भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् १३ अथ रजोगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- क्रोधस्ताडनशीलता च बहुलं दुःखं सुखेच्छाऽधिका दम्भः कामुकताऽप्यलीकवचनं चाधीरताऽहङ्कृतिः । ऐश्वर्यादभिमानिताऽतिशयितानन्दोऽधिकश्चाटनं प्रख्याता हि रजोगुणेन सहितस्यैते गुणाश्चेतसः ॥१८॥ रजोगुण से युक्त मन के लक्षण—क्रोध करना, मारने-पीटने का स्वभाव रखना, बहुत दुःख करना, सुख की इच्छा अधिक रखना, दाम्भिक तथा कामी होना, झूठ बोलना, धैर्य न रखना, अहङ्कार करना, ऐश्वर्य होने से अभिमान करना, अधिक आनन्द मानना और पृथ्वी में अधिक परिभ्रमण करना, ये सब रजोगुण से युक्त मन के गुण (लक्षण) प्रसिद्ध हैं ॥१८॥ ❖ अलीकवचनं=मिथ्याकथनम्, अटनं=पृथ्वीपरिभ्रमणम् ।।८।। 'अलीकवचन' का 'झूठ बोलना' तथा 'अटन' का पृथ्वी में परिभ्रमण करना है ॥८॥ अथ तमोगुणयुक्तस्य मनसो लक्षणमाह- नास्तिक्यं सुविषण्णताऽतिशयितालस्यं च दुष्टा मतिः प्रीतिर्निन्दितकर्मशर्मणि सदा निद्रालुताऽहर्निशम् । अज्ञानं किल सर्वतोऽपि सततं क्रोधान्धता मूढता प्रख्याता हि तमोगुणेन सहितस्यैते गुणाश्चेतसः ॥१९॥ तमोगुण से युक्त मन के लक्षण—नास्तिकपन रखना, अत्यन्त खेद से युक्त रहना, अत्यन्त आलस्य रखना, दुष्ट बुद्धि का होना, निन्दित कर्म करने से उत्पन्न सुखों में निरन्तर प्रीति रखना, दिनरात सोना, सभी विषयों में अज्ञान रहना, सदैव क्रोध से अन्धा रहना और मूर्खता करना, ये तमोगुण से युक्त मन के (लक्षण) हैं ॥१९॥ तत्र प्रभूतसत्त्वस्तु सात्त्विकः पुरुषः स्मृतः । राजसस्तामसश्चैव त्रिविधस्तेन मानवः ॥१२०॥ उसमें अधिक सत्त्वगुणवाला पुरुष सात्त्विकी, अधिक रजोगुणवाला राजसी और अधिक तमोगुणवाला तामसी प्रकृति का मनुष्य कहलाता है। इस तरह तीन प्रकार के मनुष्य विश्व में होते हैं ॥१२०॥ अथ महत्तत्त्वोत्पत्तिमाह- ततोऽभवन्महत्तत्त्वं बुद्धितत्त्वापराभिधम् । त्रिगुणं सत्त्वबहुलं निर्मलं स्फटिकोपभम्। चिच्छायाप्राप्तचैतन्यं तदिच्छामयमीरितम् ॥१२१॥ महत्तत्त्व की उत्पत्ति—उस (समसत्त्व रजस्तमः स्वरूपिण प्रकृति) से महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ है उसका दूसरा नाम 'बुद्धितत्त्व' भी है। महत्तत्त्व यद्यपि त्रिगुणात्मक (तीन गुणोंवाला) है, तथापि वह अधिक सत्त्वगुणवाला है अर्थात् उसमें और गुणों की अपेक्षा सत्त्वगुण अधिक है और वह स्फटिक के समान निर्मल है। ऋषियों ने उसे चित् (आत्मतत्त्व) का प्रतिबिम्ब पड़ने से चेतना को प्राप्त किया हुआ अत एव परमात्मा का इच्छामय कहा है ॥१२१॥ ❖ ततः प्रकृते स्त्रिगुणं=त्रयो गुणा यत्र तत्, तच्च सत्त्वबहुलम्, अत्रायमभिप्रायः-यथा निश्चले ह्रदादौ बहुद्रव्यपातात् तदीयं जलं वर्द्धते तथा चिद्रूपपुरुषेणाक्रमणात् तुल्यगुणत्रयात्मिकायाः प्रकृतेर्ज्ञानहेतुः प्रकाशकः सत्त्वगुणो वृद्धः प्रवृद्धसत्त्वतः प्रकृतेः सत्त्वबहुलं बुद्धितत्त्वमभवत् ॥१२१॥ उससे अर्थात् प्रकृति से त्रिगुण अर्थात् जिसमें सत्त्व, रज और तम, ये ३ गुण विद्यमान हों उसे त्रिगुण कहते हैं, और वह त्रिगुण कैसा हो कि 'सत्त्वबहुल' अर्थात् सत्त्वादि ३ गुणों के मध्य में सत्त्वगुण ही जिसमें अधिक मात्रा से विद्यमान हो, वह सत्त्वबहुल कहलाता है। त्रिगुण और सत्त्व बहुल इन दोनों विशेषणों को यहाँ पर देने का अभिप्राय यह है कि— जैसे निश्चल (स्थिर) जल-वाले तालाब आदि में बहुत से द्रव्य प्रस्तरादि गिर जाने से उसका जल बढ़ जाता है, उसी तरह चैतन्यरूप पुरुष के आक्रमण करने से अर्थात् आत्मतत्त्व के द्रष्टा और भोक्ता होने से तुल्यगुणत्रयात्मिका प्रकृति का कारणरूप जो प्रकाशक सत्त्वगुण है, वह वृद्धि को प्राप्त हुआ। फिर सत्त्वगुण की वृद्धि होने से प्रकृति से अधिक सत्त्वगुणवाला बुद्धितत्त्व (महत्तत्त्व) उत्पन्न हुआ ॥१२१॥