भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे द्रष्टा और भोक्ता होता है, उस समय) क्षोभ को प्राप्त होकर और गुणों से समभाव को छोड़ कर महत्तत्त्व से अहङ्कार और अहङ्कार से पाँच तन्मात्र इत्यादि क्रम से जगत् को उत्पन्न करनेवाली, अमध्यस्थ धर्मवाली अर्थात् सुख-दुःख के भोगों को भोगनेवाली न कि सुख-दुःख के भोग से उदासीन रहनेवाली है ॥ग॥ 'पुरुषस्तु चेतनावान् निर्गुणोऽप्रसवधर्माऽबीजधर्मा मध्यस्थधर्मा चे'ति ।।घ।। पुरुष तो (अनेक) चेतनावाला, निर्गुण, अप्रसवधर्म, अबीजधर्म तथा मध्यस्थ धर्म से युक्त है ॥घ॥ ❖ निर्गुणः=अविद्यमानसत्त्वादिगुणः, अबीजधर्मा=महाप्रलये महदादीनां विकाराणां प्रकृताविव तस्मिन्ननवस्थानाद्, मध्यस्थधर्मा=सुखदुःखेच्छाद्वेषादिभ्य उदासीनः ।।घ।। निर्गुण अर्थात् जिसमें सत्त्व, रज और तम इनमें से कोई भी गुण वर्त्तमान न हो, अबीजधर्मा अर्थात् महाप्रलय होने पर महत्तत्त्वादिक विकार जिस तरह प्रकृति में रहते हैं, उस तरह पुरुष में न रहने से पुरुष प्रकृति की भाँति बीजधर्मवाला नहीं है। वह तो मध्यस्थधर्मा अर्थात् सुख-दुःख इच्छा द्वेषादिक से उदासीन रहनेवाला है ॥घ॥ अथ प्रकृतेर्नामान्याह- प्रधानं प्रकृतिः शक्तिर्नित्या चाविकृतिस्तथा। एतानि तस्या नामानि पुरुषं या समाश्रिता ।।५।। प्रकृति के नाम—जो प्रकृति पुरुष का भली प्रकार आश्रय लिये हुई है, उसके प्रधान प्रकृति, शक्ति, नित्या और अविकृति ये नाम हैं ॥५॥ अथ प्रकृतेर्गुणानाह- सत्त्वं रजस्तमस्त्रीणि विज्ञेयाः प्रकृतेर्गुणाः। तैश्च युक्तस्य चित्तस्य कथयाभ्यखिलान् गुणान् ।।६।। प्रकृति के गुण—सत्त्व, रज और तम. ये तीनों प्रकृति के गुण हैं। इनसे युक्त चित्त (मन) के सम्पूर्ण गुणों को आगे कहते हैं ॥६॥ अथ सत्त्वगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- आस्तिक्यं प्रविभज्य भोजनमनुत्तापश्च तथ्यं वचोमेधाबुद्धिधृतिक्षमाश्च करुणा ज्ञानं च निर्दम्भता। कर्मानिन्दितमस्पृहं च विनयो धर्मः सदैवादरादेते सत्त्वगुणान्वितस्य मनसो गीता गुणा ज्ञानिभिः ।।७।। सत्त्वगुण से युक्त मन के लक्षण—आस्तिकपन, भक्ष्याभक्ष्य का विचार कर भोजन करना, उत्ताप न करना, सत्य बात बोलना, मेधा, अर्थात् सुनी हुई बात को धारण करने की शक्ति रखनेवाली बुद्धि, धृति, क्षमा, करुणा, ज्ञान, निर्दम्भता, अनिन्दित (लोक-शास्त्र से जो निन्दित न हो) तथा स्पृहा से रहित कर्म, विनय और धर्म इन सब सत्त्वगुणों से युक्त मन के गुणों का ज्ञानियों ने सदैव आदर से वर्णन किया है ॥७॥ ❖ अस्ति धर्ममोक्षपरलोकादिकमिति बुद्ध्या चरतीत्यास्तिकस्तस्य भाव आस्तिक्यम्, अनुत्तापः=अक्रोधः, धृतिः=भूतप्रेतस्मरक्रोधलोभाद्यावेशराहित्यम्, ज्ञानम्=आत्मज्ञानम्, निर्दम्भता=कपटाभावः, कर्म-अनिन्दितम्, अस्पृहम्=निष्कामं च ।।७।। धर्म, मुक्ति और परलोक (स्वर्गादिक) ये सब यथार्थ में हैं, इस बुद्धि से इनकी प्राप्ति के लिये जो कर्म करते हैं, वे आस्तिक कहलाते हैं और उनके भाव को आस्तिक्य (आस्तिकपन) कहते हैं। अनुत्ताप अर्थात् क्रोध से रहित होना, धृति अर्थात् भूत, प्रेत, काम, क्रोध और लोभादिकों के आवेश से बचकर रहना, ज्ञान अर्थात् आत्मज्ञान, निर्दम्भता अर्थात् कपट न रखना, अनिन्दित और अस्पृह, अर्थात् कामना से रहित कर्म ॥७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA