भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् आयुर्वेदाब्धिमध्यादतिमतिमुनयो योगरत्नानि यत्नाल्लब्ध्वा स्वे स्वे निबन्धे दधुरखिलजनव्याधिविध्वंसनाय । तत्तद्ग्रन्थाद् गृहीतैः सुवचनमणिभिर्भावमिश्रश्चिकित्साशास्त्रे जाड्यान्धकारं प्रशमयितुमिमं संविधत्ते प्रकाशम् ।। १ ।। अत्यन्त बुद्धिमान् मुनियों ने सब लोगों का रोग दूर करने के लिये आयुर्वेदरूपी समुद्र के मध्य से औषधों के योगरूपों रत्नों का यत्नपूर्वक लाभ (निकाल) कर उन्हें अपने बनाये हुये जिन-जिन निबन्धों (ग्रन्थों) में रखा था, ‘भावमिश्र’ चिकित्साशास्त्रविषयक जड़तारूप अन्धकार को दूर करने के लिये उन्हीं ग्रन्थों से सङ्ग्रह किये गये सुन्दर वचनरूपी मणियों के द्वारा प्रकाश अर्थात् भावप्रकाश नामक ग्रन्थ रच रहे हैं ।। १ ।। श्रीपतिपदप्रसादादाशीर्भिर्भूमिदेवानाम् । भावप्रकाशनाम्ना ग्रन्थोऽयं पठ्यतां सर्वैः ।। २ ।। लक्ष्मी के पति भगवान् विष्णु के चरणों के प्रसाद से और पृथ्वी के देवता तथा ब्राह्मणों के आशीर्वाद से सब लोग इस ‘भावप्रकाश’ नामक ग्रन्थ को पढ़ें ।। २ ।। एतस्य निबन्धस्य फलं चिकित्सा, चिकित्सा च पुरुषस्य, पुरुषस्तु चतुर्विंशतितत्त्वजीवात्मसमवायस्तस्माच्चतुर्विंशतितत्त्वानां जीवात्मनश्च स्वरूपनिरूपणाय सृष्टिक्रममाह— आत्मा ज्योतिश्चिदानन्दरूपो नित्यश्च निःस्पृहः । निर्गुणः प्रकृतेर्योगात्सगुणः कुरुते जगत् ।। ३ ।। इस निबन्ध (ग्रन्थ) के बनाने का मुख्य फल चिकित्सा है। वह चिकित्सा पुरुष की होती है और वह पुरुष चौबीस तत्त्व तथा जीवात्मा के समवाय अर्थात् समूह से रचा हुआ कहलाता है। अतएव उन तत्त्वों का तथा जीवात्मा के स्वरूप का निरूपण करने के लिये सृष्टि का क्रम कहते हैं—आत्मा—ज्योतिःस्वरूप, चिदानन्दरूप, नित्य, निःस्पृह और निर्गुण होता हुआ भी प्रकृति से युक्त होने से सगुण होकर जगत् को उत्पन्न करता है ।। ३ ।। सगुणः=इच्छाऽऽदियुक्तः ।। ३ ।। ‘सगुणः’ इस पद से ‘इच्छा आदि गुणों से युक्त’ यह अर्थ समझना चाहिये ।। ३ ।। सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणास्ते प्रकृतिः समाः । सा जडाऽपि जगत्कर्त्री परमात्मचिदव्ययात् ।। ४ ।। सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण प्रकृति में समान भाव से रहते हैं अर्थात् सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति कही जाती है और वह प्रकृति स्वयं जड़ होती हुई भी चैतन्यरूप अव्यय परमात्मा के आश्रय से जगत् का निर्माण करनेवाली हो जाती है अर्थात् प्रकृति और पुरुष इन दोनों के योग से ही सृष्टि-कार्य सम्पन्न होता है। केवल प्रकृति या पुरुष से सृष्टि नहीं हो सकती। क्योंकि पुरुष चैतन्यस्वरूप होते हुए भी स्वयं निर्गुण होने से तथा प्रकृति सगुण होती हुई भी स्वयं जड़ होने से पृथक्-पृथक् जगत् के निर्माण करने में समर्थ नहीं हैं ।। ४ ।। सतः साधोर्भावः सत्त्वं=प्रकाशकं ज्ञानसुखहेतुः, रजो=रागात्माकं दुःखहेतुः, ताम्यति ग्लानिं प्राप्नोत्यनेनेति तमः=आवरकं मोहहेतुः, ते गुणा समाः प्रकृतिरित्यर्थः । तथा सति न्यूनाधिकगुणा विकृतिः ।। ४ ।। सत् के भाव को सत्त्व कहते हैं। अतः सत्त्व गुण प्रकाश स्वभाववाला तथा ज्ञान का प्रकाशक है और ज्ञान तथा सुख का कारण भी है, अर्थात्-सत्त्व गुण के प्राधान्य में ज्ञान तथा सुख होते हैं। रज जो है, वह रागात्मक है और दुःख का कारण है। जिससे मनुष्य को ग्लानि हो, वह तमोगुण कहलाता है, अत एव तमोगुण बुद्धि का आच्छादन करनेवाला और मोह का मुख्य कारण है। समभाव को प्राप्त हुये वे तीनों गुण प्रकृति कहलाते हैं। ऐसा होने पर जब वे ही तीनों गुण न्यूनाधिक भाव को प्राप्त होते हैं, तब विकृति कहलाते हैं ।। ४ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA