भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् ११ अथ सुश्रुतमुपदिशन् धन्वन्तरिः प्रकृतेः स्वरूपविशेषमाह 'सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपमखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्तंनामे'ति ।।क।। प्रकृति के स्वरूपविशेष—जो प्रकृति सब भूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु आदिकों) का कारण हैं और स्वयं कारण से रहित है तथा जो सत्त्व, रज और तमोगुणस्वरूपिणी एवं आठ रूपवाली तथा सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण है उसे अव्यक्त कहते हैं और उसी को मूलप्रकृति भी कहते हैं ।।क।। ❖ अस्यायमर्थः-अव्यक्तं=न व्यज्यते स्मेत्यव्यक्तं मूलप्रकृत्यपरपर्यायम्, ततः सर्वभूतानां कारणं= समवायिकारणम्, अकारणं=न विद्यते कारणं यस्य तत्, सत्त्वरजस्तमोलक्षणं=सम-सत्त्वरजस्तमःस्वरूपम्, अष्टरूपम्=अव्यक्तं महान् अहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणीत्यष्टौ रूपाणि यस्य तत्, यत इन्द्रियाणां महाभूतानां च कारणतया महदादयोऽपि सप्त प्रकृतयः, एवमखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्तमित्युपसंहारः ।।क।। उपर्युक्त 'अव्यक्त' का अर्थ यह है कि जो किसी से व्यक्त (प्रत्यक्ष योग्य) न हो । अव्यक्त का दूसरा नाम मूलप्रकृति भी है। मूलप्रकृति सब भूतों का समवायिकारण है। (जैसे वस्त्र का समवायिकारण सूत्र होता है) किन्तु मूलप्रकृति का कोई कारण नहीं है। वह साम्यावस्थाको प्राप्त हुए सत्त्वा दिक तीन गुणवाली अव्यक्त-महान्-अहङ्कार और पाँच तन्मात्र ये आठ रूपवाली है। इस जगह यह शङ्का होती है कि अव्यक्त ही प्रकृति है और महान्-अहङ्कार और पाँच तन्मात्र ये सात अव्यक्त ही के विकार हैं। अतएव ये सब उसकी विकृति हुई । तब फिर किस तरह से सात महदादि प्रकृति के रूप कहे जा सकते हैं। इसका उत्तर यह है कि यद्यपि महदादि सात विकृति हैं तथापि वे इन्द्रिय और पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) के कारण हैं। अतएव उन सबों की भी प्रकृति के रूप में गणना करते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण मूलप्रकृति (अव्यक्त) है । इस प्रकार यहाँ पर यह उपसंहार हुआ ।।क।। अथ प्रकृतिपुरुषयोः साधर्म्यमाह- 'उभावप्यनादी उभावप्यनन्तौ उभावप्यलिङ्गो उभावपि नित्यौ उभावप्यपरौ उभावपि सर्वगतौ' इति ।।ख।। प्रकृति-पुरुष के परस्पर समान धर्म—प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि, दोनों ही अनन्त, दोनों ही अलिङ्ग हैं। दोनों ही नित्य, दोनों ही अपर और दोनों ही सर्वगत अर्थात् सर्वत्र विद्यमान हैं ।।ख।। ❖उभावप्यलिङ्गौ=लयं क्वचिदपि न यात:, उभावप्यपरौ=न विद्यते परोऽपरो याभ्यां तावपरौ ।।ख।। दोनों ही अलिङ्ग अर्थात् कभी किसी कारण में लय (नाश) को नहीं प्राप्त होनेवाले, हैं दोनों ही अपर हैं अर्थात् इन दोनों से परे और दूसरा कोई नहीं है ।।ख।। अथातस्तयोर्वैधर्म्यमाह- 'एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा बीजधर्मिणी प्रसवधर्मिण्यमध्यस्थधर्मिणी चे'ति ।।ग।। प्रकृति-पुरुष के परस्पर विभिन्न धर्म—प्रकृति तो एक, अचेतना (चेतना से रहित), तीन गुणों वाली, बीजधर्मवाली, प्रसवधर्मवाली और अमध्यस्थ धर्मवाली है ।।ग।। ❖ अचेतना=जडा, त्रिगुणा=तुल्यगुणत्रयात्मिका, बीजधर्मिणी=सर्वेषां महदादीनां विकाराणां बीजत्वेनावस्थिता, प्रसवधर्मिणी=पुरुषेणाक्रान्ता क्षोभं प्राप्य साम्यमतिक्रम्य महदहङ्कारादिक्रमेण जगतः प्रसवित्री, अमध्यस्थधर्मिणी=सुखदुःखभोगभोगिनी, न तु सुखदुःखभोगादुदासीना ।।ग।। अचेतना अर्थात् जड़, तीन गुणोंवाली अर्थात् समान भाव को प्राप्त हुए तीन गुणोंवाली, बीजधर्मवाली अर्थात् सम्पूर्ण महत्तत्वादिक सात विकारों के बीजरूप से स्थित, प्रसवधर्मवाली अर्थात् पुरुष से आक्रान्त होती हुई (जब पुरुष