कौमारतन्त्र-अगदतन्त्र-रसायनतन्त्र और वाजीकरणतन्त्र इन ८ अङ्गों के सहित आयुर्वेद का अध्ययन कर और उन (इन्द्र) का आशीर्वाद द्वारा अभिनन्दन करके फिर पृथिवी पर लौट आये ॥२८-२९॥ अथात्रेयो मुनिश्रेष्ठो भगवान् करुणाऽऽकरः । स्वनाम्ना संहितां चक्र नरवर्गानुकम्पया ।।३०।। ततोऽग्निवेशं भेडञ्च जातूकर्णं पराशरम्। क्षीरपाणिञ्च हारीतमायुर्वेदमपाठयत् ।।३१।। इसके बाद करुणा-निधान मुनिश्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने मनुष्य वर्ग पर कृपा करके अपने नाम से आत्रेयसंहिता नामक ग्रन्थ बनाया। और अग्निवेश-भेड-जातूकर्ण-पराशर-क्षीरपाणि और हारीत इन ६ ऋषियों को आयुर्वेद पढ़ाया ॥३०-३१॥ तन्त्रस्य कर्त्ता प्रथममग्निवेशोऽभवत्पुरा। ततो भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च ।।३२।। श्रावयामासुरात्रेयं मुनिवृन्देन वन्दितम्। श्रुत्वा च तानि तन्त्राणि हृष्टोऽभूदत्रिनन्दनः ।।३३।। यथावत्सूत्रितं दृष्ट्वा प्रहृष्टा मुनयोऽभवन्। दिवि देवर्षयो देवाः श्रुत्वा साध्विति चाब्रुवन् ।।३४।। प्राचीन समय में उन ६ ऋषियों में से प्रथम तन्त्र (ग्रन्थ) के कर्त्ता अग्निवेश हुए। उनके बाद भेडादिक ऋषियों ने
भी अपने-अपने नामसे एक-एक तन्त्र बनाया और उन बनाये हुये अपने-अपने तन्त्रों को मुनिवृन्द से वन्दित महर्षि आत्रेयजी को सुनाया। उन तन्त्रों को सुन कर अत्रि महर्षि के पुत्र (आत्रेय) अत्यन्त प्रसन्न हुये और जैसे चाहिए वैसे बने हुये अपने- अपने तन्त्रों को देखकर तन्त्रकर्ता अग्निवेशादि ऋषिवृन्द भी अत्यन्त हर्षित हुए और स्वर्ग में देवर्षि तथा देवता लोगों ने भी उन तन्त्रों को सुनकर साधु-साधु अर्थात् 'बहुत अच्छा हुआ-बहुत अच्छा हुआ' ऐसा कहा ॥३२-३४॥ अथ भरद्वाजप्रादुर्भावः- एकदा हिमवत्पार्श्वे दैवादागत्य सङ्गताः । मुनयो बहवस्तेषां नामभिः कथयाम्यहम् ।।३५।। भरद्वाजो मुनिवरः प्रथमं समुपागतः । ततोऽङ्गिरास्ततो गर्गो मरीचिर्भृगुभार्गवौ ।।३६।। पुलस्त्योऽगस्तिरसतो वसिष्ठः सपराशरः । हारीतो गौतमः सांख्यो मैत्रेयश्च्यवनोऽपि च ।।३७।। जमदग्निश्च गार्ग्यश्च कश्यपः काश्यपोऽपि च
६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे है। अतः उन रोगों को दूर करने के लिये आप सब योग्य विद्वानों को कोई उपाय सोचना चाहिये। इस प्रकार सभा में कह कर उन लोगों ने भरद्वाज मुनि से कहा—हे भगवन् ! आप इस कार्य को करने के योग्य हैं। अतः इन्द्र से आप ही आयुर्वेद पाने के लिये प्रार्थना करें। फिर इन्द्र से प्राप्त किया हुआ जो आयुर्वेद होगा, उसे हम लोग क्रम से पढ़कर रोगसम्बन्धी भय से मुक्त हो जावेंगे ॥ ४५-४६॥ इत्थं स मुनिभिर्योर्ग्यैः प्रार्थितो विनयान्वितैः । भरद्वाजोमुनिश्रेष्ठो जगाम त्रिदशालयम् ।।४७।। तत्रेन्द्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् । दृष्टवान् वृत्रहन्तारं दीप्यमानभिवानलम् ।।४८।। दृष्ट्वैव स मुनि प्राह भगवान् मघवा मुदा । धर्मज्ञ ! स्वागतं तेऽथ मुनिं तं समपूजयत् ।।४९।। इस प्रकार जब विनय से युक्त हो श्रेष्ठ मुनिवरों ने प्रार्थना की, तब मुनियों में श्रेष्ठ भरद्वाजजी स्वर्गलोक को गये। वहाँ इन्द्र के भवन में पहुँच कर उन्होंने प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशमान, देवर्षिगणों के मध्य में स्थित, वृत्रासुर को मारनेवाले इन्द्र को देखा। भरद्वाज मुनि को देखते ही भगवान् इन्द्र ने प्रसन्नता के साथ कहा—हे धर्म के जाननेवाले मुने ! आपका स्वागत है। इसके बाद उन भरद्वाज मुनि का विधिपूर्वक पूजन किया ॥४७-४९॥ सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् । वचनं सम्यक् श्रावयामास तत्त्वतः ।।५०।। व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयङ्कराः । तेषां प्रशमनोपायं यथावद्वक्तुमर्हसि ।।५१।। अपाठयन् मुनि साङ्गमायुर्वेदं शतक्रतुः । जीवेद्धर्षसहस्राणि देही नीरुङ्निशम्य यम् ।।५२।। तदनन्तर उन भरद्वाज मुनि ने भी समीप जाकर जयशब्द युक्त आशीर्वादों से इन्द्र का अभिनन्दन करके ऋषियों के कहे हुये वचनों को यथार्थ रूप से भली-भाँति कह सुनाया और कहा कि हे देवेन्द्र ! इस समय संसार में सब प्राणियों के लिये भयङ्कर अनेक रोग उत्पन्न हुये हैं। उनके दूर करने का उपाय जिस तरह से हो, उस तरह से कहिये अर्थात् मुझे आयुर्वेद पढ़ाइये। भरद्वाज के इस वचन के सुनने के बाद इन्द्र ने मुनि को अङ्गों के सहित उस आयुर्वेद को पढ़ाया, जिसे सुनकर प्राणी रोग से रहित होकर हजारों वर्षों तक जी सकें ॥५०-५२॥ सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामुनिः । यथावदचिरात्सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ।।५३।। तेनायुःसुचिरं लेभे भरद्वाजो निरामयम् । अन्यानपि मुनींश्चक्रे नीरजः सुचिरायुषः ।।५४।। महामुनि भरद्वाजजी ने तन्मनस्क होकर जिसके पार का अन्त नहीं है तथा जिसके हेतु-लिङ्ग और औषधरूपी तीन स्कन्ध हैं, ऐसे आयुर्वेद को जैसा का तैसा थोड़े ही दिनों में पूर्णरूपेण (इन्द्र से) समझ लिया और उसी से रोगरहित होकर दीर्घ आयु को प्राप्त किया तथा दूसरे मुनियों को भी रोग से रहित दीर्घ आयुवाला बना दिया ॥५३-५४॥ तत्तन्त्रजनितज्ञानचक्षुषा ऋषयोऽखिलाः । गुणान्द्रव्याणि कर्माणि दृष्ट्वा तद्विधिमाश्रितः ।।५५।। आरोग्यं लेभिरे दीर्घमायुश्च सुखसंयुतम् । आयुर्वेदोक्तविधिनाऽन्येऽपि स्युर्मुुनयो यथा ।।५६।। तदनन्तर भरद्वाज मुनि के बनाये हुये तन्त्र (ग्रन्थ) से उत्पन्न ज्ञानरूपी नेत्रों के द्वारा सम्पूर्ण ऋषियों ने भी गुण-द्रव्य और कर्मों को देखकर तथा उस तन्त्र में कही हुई विधियों का आश्रय लेकर आरोग्य तथा सुख से युक्त दीर्घ आयु प्राप्त किया और उसी तरह अन्यान्य मुनियों ने भी आयुर्वेद में कही हुई विधियों के द्वारा आरोग्यता तथा सुख से युक्त दीर्घ आयु पायी ॥५५-५६॥ अथ चरकप्रादुर्भावः- यदा मत्स्यावतारेण हरिणा वेद उद्धृतः । तदा शेषश्च तत्रैव वेदं साङ्गमवाप्तवान् ।।५७।। अथर्वान्तर्गतं सम्यगायुर्वेदं च लब्धवान् । एकदा स महीवृत्तं द्रष्टुंचर इवागतः ।।५८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA
तत्र लोकानादैर्ग्यस्तान्व्यथया परिपीडितान् । स्थलेषु बहुषुव्यग्रान् म्रियमाणांश्च दृष्टवान् ।।५९।। तान्दृष्ट्वाऽतिदयायुक्तास्तेषां दुःखेन दुःखितः । अनन्तश्चिन्तयामास रोगोपशमकारणम् ।।६०।। सञ्चिन्त्य स स्वयं तत्र मुनेः पुत्रो बभूव ह । प्रसिद्धस्य विशुद्धस्य वेदवेदाङ्गवेदिनः ।।६१।। चरक से आयुर्वेद की उत्पत्ति-जिस समय मत्स्यावतार द्वारा भगवान् विष्णु ने वेदों का उद्धार किया था। उस समय शेष भगवान् ने उसी स्थान पर अङ्गों के सहित वेदों को प्राप्त किया और अथर्ववेद के अन्तर्गत जो आयुर्वेद था, उसे भी भली-भाँति से प्राप्त किया। एक समय वही शेषजी चर (जासूस) की भाँति छिपे तौर से भूलोक (संसार) का वृत्तान्त जानने के लिये पृथिवी पर आये और यहाँ उन्होंने बहुत से स्थानों पर लोगों को रोगों से ग्रस्त एवं व्यथा से अत्यन्त पीड़ित तथा व्यग्र एवं मरते हुये देखा। उन लोगों को देखकर वे अत्यन्त दया से युक्त हो उन सबों के दुःख से दुःखित होते हुये रोगों से निवृत्त होने का उपाय सोचने लगे। इस भाँति सोच-विचार कर स्वयं शेष भगवान् इसी भूलोक में वेद और वेद के व्याकरणादि छः अङ्गों के जाननेवाले 'विशुद्ध' नामक प्रसिद्ध मुनि के पुत्र हुए ।।५७-६१।। यतश्चर इवायातो न ज्ञातः केनचिद्यतः । तस्माच्चरकनाम्नाऽसौ ख्यातश्च क्षितिमण्डले ।।६२।। स भाति चरकाचार्यो देवाक्षार्यो यथा दिवि । सहस्त्रवदनस्यांशो येन ध्वंसो रुजां कृतः ।।६३।। आत्रेयस्य मुनेः शिष्या अग्निवेशादयोऽभवन् । मुनयो बहवस्तैश्च कृतं तन्त्रं स्वकं स्वकम् ।।६४।। तेषां तन्त्राणि संस्कृत्य समाहृत्य विपश्चिता । चरकेणात्मनो नाम्ना ग्रन्थोऽयं चरकः कृतः ।।६५।। यतः शेष भगवान् चर की भाँति छिप कर आये और किसी ने उनको नहीं पहचाना। अतः वे 'चरक' नाम से भूमण्डल में विख्यात हुए जिन्होंने रोगों का नाश कर दिया वे शेषजी के अंश चरकाचार्य स्वर्ग में देवताओं के आचार्य बृहस्पति के समान संसार में सुशोभित हुए। पूर्वोक्त आत्रेय महर्षि के शिष्य अग्निवेशादि मुनिवरों ने अपने-अपने जिन- जिन तन्त्रों की रचना की थी उन सभी का प्रतिसंस्कार तथा सङ्ग्रह करके आचार्य चरक ने अपने नाम से 'चरक' ग्रन्थ बनाया ।।६२-६५।। अथ धन्वन्तरिप्रादुर्भावः- एकदा देवराजस्य दृष्टिनिपतिता भुवि । तत्र तेन नरा दृष्टा व्याधिभिर्भृशपीडिताः ।।६६।। तान्दृष्ट्वा हृदयं तस्य दयया परिपीडितम् । दयाऽऽर्द्रहृदयः शक्रो धन्वन्तरिमुवाच ह ।।६७।। धन्वन्तरे! सुरश्रेष्ठ! भगवन् ! किञ्चिदुच्यते । योग्यो भवसि भूतानामुपकारपरो भव ।।६८।। उपकाराय लोकानांकेन किं न कृतं पुरा । त्रैलोक्याधिपतिर्विष्णुरभून्मत्स्यादिरूपवान् ।।६९।। तस्मात्त्वं पृथिवीं याहि काशीमध्ये नृपो भव । प्रतीकाराय रोगाणामायुर्वेदं प्रकाशय ।।७०।। इत्युक्त्वा सुरशार्दूलाः सर्वभूतहितेप्सया । समस्तमायुषो वेदं धन्वन्तरिमुपादिशत् ।।७१।। धन्वन्तरि से आयुर्वेद की उत्पत्ति-एक समय देवताओं के राजा इन्द्र की दृष्टि भूलोक पर पड़ी तो उन्होंने मनुष्यों को रोगों से अत्यन्त पीड़ित देखा। यह देख उनका हृदय दया से अत्यन्त पीड़ा युक्त हो गया और उन्होंने धन्वन्तरि से कहा-हे देवताओं में श्रेष्ठ, भगवान् धन्वन्तरि ! मैं आप से कुछ कहता हूँ। क्योंकि उसके योग्य आप ही हैं। आप प्राणियों के उपकार करने में तत्पर हों। पहले समय में लोगों के उपकार के लिये किसने क्या नहीं किया, यहाँ तक कि त्रिलोकी के स्वामी विष्णु भगवान् ने भी (परोपकार के लिये) मछली आदि का रूप धारण किया था। इसलिये आप पृथ्वीतल पर जावें और काशीपुरी में वहाँ के राजा होवें एवं रोगों को दूर करने के लिये आयुर्वेद का प्रकाश करें। ऐसा कह कर देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् इन्द्र ने सकल प्राणियों को कल्याण प्राप्त कराने की इच्छा से धन्वन्तरि को समस्त आयुर्वेद सिखा दिया ।।६६-७१।।
८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अधीत्य चायुषो वेदमिन्द्राद्धन्वन्तरिः पुरा। आगत्य पृथिवीं काश्यां जातो बाहुजवेश्मनि ।।७२।। नाम्ना तु सोऽभवत्ख्यातो दिवोदास इति क्षितौ। बाल एव विरक्तोऽभूच्चचार सुमहत्तपः ।।७३।। यत्नेन महता ब्रह्मा तं काश्यामकृन्नृपम्। ततो धन्वन्तरिलोकेः काशिराजोऽभिधीयते ।।७४।। हिताया देहिनां स्वीया संहिता विहिताऽमुना। अथ विद्यार्थिनो लोकान्संहितां तामपाठयत् ।।७५।। इस प्रकार इन्द्र भगवान् से आयुर्वेद का अध्ययन करके धन्वन्तरि पृथ्वीतल पर काशीपुरी में क्षत्रिय के घर में उत्पन्न हुये और 'दिवोदास' इस नाम से भूमण्डल में विख्यात हुये। वे लड़कपन से ही वैराग्य धारण कर बहुत बड़ा तप करने लगे। उसके बाद बड़े-बड़े यत्नों से (किसी भाँति) ब्रह्मा ने उन्हें काशीपुरी का राजा बनाया। उसी दिन से लोक धन्वन्तरि को काशी का राजा कहने लगे। इन्होंने प्राणियों के हित के लिये अपने नाम से धन्वन्तरि नामक संहिता बनाई और विद्यार्थी लोगों को वही संहिता पढ़ाई ॥७२-७५॥ अथ सुश्रुतप्रादुर्भावः- अथ ज्ञानदृशा विश्वामित्रप्रभृतयोऽविदन्। अयं धन्वन्तरिः काश्यां काशिराजोऽयमुच्यते ।।७६।। विश्वामित्रो मुनिस्तेषु पुत्रं सुश्रुतमुक्तवान्। वत्स ! वाराणसीं गच्छ त्वं विश्वेश्वरवल्लभाम् ।।७७।। तत्र नाम्ना दिवोदासः काशिराजोऽस्ति बाहुजः। स हि धन्वन्तरिः साक्षादायूर्वेदविदां वरः ।।७८।। आयुर्वेदं पठस्व त्वं लोकोपकृतिहेतवे। सर्वप्राणिदया तीर्थमुपकारो महामखः ।।७९।। पितुर्वचनमाकर्ण्य सुश्रुतः काशिकां गतः। तेन सार्द्धं समध्येतुं मुनिसूनुशतं ययौ ।।८०।। सुश्रुत से आयुर्वेद की उत्पत्ति-जब विश्वामित्र आदि ऋषियों ने अपनी-अपनी ज्ञानदृष्टि से देखा कि ये तो साक्षात् धन्वन्तरि हैं और ये काशीपुरा में 'काशिराज' नाम से कहे जाते हैं। तब विश्वामित्र ने सुश्रुत नामक पुत्र से कहा-हे वत्स ! तुम विश्वनाथजी की प्यारी वाराणसी (बनारस) जाओ। वहाँ पर 'दिवोदास' नाम से प्रसिद्ध जो क्षत्रिय काशी के राजा हैं, वे आयुर्वेद के जाननेवालों में श्रेष्ठ साक्षात् धन्वन्तरि हैं। अतः लोगों के उपकार के निमित्त तुम (उनसे) आयुर्वेद पढ़ो। क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों पर दया रखना ही तीर्थ है और उपकार करना ही बहुत भारी यज्ञ है। इस भाँति पिता का वचन सुन कर 'सुश्रुत' और उनके साथ पढ़ने के लिए और भी मुनियों के १०० पुत्र काशी गये ॥७६-८०॥ अथ धन्वन्तरिं सर्वे वानप्रस्थाश्रमे स्थितम्। भगवन्तं सुरश्रेष्ठं मुनिभिर्बहुभिः स्तुतम् ।।८१।। काशिराजं दिवोदासं तेऽपश्यन्विनयान्विताः। स्वागतं च तदा चाह दिवोदासो यशोधनः ।।८२।। कुशलं परिपप्रच्छ तथाऽऽगमनकारणम्। ततस्ते सुश्रुतद्वारा कथयामासुरुत्तरम् ।।८३।। भगवन्मानवाद्दृष्ट्वाव्याधिभिः परिपीडितान्। क्रन्दतो म्रियमाणांश्च जाताऽस्माकं हृदिव्यथा ।।८४।। आमयानां शमोपायं विज्ञातुं वयमागताः। आयुर्वेदं भवानस्मानध्यापयतु यत्नतः ।।८५।। (काशी में) विनय से युक्त होते हुए उन सबों ने जिनकी स्तुति बहुत से मुनि लोग कर रहे थे, ऐसे देवताओं में श्रेष्ठ भगवान् धन्वन्तरि को वानप्रस्थाश्रम में स्थित काशिराज दिवोदास के रूप में वर्त्तमान देखा। यशोधन (यश को ही धन मानने वाले) राजा दिवोदास ने उन सबों का स्वागत किया और कुशल तथा आने का कारण भी पूछा। उसके बाद उन सब मुनि के पुत्रों ने सुश्रुत के द्वारा उत्तर के रूप में यह कहा कि—हे भगवन् ! रोगों से अत्यन्त पीड़ित अतएव क्रन्दन करते तथा मृत्यु को प्राप्त होते हुए मनुष्यों को देख कर हम लोगों के हृदय में व्यथा उत्पन्न हुई और उन लोगों के रोगों के शान्त होने का उपाय जानने के लिये हम सब यहाँ आये हैं। अतः आप यत्नपूर्वक हम लोगों को आयुर्वेद का अध्ययन करावें ॥८१-८५॥
? It's तेनं. Wait, is it यत्नाज्जगृहुर्मुनयोorयत्लाज्जगृहुर्मुनयो? It's यत्नाज्जगृहुर्मुनयो`.
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अथ प्रथमप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणम् ९
अङ्गीकृत्य वचस्तेषां नृपतिस्तानूपादिशत्... -> `नृपतिस्तानुपादिशत् । व्याख्यातं तेनं ते यत्नाज्जगृहुर्मुनयो मुदा ।।८६।।`
काशिराजं जयाशीर्भिरभिनन्द्य मुदाऽन्विताः । सुश्रुताद्याः सुसिद्धार्था जग्मुर्गेहं स्वकं स्वकम् ।।८७।।
प्रथमं सुश्रुतस्तेषु स्वतन्त्रं कृतवान्स्फुटम् । सुश्रुतस्य सखायोऽपि पृथक्तन्त्राणि तेनिरे ।।८८।।
सुश्रुतेन कृतं तन्त्रं सुश्रुतं बहुभिर्यतः । तस्मात्तत्सुश्रुतं नाम्ना विख्यातं क्षितिमण्डले ।।८९।।
इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे आयुर्वेदप्रवक्तृप्रादुर्भावप्रकरणं समाप्तम् ।।१।।
उन लोगों की बात मान कर राजा दिव
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् आयुर्वेदाब्धिमध्यादतिमतिमुनयो योगरत्नानि यत्नाल्लब्ध्वा स्वे स्वे निबन्धे दधुरखिलजनव्याधिविध्वंसनाय । तत्तद्ग्रन्थाद् गृहीतैः सुवचनमणिभिर्भावमिश्रश्चिकित्साशास्त्रे जाड्यान्धकारं प्रशमयितुमिमं संविधत्ते प्रकाशम् ।। १ ।। अत्यन्त बुद्धिमान् मुनियों ने सब लोगों का रोग दूर करने के लिये आयुर्वेदरूपी समुद्र के मध्य से औषधों के योगरूपों रत्नों का यत्नपूर्वक लाभ (निकाल) कर उन्हें अपने बनाये हुये जिन-जिन निबन्धों (ग्रन्थों) में रखा था, ‘भावमिश्र’ चिकित्साशास्त्रविषयक जड़तारूप अन्धकार को दूर करने के लिये उन्हीं ग्रन्थों से सङ्ग्रह किये गये सुन्दर वचनरूपी मणियों के द्वारा प्रकाश अर्थात् भावप्रकाश नामक ग्रन्थ रच रहे हैं ।। १ ।। श्रीपतिपदप्रसादादाशीर्भिर्भूमिदेवानाम् । भावप्रकाशनाम्ना ग्रन्थोऽयं पठ्यतां सर्वैः ।। २ ।। लक्ष्मी के पति भगवान् विष्णु के चरणों के प्रसाद से और पृथ्वी के देवता तथा ब्राह्मणों के आशीर्वाद से सब लोग इस ‘भावप्रकाश’ नामक ग्रन्थ को पढ़ें ।। २ ।। एतस्य निबन्धस्य फलं चिकित्सा, चिकित्सा च पुरुषस्य, पुरुषस्तु चतुर्विंशतितत्त्वजीवात्मसमवायस्तस्माच्चतुर्विंशतितत्त्वानां जीवात्मनश्च स्वरूपनिरूपणाय सृष्टिक्रममाह— आत्मा ज्योतिश्चिदानन्दरूपो नित्यश्च निःस्पृहः । निर्गुणः प्रकृतेर्योगात्सगुणः कुरुते जगत् ।। ३ ।। इस निबन्ध (ग्रन्थ) के बनाने का मुख्य फल चिकित्सा है। वह चिकित्सा पुरुष की होती है और वह पुरुष चौबीस तत्त्व तथा जीवात्मा के समवाय अर्थात् समूह से रचा हुआ कहलाता है। अतएव उन तत्त्वों का तथा जीवात्मा के स्वरूप का निरूपण करने के लिये सृष्टि का क्रम कहते हैं—आत्मा—ज्योतिःस्वरूप, चिदानन्दरूप, नित्य, निःस्पृह और निर्गुण होता हुआ भी प्रकृति से युक्त होने से सगुण होकर जगत् को उत्पन्न करता है ।। ३ ।। सगुणः=इच्छाऽऽदियुक्तः ।। ३ ।। ‘सगुणः’ इस पद से ‘इच्छा आदि गुणों से युक्त’ यह अर्थ समझना चाहिये ।। ३ ।। सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणास्ते प्रकृतिः समाः । सा जडाऽपि जगत्कर्त्री परमात्मचिदव्ययात् ।। ४ ।। सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण प्रकृति में समान भाव से रहते हैं अर्थात् सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति कही जाती है और वह प्रकृति स्वयं जड़ होती हुई भी चैतन्यरूप अव्यय परमात्मा के आश्रय से जगत् का निर्माण करनेवाली हो जाती है अर्थात् प्रकृति और पुरुष इन दोनों के योग से ही सृष्टि-कार्य सम्पन्न होता है। केवल प्रकृति या पुरुष से सृष्टि नहीं हो सकती। क्योंकि पुरुष चैतन्यस्वरूप होते हुए भी स्वयं निर्गुण होने से तथा प्रकृति सगुण होती हुई भी स्वयं जड़ होने से पृथक्-पृथक् जगत् के निर्माण करने में समर्थ नहीं हैं ।। ४ ।। सतः साधोर्भावः सत्त्वं=प्रकाशकं ज्ञानसुखहेतुः, रजो=रागात्माकं दुःखहेतुः, ताम्यति ग्लानिं प्राप्नोत्यनेनेति तमः=आवरकं मोहहेतुः, ते गुणा समाः प्रकृतिरित्यर्थः । तथा सति न्यूनाधिकगुणा विकृतिः ।। ४ ।। सत् के भाव को सत्त्व कहते हैं। अतः सत्त्व गुण प्रकाश स्वभाववाला तथा ज्ञान का प्रकाशक है और ज्ञान तथा सुख का कारण भी है, अर्थात्-सत्त्व गुण के प्राधान्य में ज्ञान तथा सुख होते हैं। रज जो है, वह रागात्मक है और दुःख का कारण है। जिससे मनुष्य को ग्लानि हो, वह तमोगुण कहलाता है, अत एव तमोगुण बुद्धि का आच्छादन करनेवाला और मोह का मुख्य कारण है। समभाव को प्राप्त हुये वे तीनों गुण प्रकृति कहलाते हैं। ऐसा होने पर जब वे ही तीनों गुण न्यूनाधिक भाव को प्राप्त होते हैं, तब विकृति कहलाते हैं ।। ४ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् ११ अथ सुश्रुतमुपदिशन् धन्वन्तरिः प्रकृतेः स्वरूपविशेषमाह 'सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपमखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्तंनामे'ति ।।क।। प्रकृति के स्वरूपविशेष—जो प्रकृति सब भूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु आदिकों) का कारण हैं और स्वयं कारण से रहित है तथा जो सत्त्व, रज और तमोगुणस्वरूपिणी एवं आठ रूपवाली तथा सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण है उसे अव्यक्त कहते हैं और उसी को मूलप्रकृति भी कहते हैं ।।क।। ❖ अस्यायमर्थः-अव्यक्तं=न व्यज्यते स्मेत्यव्यक्तं मूलप्रकृत्यपरपर्यायम्, ततः सर्वभूतानां कारणं= समवायिकारणम्, अकारणं=न विद्यते कारणं यस्य तत्, सत्त्वरजस्तमोलक्षणं=सम-सत्त्वरजस्तमःस्वरूपम्, अष्टरूपम्=अव्यक्तं महान् अहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणीत्यष्टौ रूपाणि यस्य तत्, यत इन्द्रियाणां महाभूतानां च कारणतया महदादयोऽपि सप्त प्रकृतयः, एवमखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्तमित्युपसंहारः ।।क।। उपर्युक्त 'अव्यक्त' का अर्थ यह है कि जो किसी से व्यक्त (प्रत्यक्ष योग्य) न हो । अव्यक्त का दूसरा नाम मूलप्रकृति भी है। मूलप्रकृति सब भूतों का समवायिकारण है। (जैसे वस्त्र का समवायिकारण सूत्र होता है) किन्तु मूलप्रकृति का कोई कारण नहीं है। वह साम्यावस्थाको प्राप्त हुए सत्त्वा दिक तीन गुणवाली अव्यक्त-महान्-अहङ्कार और पाँच तन्मात्र ये आठ रूपवाली है। इस जगह यह शङ्का होती है कि अव्यक्त ही प्रकृति है और महान्-अहङ्कार और पाँच तन्मात्र ये सात अव्यक्त ही के विकार हैं। अतएव ये सब उसकी विकृति हुई । तब फिर किस तरह से सात महदादि प्रकृति के रूप कहे जा सकते हैं। इसका उत्तर यह है कि यद्यपि महदादि सात विकृति हैं तथापि वे इन्द्रिय और पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) के कारण हैं। अतएव उन सबों की भी प्रकृति के रूप में गणना करते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण मूलप्रकृति (अव्यक्त) है । इस प्रकार यहाँ पर यह उपसंहार हुआ ।।क।। अथ प्रकृतिपुरुषयोः साधर्म्यमाह- 'उभावप्यनादी उभावप्यनन्तौ उभावप्यलिङ्गो उभावपि नित्यौ उभावप्यपरौ उभावपि सर्वगतौ' इति ।।ख।। प्रकृति-पुरुष के परस्पर समान धर्म—प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि, दोनों ही अनन्त, दोनों ही अलिङ्ग हैं। दोनों ही नित्य, दोनों ही अपर और दोनों ही सर्वगत अर्थात् सर्वत्र विद्यमान हैं ।।ख।। ❖उभावप्यलिङ्गौ=लयं क्वचिदपि न यात:, उभावप्यपरौ=न विद्यते परोऽपरो याभ्यां तावपरौ ।।ख।। दोनों ही अलिङ्ग अर्थात् कभी किसी कारण में लय (नाश) को नहीं प्राप्त होनेवाले, हैं दोनों ही अपर हैं अर्थात् इन दोनों से परे और दूसरा कोई नहीं है ।।ख।। अथातस्तयोर्वैधर्म्यमाह- 'एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा बीजधर्मिणी प्रसवधर्मिण्यमध्यस्थधर्मिणी चे'ति ।।ग।। प्रकृति-पुरुष के परस्पर विभिन्न धर्म—प्रकृति तो एक, अचेतना (चेतना से रहित), तीन गुणों वाली, बीजधर्मवाली, प्रसवधर्मवाली और अमध्यस्थ धर्मवाली है ।।ग।। ❖ अचेतना=जडा, त्रिगुणा=तुल्यगुणत्रयात्मिका, बीजधर्मिणी=सर्वेषां महदादीनां विकाराणां बीजत्वेनावस्थिता, प्रसवधर्मिणी=पुरुषेणाक्रान्ता क्षोभं प्राप्य साम्यमतिक्रम्य महदहङ्कारादिक्रमेण जगतः प्रसवित्री, अमध्यस्थधर्मिणी=सुखदुःखभोगभोगिनी, न तु सुखदुःखभोगादुदासीना ।।ग।। अचेतना अर्थात् जड़, तीन गुणोंवाली अर्थात् समान भाव को प्राप्त हुए तीन गुणोंवाली, बीजधर्मवाली अर्थात् सम्पूर्ण महत्तत्वादिक सात विकारों के बीजरूप से स्थित, प्रसवधर्मवाली अर्थात् पुरुष से आक्रान्त होती हुई (जब पुरुष
१२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे द्रष्टा और भोक्ता होता है, उस समय) क्षोभ को प्राप्त होकर और गुणों से समभाव को छोड़ कर महत्तत्त्व से अहङ्कार और अहङ्कार से पाँच तन्मात्र इत्यादि क्रम से जगत् को उत्पन्न करनेवाली, अमध्यस्थ धर्मवाली अर्थात् सुख-दुःख के भोगों को भोगनेवाली न कि सुख-दुःख के भोग से उदासीन रहनेवाली है ॥ग॥ 'पुरुषस्तु चेतनावान् निर्गुणोऽप्रसवधर्माऽबीजधर्मा मध्यस्थधर्मा चे'ति ।।घ।। पुरुष तो (अनेक) चेतनावाला, निर्गुण, अप्रसवधर्म, अबीजधर्म तथा मध्यस्थ धर्म से युक्त है ॥घ॥ ❖ निर्गुणः=अविद्यमानसत्त्वादिगुणः, अबीजधर्मा=महाप्रलये महदादीनां विकाराणां प्रकृताविव तस्मिन्ननवस्थानाद्, मध्यस्थधर्मा=सुखदुःखेच्छाद्वेषादिभ्य उदासीनः ।।घ।। निर्गुण अर्थात् जिसमें सत्त्व, रज और तम इनमें से कोई भी गुण वर्त्तमान न हो, अबीजधर्मा अर्थात् महाप्रलय होने पर महत्तत्त्वादिक विकार जिस तरह प्रकृति में रहते हैं, उस तरह पुरुष में न रहने से पुरुष प्रकृति की भाँति बीजधर्मवाला नहीं है। वह तो मध्यस्थधर्मा अर्थात् सुख-दुःख इच्छा द्वेषादिक से उदासीन रहनेवाला है ॥घ॥ अथ प्रकृतेर्नामान्याह- प्रधानं प्रकृतिः शक्तिर्नित्या चाविकृतिस्तथा। एतानि तस्या नामानि पुरुषं या समाश्रिता ।।५।। प्रकृति के नाम—जो प्रकृति पुरुष का भली प्रकार आश्रय लिये हुई है, उसके प्रधान प्रकृति, शक्ति, नित्या और अविकृति ये नाम हैं ॥५॥ अथ प्रकृतेर्गुणानाह- सत्त्वं रजस्तमस्त्रीणि विज्ञेयाः प्रकृतेर्गुणाः। तैश्च युक्तस्य चित्तस्य कथयाभ्यखिलान् गुणान् ।।६।। प्रकृति के गुण—सत्त्व, रज और तम. ये तीनों प्रकृति के गुण हैं। इनसे युक्त चित्त (मन) के सम्पूर्ण गुणों को आगे कहते हैं ॥६॥ अथ सत्त्वगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- आस्तिक्यं प्रविभज्य भोजनमनुत्तापश्च तथ्यं वचोमेधाबुद्धिधृतिक्षमाश्च करुणा ज्ञानं च निर्दम्भता। कर्मानिन्दितमस्पृहं च विनयो धर्मः सदैवादरादेते सत्त्वगुणान्वितस्य मनसो गीता गुणा ज्ञानिभिः ।।७।। सत्त्वगुण से युक्त मन के लक्षण—आस्तिकपन, भक्ष्याभक्ष्य का विचार कर भोजन करना, उत्ताप न करना, सत्य बात बोलना, मेधा, अर्थात् सुनी हुई बात को धारण करने की शक्ति रखनेवाली बुद्धि, धृति, क्षमा, करुणा, ज्ञान, निर्दम्भता, अनिन्दित (लोक-शास्त्र से जो निन्दित न हो) तथा स्पृहा से रहित कर्म, विनय और धर्म इन सब सत्त्वगुणों से युक्त मन के गुणों का ज्ञानियों ने सदैव आदर से वर्णन किया है ॥७॥ ❖ अस्ति धर्ममोक्षपरलोकादिकमिति बुद्ध्या चरतीत्यास्तिकस्तस्य भाव आस्तिक्यम्, अनुत्तापः=अक्रोधः, धृतिः=भूतप्रेतस्मरक्रोधलोभाद्यावेशराहित्यम्, ज्ञानम्=आत्मज्ञानम्, निर्दम्भता=कपटाभावः, कर्म-अनिन्दितम्, अस्पृहम्=निष्कामं च ।।७।। धर्म, मुक्ति और परलोक (स्वर्गादिक) ये सब यथार्थ में हैं, इस बुद्धि से इनकी प्राप्ति के लिये जो कर्म करते हैं, वे आस्तिक कहलाते हैं और उनके भाव को आस्तिक्य (आस्तिकपन) कहते हैं। अनुत्ताप अर्थात् क्रोध से रहित होना, धृति अर्थात् भूत, प्रेत, काम, क्रोध और लोभादिकों के आवेश से बचकर रहना, ज्ञान अर्थात् आत्मज्ञान, निर्दम्भता अर्थात् कपट न रखना, अनिन्दित और अस्पृह, अर्थात् कामना से रहित कर्म ॥७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् १३ अथ रजोगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- क्रोधस्ताडनशीलता च बहुलं दुःखं सुखेच्छाऽधिका दम्भः कामुकताऽप्यलीकवचनं चाधीरताऽहङ्कृतिः । ऐश्वर्यादभिमानिताऽतिशयितानन्दोऽधिकश्चाटनं प्रख्याता हि रजोगुणेन सहितस्यैते गुणाश्चेतसः ॥१८॥ रजोगुण से युक्त मन के लक्षण—क्रोध करना, मारने-पीटने का स्वभाव रखना, बहुत दुःख करना, सुख की इच्छा अधिक रखना, दाम्भिक तथा कामी होना, झूठ बोलना, धैर्य न रखना, अहङ्कार करना, ऐश्वर्य होने से अभिमान करना, अधिक आनन्द मानना और पृथ्वी में अधिक परिभ्रमण करना, ये सब रजोगुण से युक्त मन के गुण (लक्षण) प्रसिद्ध हैं ॥१८॥ ❖ अलीकवचनं=मिथ्याकथनम्, अटनं=पृथ्वीपरिभ्रमणम् ।।८।। 'अलीकवचन' का 'झूठ बोलना' तथा 'अटन' का पृथ्वी में परिभ्रमण करना है ॥८॥ अथ तमोगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- नास्तिक्यं सुविषण्णताऽतिशयितालस्यं च दुष्टा मतिः प्रीतिर्निन्दितकर्मशर्मणि सदा निद्रालुताऽहर्निशम् । अज्ञानं किल सर्वतोऽपि सततं क्रोधान्धता मूढता प्रख्याता हि तमोगुणेन सहितस्यैते गुणाश्चेतसः ॥१९॥ तमोगुण से युक्त मन के लक्षण—नास्तिकपन रखना, अत्यन्त खेद से युक्त रहना, अत्यन्त आलस्य रखना, दुष्ट बुद्धि का होना, निन्दित कर्म करने से उत्पन्न सुखों में निरन्तर प्रीति रखना, दिनरात सोना, सभी विषयों में अज्ञान रहना, सदैव क्रोध से अन्धा रहना और मूर्खता करना, ये तमोगुण से युक्त मन के (लक्षण) हैं ॥१९॥ तत्र प्रभूतसत्त्वस्तु सात्त्विकः पुरुषः स्मृतः । राजसस्तामसश्चैव त्रिविधस्तेन मानवः ॥१२०॥ उसमें अधिक सत्त्वगुणवाला पुरुष सात्त्विकी, अधिक रजोगुणवाला राजसी और अधिक तमोगुणवाला तामसी प्रकृति का मनुष्य कहलाता है। इस तरह तीन प्रकार के मनुष्य विश्व में होते हैं ॥१२०॥ अथ महत्तत्त्वोत्पत्तिमाह- ततोऽभवन्महत्तत्त्वं बुद्धितत्त्वापराभिधम् । त्रिगुणं सत्त्वबहुलं निर्मलं स्फटिकोपभम्। चिच्छायाप्राप्तचैतन्यं तदिच्छामयमीरितम् ॥१२१॥ महत्तत्त्व की उत्पत्ति—उस (समसत्त्व रजस्तमः स्वरूपिण प्रकृति) से महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ है उसका दूसरा नाम 'बुद्धितत्त्व' भी है। महत्तत्त्व यद्यपि त्रिगुणात्मक (तीन गुणोंवाला) है, तथापि वह अधिक सत्त्वगुणवाला है अर्थात् उसमें और गुणों की अपेक्षा सत्त्वगुण अधिक है और वह स्फटिक के समान निर्मल है। ऋषियों ने उसे चित् (आत्मतत्त्व) का प्रतिबिम्ब पड़ने से चेतना को प्राप्त किया हुआ अत एव परमात्मा का इच्छामय कहा है ॥१२१॥ ❖ ततः प्रकृते स्त्रिगुणं=त्रयो गुणा यत्र तत्, तच्च सत्त्वबहुलम्, अत्रायमभिप्रायः-यथा निश्चले ह्रदादौ बहुद्रव्यपातात् तदीयं जलं वर्द्धते तथा चिद्रूपपुरुषेणाक्रमणात् तुल्यगुणत्रयात्मिकायाः प्रकृतेर्ज्ञानहेतुः प्रकाशकः सत्त्वगुणो वृद्धः प्रवृद्धसत्त्वतः प्रकृतेः सत्त्वबहुलं बुद्धितत्त्वमभवत् ॥१२१॥ उससे अर्थात् प्रकृति से त्रिगुण अर्थात् जिसमें सत्त्व, रज और तम, ये ३ गुण विद्यमान हों उसे त्रिगुण कहते हैं, और वह त्रिगुण कैसा हो कि 'सत्त्वबहुल' अर्थात् सत्त्वादि ३ गुणों के मध्य में सत्त्वगुण ही जिसमें अधिक मात्रा से विद्यमान हो, वह सत्त्वबहुल कहलाता है। त्रिगुण और सत्त्व बहुल इन दोनों विशेषणों को यहाँ पर देने का अभिप्राय यह है कि— जैसे निश्चल (स्थिर) जल-वाले तालाब आदि में बहुत से द्रव्य प्रस्तरादि गिर जाने से उसका जल बढ़ जाता है, उसी तरह चैतन्यरूप पुरुष के आक्रमण करने से अर्थात् आत्मतत्त्व के द्रष्टा और भोक्ता होने से तुल्यगुणत्रयात्मिका प्रकृति का कारणरूप जो प्रकाशक सत्त्वगुण है, वह वृद्धि को प्राप्त हुआ। फिर सत्त्वगुण की वृद्धि होने से प्रकृति से अधिक सत्त्वगुणवाला बुद्धितत्त्व (महत्तत्त्व) उत्पन्न हुआ ॥१२१॥
१४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथाहङ्कारस्योत्पत्ति तस्यत्रैविध्यमप्याह- महत्तस्त्रिगुणाज्जातोऽहङ्कारस्त्रिगुणान्वितः । सात्त्विको राजसश्चापि तामसश्चेति स त्रिधा ।। १२ ।। अथाहङ्कारस्योत्पत्ति तस्यत्रैविध्यमप्याह- अहङ्कार की उत्पत्ति और भेद—त्रिगुणात्मक महत्तत्त्व से तीनों गुणों से युक्त अहङ्कारतत्त्व उत्पन्न होता है और वह सात्त्विक, राजस और तामस इन भेदों से तीन प्रकार का है ।। १२ ।। ❖ महतो=बुद्धितत्त्वात्, त्रिगुणात्=त्रयो गुणा यत्र ततः, ननु महत्तत्त्वं त्रिगुणमुक्तमेव, किमर्थ महत्तस्त्रिगुणादिति विशेषणम्, सत्यम्, त्रिगुणादिति पुनर्विशेषणादुक्तं सत्त्वबहुलमिति विशेषणमत्र नानुवर्त्तते, तेनाहङ्कारोत्पादकं महत्तत्त्वं त्रिगुणमपि रजोबहुलंबोद्धव्यम्, अहङ्कारस्य रजोगुणान्वितस्य मनोधर्मत्वाद् । अहङ्कारोऽभिमानव्यापारः । अहङ्कारस्त्रिविधस्तमाह-सात्त्विक इत्यादि ।। १२ ।। महत्तत्त्व से अर्थात् बुद्धितत्त्व से, त्रिगुण से अर्थात् जिसमें तीन गुण विद्यमान हों उससे । यहाँ पर यदि कोई यह शङ्का करे कि 'महत्तत्त्व तो तीन गुणोंवाला है' ऐसा पहले कहा ही गया है पुनः उसका 'त्रिगुण' यह विशेषण यहाँ पर क्यों दिया ? तो इसका उत्तर यह है कि पूर्व में महत्तत्त्व के दो विशेषण कह आये हैं, उनमें से प्रथम 'त्रिगुण' और द्वितीय 'सत्त्वबहुल' है। अब यदि यहाँ पर महत्तत्त्व का विशेषण न होता तो वह त्रिगुण और सत्त्वबहुल इन दो विशेषणों से विशिष्ट लिया जाता, अब उसमें से केवल 'त्रिगुण' विशेषण यहाँ पर देने से 'सत्त्वबहुल' यह दूसरा विशेषण महत्तत्त्व में नहीं लगाया गया। इससे यह सिद्ध हुआ कि अहङ्कार को उत्पन्न करनेवाला महत्तत्त्व यद्यपि त्रिगुण है तथापि उसे पूर्व की भाँति सत्त्वबहुल न समझ कर रजोबहुल (अधिक रजो गुणवाला) ही समझना चाहिये । क्योंकि रजोगुण से युक्त अहङ्कार मनका धर्म है, अभिमानरूपी व्यापार से युक्त जो है, उसे अहङ्कार कहते हैं । वह अहङ्कार तीन प्रकार का है, उसी को सात्त्विक इत्यादि से कहते हैं ।। १२ ।। अथ त्रिविधस्याहङ्कारस्य कार्यमाह- जातानि सात्त्विकात्तस्मादिन्द्रियाणि सराजसात् । तानि श्रोतं त्वचो नेत्रं रसना नासिका तथा ।। १३ ।। वाग्घस्तचरणोपस्थगुदान्येकादशं मनः । पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्याहुः प्राक्तनानीतराणि च ।। १४ ।। कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव कथयन्ति विपश्चितः ।। १५ ।। त्रिविध अहङ्कार के कार्य—राजस अहङ्कार से युक्त सात्त्विक अहङ्कार से जो इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, वे कान, त्वचा (चमड़ी), नेत्र, जिह्वा, नाक, वाणी, दोनों हाथ, दोनों पैर, मूत्रेन्द्रिय और गुदा, इस तरह से दश और ग्यारहवाँ मन हैं । इनमें से आरम्भ के पाँच इन्द्रियों को बुद्धीन्द्रिय और बाद की पाँच इन्द्रियों को पण्डित लोग कर्मेन्द्रिय कहते हैं ।। १३- १५ ।। बुद्धीन्द्रियाणि बुद्धेराश्रयत्त्वात्, कर्मेन्द्रियाणि कर्माश्रयत्वात्, सात्त्विकाहङ्काराज्जातत्वादिन्द्रियाणि प्रकाशलक्षणानि, सत्त्वस्य प्रकाशकत्वात् ।। १३-१५ ।। बुद्धि के आश्रित होने से श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों को बुद्धीन्द्रिय और कर्म के आश्रित होने से वाणी आदि पाँच इन्द्रियों को कर्मेन्द्रिय कहते हैं । सात्त्विक अहङ्कार से उत्पन्न होने से इन्द्रियाँ प्रकाशलक्षण वाली हैं, क्योंकि सत्त्वगुण प्रकाशक हैं ।। १३-१५ ।। अथ मनस उभयेन्द्रियत्वमाह- मनो बुद्धीन्द्रियं विज्ञैः कर्मेन्द्रियमपि स्मृतम् । मनोधिष्ठितमेवेदमिन्द्रियं यत्प्रवर्त्तते ।। १६ ।।
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् १५ मन का बुद्धीन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय से अभिन्नता-पण्डित लोगों ने मनको बुद्धीन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय दोनों ही माना है, क्योंकि बुद्धीन्द्रियाँ या कर्मेन्द्रियाँ जो अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त होती हैं, वे केवल मन के अधीन होने से ही, अर्थात् बिना मन के कोई इन्द्रिय अपने विषय को ग्रहण करने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकती ॥१६॥ अथेन्द्रियाणां विषयानाह- शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसो गन्धो ह्यनुक्रमात् । बुद्धीन्द्रियाणां विषयाः समाख्याता महर्षिभिः ॥१७॥ बुद्धीन्द्रियों के विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये अनुक्रम से बुद्धीन्द्रियों के विषय हैं अर्थात् कानों का विषय शब्द, त्वचा का विषय स्पर्श, नेत्रों का विषय रूप, जिह्वा का विषय रस और नासिका का विषय गन्ध महर्षियों ने कहा है ॥१७॥ वाच्यं ग्राह्यञ्च गन्तव्यमानन्दं त्याज्यमेव च। कर्मेन्द्रियाणां विषयाज्ञानञ्च१ विषयो हृदः ॥१८॥ कर्मेन्द्रिय और मन के विषय—वाच्य, ग्राह्य, गन्तव्य, आनन्द, त्याज्य ये सब यथाक्रम से कर्मेन्द्रियों के विषय हैं अर्थात् वाणी का विषय वाच्य, हाथ का विषय ग्राह्य पाँव का विषय गन्तव्य, लिङ्ग का विषय आनन्द तथा गुदा का विषय ज्याज्य जानना चाहिये और मन का विषय ज्ञान अर्थात् हर एक विषयों की जानकारी रखना है ॥१८॥ ❖ हृदः=मनसः ॥१८॥ यहाँ पर 'हृत्' पद से 'मन' का ग्रहण करना चाहिये ॥१८॥ अथ पञ्चतन्मात्रोत्पत्तिमाह- तामसादप्यहङ्कारातन्मात्राणि सरजसात् । पञ्चाल्पसत्त्वसम्बन्धात्तल्लिङ्गानि भवन्ति हि ॥१९॥ शब्दतन्मात्रकं स्पर्शतन्मात्रं रूपमात्रकम् । रसतन्मात्रकं गन्धतन्मात्रमिति तानि तु ॥२०॥ पंच तन्मात्रों की उत्पत्ति के विषय—राजस अहङ्कार से युक्त तामस अहङ्कार से पाँच प्रकार के तन्मात्र उत्पन्न होते हैं, सत्त्वगुण का थोड़ा सम्बन्ध होने से वे पाँच तन्मात्र तल्लिङ्ग अर्थात् राजस और तामस के जो मोहादिक चिह्न हैं, उनसे युक्त होते हैं। वे सब तन्मात्र शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र इस प्रकार से पाँच हैं ॥१९-२०॥ ❖ तल्लिङ्गानि=मोहादिलिङ्गानि, तान्यनुद्भूतस्वभावानि२ बाह्येन्द्रियाग्राह्याणि३, शब्दादीन्येव तन्मात्राणि, तानि च योगिभिरेव ग्राह्याणि, सा सा मात्रा यस्मिंस्तत् तन्मात्रम् ।। शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र ये सब तल्लिङ्ग अर्थात् मोहादि लिङ्ग (चिह्न) वाले हैं। वे सब तन्मात्र अव्यक्त स्वभाव वाले हैं अर्थात् उन सबों का स्वभाव कैसा है यह कुछ नहीं मालूम पड़ता। अत एव वे बाह्येन्द्रिय कर्णादिकों से अग्राह्य हैं अर्थात् उनका ग्रहण इन्द्रियों से नहीं हो सकता। शब्दादि तन्मात्र हैं अर्थात् शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र इत्यादि क्रम से पाँच तन्मात्र हैं और वे सब योगियों से ही ग्रहण करने योग्य हैं। साधारण लोग उन सबों का ग्रहण नहीं कर सकते, तन्मात्र—वही-वही मात्रा (शब्दादिक) जिसमें हों उसे तन्मात्र कहते हैं अर्थात् शब्दतन्मात्र में शब्द का, स्पर्शतन्मात्र में स्पर्श का, रूपतन्मात्र में रूप का, रसतन्मात्र में रस का और गन्धतन्मात्र में गन्ध की ही केवल सूक्ष्मातिसूक्ष्म मात्रा है। अतः ये सब शब्दादि तन्मात्र कहलाते हैं ॥१९-२०॥ अथ महाभूतोत्पत्तिमाह- तन्मात्रेभ्यो वियद्वायुर्वह्निवारि वसुन्धरा । एतानि पञ्च जायन्ते महाभूतानि तत्क्रमात् ॥२१॥ १. 'ज्ञातव्य' इति पाठान्तरम् २. 'तान्यद्भुतस्वभावानी'ति पाठः सर्वत्रोपलभ्यते, किन्तु तदपेक्षयाऽत्रत्यः पाठः साधीयानिति विभावनीयम्। ३. 'बाह्येन्द्रियग्राह्याणी'ति सर्वत्रोपलब्धः पाठो भ्रान्तिकूलकस्तस्मात्रादरणीयः।
१६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पंचमहाभूतों की उत्पत्ति—शब्दादि पाँच तन्मात्रों से यथाक्रम आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी के पाँच महाभूत उत्पन्न होते हैं ॥२१॥ एकोत्तरपरिवृद्ध्या वियदादयो जायन्त इत्यर्थः । तद्यथा-शब्दतन्मात्राच्छब्दगुणं वियज्जायते, शब्दतन्मात्रसहितात्स्पर्शतन्मात्राच्छब्दस्पर्शगुणो वायुर्जायते, शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्रसहिताद्रूपतन्मात्राच्छद- स्पर्शरूपगुणो वह्निर्जायते, शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्ररूपतन्मात्रसहिताद्रसतन्मात्राच्छब्दस्पर्शरूपरसगुणं वारि जायते, शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्ररूपतन्मात्ररसतन्मात्रसहिताद्गन्धतन्मात्राच्छब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा वसुन्धरा जायते ॥२१॥ पाँच तन्मात्रों से एक-एक की उत्तरोत्तर वृद्धि द्वारा आकाशादि पाँच महाभूत उत्पन्न होते हैं । जैसे—शब्दतन्मात्र से शब्दगुणवाला आकाश उत्पन्न होता है । शब्दतन्मात्र के सहित स्पर्शतन्मात्र से शब्द और स्पर्शगुणवाला वायु उत्पन्न होता है । शब्दतन्मात्र और स्पर्शतन्मात्र के सहित रूपतन्मात्र से शब्द, स्पर्श और रूप गुणवाला अग्नि उत्पन्न होता है । शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र और रूपतन्मात्र के सहित रसतन्मात्र से शब्द, स्पर्श, रूप और रस गुणवाला जल उत्पन्न होता है । इसी प्रकार से शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र और रसतन्मात्र के सहित गन्धतन्मात्र से शब्दस्पर्श, रूप, रस और गन्ध गुणवाली पृथ्वी उत्पन्न होती है ॥२१॥ अथ महाभूतानां गुणानाह, तत्रादौ वियद्गुणानाह- शब्दःश्रोत्रेन्द्रियं वाऽपि छिद्राणि च विविक्तता । वियतः कथिता एते गुणागुणविचारिभिः ॥२१॥ आकाश के गुण—गुणों का विचार करनेवाले पण्डितों ने शब्द, कर्णेन्द्रिय, छिद्र और विविक्तता ये सब गुण आकाश के कहे हैं ॥२२॥ ❖ विविक्तता=शारीराणां१ भावानां शिरास्नाव्यस्थिपेशीप्रभृतीनां जातिव्यक्तिभ्यां मिथः पृथक्त्वम् ॥२२॥ विविक्तता=शिरा (कोमल नसें), स्नायु (दृढ़ नसें), हड्डी और मांसपेशी इत्यादि शरीर के अन्दर स्थित जो पदार्थ हैं, उन सबों को जाति और व्यक्ति के द्वारा परस्पर पृथक् करने का नाम विविक्तता है ॥२२॥ अथ वायोर्गुणानाह- स्पर्शस्त्वगिन्द्रियञ्चापि लघुता स्पन्दनं तनोः । चेष्टा सर्वशरीरस्य वायोरेते गुणाः स्मृताः ॥२३॥ वायु के गुण—स्पर्श, त्वगिन्द्रिय, लघुता, शरीर का स्पन्दन (हिलना) और सब शरीर की चेष्टा ये गुण वायु के कहे गये हैं ॥२३॥ अथ वह्नेर्गुणानाह- रूपं नेत्रेन्द्रियं पाकः सन्तापस्तीक्ष्णता तथा । वर्णो भ्राजिष्णुताऽमर्षः शौर्यंवह्नेर्गुणा अमी ॥२४॥ अग्नि के गुण—रूप, नेत्रेन्द्रिय, पाक, सन्ताप, तीक्ष्णता, वर्ण, भ्राजिष्णुता, अमर्ष और शूरता ये सब गुण अग्नि के कहे गये हैं ॥२४॥ ❖ रूपं=लावण्यम् । पाकः=उदराग्निना आहारपाकः । सन्तापः=औष्ण्यम्, तीक्ष्णता=आशुकारिता । वर्णो=गौरादिः । भ्राजिष्णुता=दीप्तिः । अमर्षः=क्रोधः ॥२४॥ रूप=लावण्य (लुनाई), पाक=जठराग्नि के द्वारा उदरगत भोज्य पदार्थों का पचना, सन्ताप=गर्मी, तीक्ष्णता=हर एक कार्यों को शीघ्रता से करना, वर्ण=गोरा काला आदि शरीर का रंग, भ्राजिष्णुता=दीप्ति (कान्ति), अमर्ष=क्रोध ॥२४॥ १. क्वचित् 'शरीराणाम्' इति पाठः । २. 'रसा' इति पाठान्तरम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmù. Digitized by S3 Foundation USA
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अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् १७ रसो रसनेन्द्रियं शैत्यं स्नेहश्च गुरुता तथा। सर्वद्रवसमूहश्च शुक्रं वारिगुणाः स्मृताः ।।२५।। जल के गुण— रस (मधुरादि ६ रस), रसनेन्द्रिय (जिह्वाग्रवर्ती), शीतलता, स्नेह (चिकनाहट), गुरुता (भारीपन), सम्पूर्ण द्रव (बहनेवाले) पदार्थों का समूह और शुक्र ये सब गुण जल के कहे गये हैं ।।२५।। अथ वसुन्धरागुणानाह- गन्धो घ्राणेन्द्रियं चापि काठिन्यं गौरवं तथा। वसुन्धरा गुणा एते गदिता गुणवेदिभिः ।।२६।। पृथ्वी के गुण— गन्ध, घ्राणेन्द्रिय (नासिका के अग्रभाग में रहनेवाला इन्द्रिय), कठिनता और गुरुत्व ये सब गुण के विचार करनेवाले पण्डितों ने पृथ्वी के गुण कहे हैं ।।२६।। शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसो गन्धश्च तत्क्रमात्। तन्मात्राणां विशेषाः स्युः स्थूलभावमुपागताः ।।२७।। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच तत्क्रम से अर्थात् शब्दतन्मात्रादिक्रम से तन्मात्राओं ही के स्थूलभाव को प्राप्त हुये विशेष हैं, अर्थात् शब्दतन्मात्रादि ही स्थूलभावको प्राप्त होकर शब्द, स्पर्शादिरूप में परिणत हो जाते हैं ।।२७।। तत्क्रमात् = शब्दतन्मात्रादिक्रमात्। अनुभवयोग्यैः सुखदुःखमोहरूपैर्धर्मैर्विशेष्यन्तइति विशेषाः। अत्र कर्मणि घञ्प्रत्ययः। तन्मात्राणि त्वविशेषाणि यतस्तान्यनुभवयोग्यैः सुखादिभिर्विशेष्टं न शक्यन्ते सूक्ष्मत्वात् ।।२७।। ‘तत्क्रमात्’ इस पद से ‘शब्दतन्मात्रादि क्रम से’ यह अर्थ समझना चाहिये। विशेष अर्थात् अनुभव के योग्य सुख, दुःख, मोहरूप धर्मों के द्वारा जिसका विशेष किया जाय उसे विशेष कहते हैं। यहाँ पर कर्म में घञ् प्रत्यय हुआ है। शब्दादि तन्मात्र जो हैं वे तो अविशेष हैं, क्योंकि अत्यन्त सूक्ष्म होने से अनुभव के योग्य सुखादिकों के द्वारा उनका विशेष नहीं किया जा सकता, स्थूलभाव को प्राप्त होने पर तो शब्द, स्पर्शादि रूप से उन तन्मात्रों का अनुभव योग्य सुखादिकों के द्वारा विशेष किया जा सकता है ।।२७।। अथाष्टानां प्रकृतीनां मध्ये तावत् प्रथमां प्रकृतिमाह- प्रकृतेः कारणायोगान्मता प्रकृतिरेव सा। महत्तत्वादयः सप्त शक्तेर्विकृतयः स्मृताः ।।२८।। आठ प्रकार की प्रकृति में पहली प्रकृति— प्रकृति अर्थात् अव्यक्त के सम्बन्ध में कारण का योग न होने से अर्थात् अव्यक्त (प्रकृति) का कोई कारण नहीं है अतः वही यथार्थ रूपसे प्रकृति इस नाम से कही जाती है और महत्तत्त्वादि ७ तो शक्ति अर्थात् प्रकृति की विकृति अर्थात् कार्य कहे जाते हैं ।। ❖ प्रकृतिरेव=कारणमेव¹, न तु कस्यचित् कार्यमित्यर्थः²। शक्तेः प्रकृतेर्विकृतयः=कार्याणि ।। प्रकृति ही है अर्थात् सबों का कारण ही है, न कि किसी का है और महत्तत्त्वादि (महान्, अहङ्कार और पाँच तन्मात्र) सात शक्ति अर्थात् प्रकृति के विकृति अर्थात् कार्य हैं ।।२८।। अथ सप्त प्रकृतीराह- इन्द्रियाणां च भूतानां कारणत्वान्महर्षिभिः। महत्तत्वादयः सप्त प्रोक्ताः प्रकृतयोऽपि च ।।२९।। सप्त प्रकृतियाँ— महत्तत्वादिक ७ जो प्रकृति के कार्य हैं, वे इन्द्रियों और पाँच महाभूतों के कारण हैं। अतः महर्षियों ने इन्हें भी प्रकृति ही कहा है ।।२९।। १. क्वचित् ‘कारणमिति पाठान्तरं तदसमीचीनम्। २. अस्मात् परं— ‘कार्याणि; इन्द्रियाणां सर्वभूतानां कारणत्वान्महर्षिभिर्महत्तत्वादयः सप्त महानहङ्कारः पञ्च तन्मात्राणी’त्यधिकः पाठो लभ्यते किन्तु स भ्रान्तिमूलक एवेति नादरणीयः। ५ भाव.I
१८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे (१कार्याणि, इन्द्रियाणां सर्वभूतानां कारणत्वान्महर्षिभिर्महत्तत्वादयः सप्त महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणीति प्रकृतयोऽपि प्रोक्ताः) । [२तथा सति प्रकृतिर्महानहङ्कारः पञ्च तन्मात्रा चेत्यष्टौ प्रकृतयः] ।।२९।। जब कि इन्द्रियों का और पञ्च महाभूतों का कारण होने से प्रकृति के कार्यरूप महान्, अहङ्कार, पाँच तन्मात्र इस प्रकार से महत्तत्त्वादि सात की महर्षियों ने प्रकृति के मध्य में गणना की है तो वैसा होने से प्रकृति, महान्, अहङ्कार और पाँच तन्मात्र इस तरह से ये आठ प्रकृतियाँ हुईं ॥२९॥ अथ षोडश विकारानाह- दशेन्द्रियाणि चित्तञ्च महाभूतानि पञ्च च । एतानि सृष्टिं जानद्भिर्विकाराः षोडश स्मृताः ।।३०।। सोलह विकार—सृष्टि के अर्थात् सृष्टि किस क्रम से होती है, इस विषय के जाननेवाले पण्डितों ने दश इन्द्रिय, चित्त और पाँच महाभूत ये ही १६ विकार के नाम से कहे हैं अर्थात् ये विकार कहलाते हैं ॥३०॥ विकाराः=कार्याणि ।।३०।। विकार का अर्थ है कार्य ॥३०॥ अथ चतुर्विंशतितत्त्वान्युपसंहारञ्जीवात्मनः स्थानमाह- एवं चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः सिद्धे वपुर्गृहे । जीवात्मा नियतेर्निघ्नो वसति स्वान्तदूतवान् ।।३१।। जीवात्मा के निवासस्थान—इस प्रकार चौबीस तत्त्वों से अर्थात् ८ प्रकृति और १६ विकारों से बने हुये शरीररूपी गृह में शुभ तथा अशुभ कर्मों के अधीन होता हुआ, मनरूपी दूत से युक्त होकर जीवात्मा निवास करता है ॥३१॥ ❖ अत्र शब्दादीनां वियदादिमहाभूतगुणानां धर्मिभ्योऽभिन्नतया पृथक्त्वं निरस्योक्तानां तत्त्वानामुपसंहारमाह- चतुर्विंशतिभिरिति । तानि च प्रकृतयोऽष्टौ विकाराः षोडशेति । महत्तत्वादीनि³ प्रकृत्यादीनां भावाः, नियतेः= शुभाशुभकर्मणः, निघ्नः=आयत्त:, स्वान्तदूतवान्=मनोदूतयुक्तः ।।३१।। यहाँ आकाशादि पाँच महाभूतों के गुण को शब्दादि (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) हैं, इन्हीं को 'धर्म' से धर्म अभिन्न होता है, इस नियम से पाँच महाभूतों से पृथक्ता का खण्डन करते हुए अर्थात् जो लोग शब्दादिकों को महाभूतों से पृथक् मानते थे, उनके मत का खण्डन करते हुये और कहे हुए तत्त्वों का उपसंहार करते हुए 'चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः' (२४ तत्त्वों से) ऐसा कहा। वे चौबीस तत्त्व ८ प्रकृति और १६ विकार ये हैं। महत्तत्त्वादि सब प्रकृति आदि के भाव अर्थात् कार्य हैं। यहाँ पर 'नियति' इस पद से 'शुभाशुभ कर्म' यह अर्थ समझना, निघ्नः=अर्थात् अधीन, स्वान्तदूतवान्=मनोरूपी दूत से युक्त ॥३१॥ अथ जीवात्मा शारीरीत्युच्यत इत्याह- स देही कथ्यते पापपुण्यदुःखसुखादिभिः । व्याप्तो बद्धश्च मनसा कृत्रिमैः कर्मबन्धनैः ।।३२।। जीवात्मा और शरीरी—वही जीवात्मा पाप-पुण्य और दुःख-सुख से व्याप्त तथा मन के द्वारा कृत्रिम कर्म के बन्धनों से बँधा हुआ शरीरी कहलाता है ॥३२॥ ❖ सः=जीवात्मा ।।३२।। 'सः' पद का अर्थ 'वह जीवात्मा' है ॥३२॥ १. अयं कोष्ठस्थः पाठष्टीकाकृत्सम्मत इत्यत्र विभावनीयम् । २. अयं कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ३. 'महत्तत्त्वानी'ति पाठ सर्वत्रोपलभ्यते किन्तु चिन्त्यः ।
अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् ९९ तस्य देहिनः शरीरजीवात्मनोः संयोगकारकेण मनसा संयोगे ये ये गुणा उत्पद्यन्ते तानाह- इच्छाद्वेषसुखासुखानि¹ विषयज्ञानं प्रयत्नो मनः सङ्कल्पश्च विचारणा स्मृतिरथो बुद्धिः कलाविज्ञता । प्राणस्योपरि यापनं गुदवशाद्वायोरधः प्रेरणं नेत्रोन्मेषनिमेषकृत्यकरणोत्साहाश्च जीवे गुणाः ।।३३।। जीव विषयक गुण—इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, विषयों का ज्ञान, प्रयत्न, मनःसङ्कल्प, विचारणा, स्मृति, बुद्धि, कलाओं की अभिज्ञता, प्राण का ऊपर की ओर ले जाना, गुदा के मार्ग से वायु का नीचे की ओर ले जाना, नेत्रों का उन्मेष और निमेष तथा कार्य करने में उत्साह, ये सब जीवविषयक गुण हैं ।।३३।। इच्छा=सुखहेतुरभिलाषः । द्वेषो=दुःखहेतुर्मनोऽप्रवृत्तिः² । सुखं=प्रीतिः³ । असुखम्=अप्रीतिः । विषयज्ञानं= शब्दादिज्ञानम् । प्रयत्नः=कार्ये तात्पर्यम् । मनः=संशयात्मकं, तस्य कर्मसङ्कल्पः । विचारणा=ऊहापोहाभ्यां वस्तुविमर्शः । स्मृतिः=पूर्वानुभूतस्यार्थस्य स्मरणम् । बुद्धिः=निश्चयात्मिका । कलाविज्ञता=शिल्पशास्त्रादिबोधः । प्राणस्य=हृदयस्थितस्य वायोरुपरि यापनम्=मुखादिप्रतिनयनम् । गुदवशाद्वायोरधःप्रेरणम्=अपानस्याधःप्रेरणम् । नेत्रोन्मेषनिमेषौ=नेत्रयोरुन्मीलननिमीलने । कृत्य-करणोत्साहः=कार्यारम्भे सामर्थ्येनोत्साहः । जीवे=मनोयुक्तस्य जीवात्मनः । अमी=इच्छादयो गुणाः ।।३३।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्र भावविरचिते भावप्रकाशे सृष्टिप्रकरणं समाप्तम् ।। ❖❖❖ इच्छा=सुखमूलक अभिलाष, द्वेष=दुःखमूलक मन की अप्रवृत्ति, सुख=प्रीति, असुख=अप्रीति, विषयज्ञान=शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध विषयक ज्ञान, प्रयत्न=कार्यविषयक तत्परता, मन=यह वस्तु है या नहीं इस प्रकार का संशय (सन्देह) करनेवाला, उसका सङ्कल्प=संशयात्मक मन का कर्म अर्थात् मन के द्वारा सङ्कल्प करना, विचारणा=ऊहापोह (तर्क-वितर्क के द्वारा वस्तुविषयक विचार), स्मृति=पूर्व में अनुभूत अर्थ का स्मरण, बुद्धि=निश्चयात्मिका (यह वही वस्तु है दूसरा नहीं), कलाविज्ञता=शिल्प-शास्त्रादि का बोध, प्राणका अर्थात् हृदयस्थित वायु का ऊपर (मुखादि की) ओर ले जाना, गुदा के मार्ग से वायु का नीचे की ओर ले जाना अर्थात् अपान वायु का नीचे की ओर लेजाना, नेत्रों का उन्मेष और निमेष अर्थात् नेत्रों का खोलना और मूँदना, कार्य करने में उत्साह अर्थात् कार्य के आरम्भ करने में सामर्थ्य के अनुरूप उत्साह, जीव विषयक अर्थात् मन से युक्त जीवात्मा के ये इच्छा आदि गुण हैं ।।३३।। इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् समाप्तम् ।।२।। ❖❖❖ १. 'दुःखसुखानि'ति पाठान्तरम् । २. 'मनःप्रवृत्ति'रिति. पाठान्तरम् । ३. 'अदुःखमि'ति पाठान्तरम् ।
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् चिकित्सायां शरीरी ह्याधिकृतः स शरीरी यथोत्पद्यते तद्बोधयितुं गर्भोत्पत्तिक्रममाह । गर्भोत्पत्तिभूमिस्तु रजस्वला स्त्री, ततो रजस्वलास्वरूपमाह- द्वादशाद्वत्सरादूर्ध्वमापञ्चाशत्समाः स्त्रियः। मासि मासि भगद्वारा प्रकृत्यैवार्त्तवं स्रवेत् ।। १ ।। रजस्वला स्त्री के स्वरूप—बारह वर्ष की अवस्था से लेकर पचास वर्ष की अवस्था तक की स्त्रियों के भग (योनि) के मार्ग से प्रत्येक महीने में स्वभावतः आर्त्तव (रज) निकलता रहता है ।। १ ।। अथ गर्भग्रहणयोग्यं समयमाह- आर्त्तवस्रावदिवसाद्दूतुः षोडश रात्रयः। गर्भग्रहणयोग्यस्तु स एव समयः स्मृतः ।।२।। गर्भ ग्रहण के योग्य समय—जिस दिन से रज निकलने लगता है, उस दिन से लेकर सोलहवीं रात्रि पर्यन्त समय को ऋतुकाल कहते हैं। यही सोलह रात्रि व्यापी ऋतुकाल गर्भ धारण करने के योग्य समय है ।।२।। ❖ सर्वासामेव चतुर्वर्णस्त्रीणां सर्ववादिसम्मतः पूर्वोक्तः समयः । ग्रन्थान्तरे तु विशेषः । तद्यथा- स्नानदिवसाद्दूर्ध्वं द्वादशरात्रावधि ब्राह्मण्याः, दशरात्रावधि क्षत्रियायाः, अष्टरात्रावधि वैश्यायाः, षड्रात्रावधि शूद्राया गर्भधारणे शक्तिः ।। २ ।। चारो वर्णों की सभी स्त्रियों के गर्भधारण करने के सम्बन्ध में पूर्वोक्त समय सभी विद्वानों के सम्मत है किन्तु दूसरे ग्रन्थों में इससे कुछ विशेष लिखा है, कि—जिस दिन रजस्वला स्त्री स्नान करके शुद्ध होती है, उस दिन से लेकर बारह रात्रि तक ब्राह्मणी, दस रात्रि तक क्षत्रिया, आठ रात्रि तक वैश्य और छः रात्रि तक शूद्रा स्त्री की गर्भधारण करने में शक्ति (सामर्थ्य) रहती है ।।२।। अथ रजस्वलाया नियमानाह- आर्त्तवस्रवदिवसादहिंसा ब्रह्मचारिणी । शयीत दर्भशय्यायां पश्येदपि पतिं न च ।।३।। करे शरावे पर्णे वा हविष्यं त्र्यहमाहरेत् । अश्रुपातं नखच्छेदमभ्यङ्गमनुलेपनम् ।।४।। नेत्रयोरञ्जनं स्नानं दिवास्वापं प्रधावनम् । अत्युच्चशब्दश्रवणं हसनं बहुभाषणम् ।। आयासं भूमिखननं प्रवातःञ्च विवर्जयेत् ।। ५ ।। रजस्वला स्त्रियों के नियम—रजस्वला स्त्री जिस दिन रजोधर्म हो जाय उस दिन से तीन दिन तक किसी जीव की हिंसा न करे, ब्रह्मचर्य से रहे, कुश की बनी हुई चटाई पर सोवे और पति का दर्शन न करे तथा आँसू का गिराना (रोना), नखों का काटना या कटाना, तेल लगाना, चन्दनादिका लेप करना, आँखों में अंजन लगाना, स्नान करना, दिन में सोना, दौड़ना, अत्यन्त ऊँचे शब्दों का सुनना, हँसना, बहुत बोलना, परिश्रम करना, जमीन का खोदना, जहाँ पर अधिक वायु हो वहाँ पर बैठना, ये सब छोड़ देवे ।। ३-५ ।। एतस्या नियमाकरणे दोषानाह- अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा लोभाद्वा दैवतश्च वा ।। ६ ।। सा चेत् कुर्यान्निषिद्धानि गर्भो दोषांस्तदाऽऽप्नुयात् । एतस्या रोदनाद्गर्भो भवेद्विकृतलोचनः ।।७।। नखच्छेदेन कुनखी कुष्ठी त्वभ्यङ्गता भवेत् । अनुलेपात्तथा स्नानाद् दुःख्शीलोऽञ्जनाद्दृक् ।।८।। स्वापशीलो दिवास्वापाच्चञ्चलः स्यात् प्रधावनात् । अत्युच्चशब्दश्रवणाद्वधिरःखलु जायते ।।९।। तालुदन्तौष्ठजिह्वासु श्यावो हसनतो भवेत् । प्रलापी भूरिकथनादुन्मत्तस्तु परिश्रमात् ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २१ स्खलते भूमिखननादुन्मत्तो बातसेवनात् ।।१०।। रजस्वला स्त्री के नियम नहीं पालन करने पर दोष—यदि रजस्वला स्त्री अज्ञान के वश या असावधानता के वश या लोभ के वश अथवा दैव के वश होकर पूर्वोक्त अश्रुपातादि निषिद्ध कार्यों को करे तो उसका गर्भ दोषों को प्राप्त करता है, जैसे—रोने से विकृति नेत्रवाला, नखों के काटने से खराब नखोंवाला, तेल लगाने से कोढ़ी शरीर वाला, चन्दनादि का लेप तथा स्नान करने से सदा दुःखित रहनेवाला, अञ्जन लगाने से अन्धा, दिन में सोने से अधिक सोनेवाला, दौड़ने से चञ्चल स्वभाव वाला, अत्यन्त ऊँचे शब्द के सुनने से बहिरा, हँसने से तालु, दाँत, ओष्ठ और जिह्वा श्याव (कृष्णमिश्रित पीत वर्ण) वाला, अधिक बोलने से बकवाद करनेवाला, परिश्रम करने से पगला, भूमि खोदने से चलते- चलते लड़खड़ा कर गिर पड़नेवाला और जहाँ पर अधिक वायु हो वहाँ पर बैठने से गर्भस्थ शिशु पागल होता है ।।६- १०।। अथ रजस्वलाकृत्यम्- पूर्व पश्येदृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना । तादृशं जनयेत् पुत्रं ततः पश्येत्पतिं पश्येत्पतिं प्रियम् ।।११।। स्नानोत्तर रजस्वला स्त्री का कर्त्तव्य—रजस्वला स्त्री ऋतुस्नान करके प्रथम जिस तरह के पुरुष को देखती है, उसी तरह के पुत्र को उत्पन्न करती है। अतः ऋतुस्नान करने के बाद सर्वप्रथम पति का अथवा जो अपना प्रिय हो उसका दर्शन करें ।।११।। ❖ प्रियमिति । भर्त्तर्यनासन्ने पुत्रादिकमपि पश्येत् ।।११।। ‘प्रिय’ शब्द का तात्पर्य यह है कि यदि पति पास में न हो तो अपने प्रिय पुत्रादि का ही दर्शन करे ।।११।। चतुर्थादिदिवसेऽपि रजोनिवृत्तौ स्त्री पत्या सङ्गच्छेन्न तु रजेऽनुवृत्तौ । यत आह प्रवहत्सलिले क्षिप्तं द्रव्यं गच्छत्यधो यथा । तथा वहति रक्ते तु क्षिप्तं वीर्यमधो व्रजेत् ।।१२।। चौथा पाँचवाँ आदि दिन होने पर यदि रजःस्राव बन्द हो गया हो तभी स्त्री पति के साथ सङ्ग करे, रजःस्राव हो रहा हो तो सङ्ग न करे। क्योंकि 'बहते हुये जल में फेंका हुआ द्रव्य जिस भाँति नीचे की तरफ बह कर चला जाता है, उसी भाँति रजःस्राव होते हुये में गिराया हुआ पुरुष का वीर्य बह कर नीचे की ओर चला जाता है अर्थात् गर्भाशय में नहीं ठहरने पाता, किन्तु रजःस्राव के साथ बाहर निकल जाता है ।।१२।। अथ भर्तृकृत्यम् । तत्र गर्भाधाने निषिद्धं विहितं च कालं तयोः फलञ्चाह- आयुः क्षयभयाद्भर्त्ता प्रथमे दिवसे स्त्रियम् ।।१३।। द्वितीयेऽपि दिने रत्यै त्यजेदृतुमतीं तथा । तत्र यश्चाहितो गर्भो जायमानो न जीवति ।। आहितो यस्तृतीयेऽह्नि स्वल्पायुर्विकलाङ्गकः ।।१४।। रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग करने का निषेध—पति 'आयु का नाश होगा' इस भय से रजोधर्म का प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय दिन भी ऋतुमती स्त्री के साथ सङ्ग करना छोड़ देवे क्योंकि प्रथम और द्वितीय दिन में ऋतुमती स्त्री के साथ सङ्ग करने से आयु का क्षय होता है तथा जो गर्भ स्थित होता है, वह उत्पन्न होने पर जीता नहीं है और तीसरे दिन में जो गर्भ स्थित होता है, वह थोड़ी आयुवाला और विकलाङ्ग (न्यूनाधिक अङ्गोंवाला) होता है ।।१३-१४।। अतश्चतुर्थी षष्ठी स्यादष्टमी दशमी तथा । द्वादशी वाऽपि या रात्रिस्तस्यान्तां विधिना भजेत् ।। ऋतुमती के साथ सम्भोग करने का प्रशस्त दिन—चौथी, छठीं, आठवीं, दशवीं या बारहवीं जो रात्रि हो, उसमें विधि से ऋतुमती स्त्री के साथ सङ्ग करे ।।१५।।